भारतीय ज्ञानपीठ सम्मान से सम्मनित कवि शंख घोष की बांग्ला कविताएँ : -----



 जन्मदिन



तुम्हारे जन्मदिन पर और क्या दूँगा सिवाय इस वचन के

कि कभी फिर हमारी मुलाक़ात होगी।



मुलाक़ात होगी तुलसीवट पर

मुलाक़ात होगी बाँस के पुल पर

सुपारीवन के किनारे मुलाक़ात होगी।



हम घूमेंगे शहर में डामर की टूटी सड़कों पर

गुनगुनी दोपहर या अविश्वासों की रातों में

लेकिन हमें घेरे रहेगी अदृश्य

उसी तुलसी अथवा पुल अथवा सुपारी की

कितनी ही सुंदर तन्वंगी हवाएँ।



हाथ उठाकर कहूँगा

यह देखो

सिर्फ़ दो-एक दर्द बचे रह गए हैं आज भी।

जब जाने का समय होगा

तो इस तरह देखूँगा कि भीग जाएँगी आँखें

हृदय को दुलराएगा उँगलियों का एक पंख

मानो हमारे सम्मुख कहीं कोई अपघात नहीं

और मृत्यु नहीं दिगंत तक।



तुम्हारे जन्मदिन पर और क्या दूँगा सिवाय इस वादे के

कि कल से हरेक दिन मेरा जन्मदिन होगा!


०००००००

खुलने लगे हैं तोरण



यह चिट्ठी किसे लिखूँगा मैं अभी तक नहीं जानता

लेकिन लिखनी ही पड़ेगी



लिखना पड़ेगा कि अब समय हो आया है

समेट लेने का समय ....

अब उठना ही पड़ेगा



अब कोई काम नहीं कि जिसे अधूरा छोड़ सकें

नीचे झुककर पानी की छाया में देख लेने होंगे सभी चेहरे

सबके चेहरों पर है मेरी छाया

और मेरी देह में व्याप्त

कितने लोगों, कितने दिनों का अविरल विश्वास।



कहाँ से आया था इतना सब? जमा रह गया ....

इस बार लिखना ही पड़ेगा।



लिखना ही पड़ेगा कि मैं भी हूँ

मैं भी हूँ तुम्हारे साथ हाथ मिलाने के लिए



और जिसे लिखूँगा उसने भी शायद

अब आना शुरू कर दिया है

स्वप्न में खुलने लगे हैं ...

खुलने ही लगे हैं रास्तों पर बने हुए तोरण।


०००००००

मणिकर्णिका



चतुर्दशी के अंधकार में बह रही है गंगा

उसके ऊपर हमारी पाल वाली नाव की साँसें

हमारे चेहरों से टकरा रही थी

मणिकर्णिका की आभा



हम किसी के भी चेहरे की ओर नहीं देख रहे थे

केवल हाथ से डेक को छू रहे थे

पानी की दो-एक बूँदों का

माथे पर लग रहा था तिलक



दिन के समय जिसे देखा था चांडाल

रात को वही हमारा माझी था

उनकी आँखों की पुतलियों में

किसी तरह का भेद नहीं था



पानी पर उड़ती आ रही थी चिनगारियाँ

भस्म घुलती जा रही थी हवा में

पंजर के भीतर डुबकी लगा रहा थे ऊदबिलाव

अब हम

दक्षिण में हरिश्चंद्र घाट की ओर

घुमा लेंगे नाव

दोनों ओर दिखाई दे रहे हैं

कालू डोम के घर



चतुर्दशी के अंधकार में बह रही है गंगा

एक श्मशान से दूसरे श्मशान जाते हुए

हम किसी के भी चेहरे की ओर नहीं देख रहे थे।


०००००००


 संकेत




मुझे याद है तुम्हारा संकेत

मैं ठीक पहुँच ही जाऊँगा समय रहते।



आइने के सामने खड़े होने के बहुत-से बहाने हैं

उन सब को हटाकर



पिछले साल के बाक़ी-बक़ाये में डूबे मन

इन सबको भूलकर



इसके उसके उनके साथ मुलाक़ात हो जाने

बातें कहने-सुनने

इन सबको पोंछकर



दिन-दोपहर की ओट में

पहुँच ही जाऊँगा आज तुम्हारे संकेत की शाम को



भग्न-हाट के थके व्यापारियों के पड़ोस से होकर

गाँव के सिवान के श्मशान में

जहाँ पीपल के झुक आए चेहरे की ओर

टकटकी लगाए देख रहा है

ठण्ड गूँगा जल ...


००००००

उस दिन अनंत आधी रात



उस दिन अनंत आधी रात को

राह में हुई थी बारिश

टूट गए थे घर और पेड़ों को मिली थी हवा

सुपारी की टहनियों की फुनगी पर

रुपहले पानी की प्रभा थी



और अँधेरे में थी -- हृदयहीन अँधेरे में

ज़मीन पर सुला दी गई नावें

उनके सीनों में जम गई थी बारिश

भीगी छाल की साँसें

किसी शून्यता के भीतर स्तब्ध हो गई थीं



मिट्टी और आकाश ने सिर्फ़ पुल बनकर बाँधी थी धारा

जीवन और मृत्यु के ठीक बीचोबीच

वायवीय जाल को कँपाते

उतर आए थे अतीत, अभाव और अवसाद



पत्थर की प्रतिमा ने

इसीलिए पत्थर पर रखा था अपना सफ़ेद चेहरा

और चारों ओर अविरल झर रही थी बारिश

बारिश नहीं, शेफाली, टगर, गंधराज थी वे बूँदें



घरविहीन देह के उड़ते जाते मलिन इशारों से

वे पोंछ लेना चाहते हैं अपने जीवन के अंतिम अपमान

सीने में हुई थी बारिश

उस दिन अनंत आधी रात।


०००००००


मूल बँगला से अनुवाद

रचनाकार : ---- शंख घोष

अनुवाद : ------ उत्पल बनर्जी

प्रस्तुति : ------ - मीता दास


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