मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 (ISSN 0976-5158)   


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जिस तरह के हालातों में हम रह रहे है. जिस तरफ दुनिया जा रही है.इन हालातों में कविता की भूमिका एक प्रश्न चिह्न खड़ा करती है। क्या कर लेगी कविता इस कठिन समय में, जब बन्दूकें भी हल नहीं खोज पा रही है,सच भी हैं अफगकविता को कब मौन होना है, और कब मुखर? यह एक बड़ा मुद्दा हो सकता है। क्यों कि आसपास सदैव हलचलों में तैरता है तो भीतर सन्नाटों की पड़ताल करता है। कवि को सन्नाटों की वजहों को खोजना पड़ता है, यदि ये सन्नाटें भूख, पीड़ा, दर्द और वेदना से निकलें हैं तो कविता को उँची आवाज में चिल्लाना पड़ता है, क्यों कि अकसर ऐसी स्थितियों में मानवता के कान बधिरता के शिकार हो जाता है।

"कैसा है यह वक्त
कि
बच्चा गिर कर रो नहीं रहा है,
चोट लगने पर भी चुप है
रक्त स्राव उसे भयभीत नहीं कर रहा है
पाँच साल की उम्र में सत्तर साल के खाये पीये
आदमी को भूख का मतलब याद करवा रहा है"


इस भयानक वक्त में कविता दर्द को गहन करे, दुख जतलाया जाये या प्रेम की अफीम खा कर सो जाये। प्रेम कभी खत्म नहीं होना चाहिये, निसन्देह युद्ध के मैदान में भी नहीं। उसने कहा कहानी से कविता अपने प्रेम के बदौलत ही बन गई।
रति सक्सेना
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मैं मैं शब्दों से घिरा हुआ था
हर चीज से पहले मुझे शब्द दिखते थे
रूस,अमेरिका,चीन और स्पेन
मेरे लिए शब्द थे
इन देशों के लेखक,कवि

धनंजय शुक्ल
*
किसी वर्ड फाइल में जानबूझकर
बोल्ड कर दिया गया जिसे
सिर्फ एक वही शब्द कि
नज़र बार बार उसी पर जा ठहरे ।
श्रुति गौतम
*
उनके चेहरे पर मचल रही है उदासी की लहरें
वे ध्वनियों को दृश्यों में बदलने की कोशिश करते हुए
धीरे - धीरे मौन हो रहे हैं
मदन कश्यप
*
तानाशाह जब
बहुत डर जाता है
तो जोर से हंसने का
अभिनय करता है
और जैसे -जैसे बढ़ता जाता है उसका डर
नित्यानंद गायेन
*
जंगल में रात दबे पांव नहीं आती
आती है तैयारी के साथ
सन्नाटे में गूंजती है उसकी आवाज
सांय - सांय और अंधेरे की मचान में
उसकी आंखें टिमटिमाती हैं
विजय सिंह
*
दोपहर की रूपहली धूप को
जाते हुए मैंने भी देखा
ऊँचे नंगे पर्वतों से
एक काले बादल का
टुकड़ा आया
और धूप की सारी किरणों को
समेट लिया
निदा नवाज़
*
तूने
सारे जल पर
अपना हक़ जताया
और आपस में बाँट ली
सारी जमीन
आकाश को भी
हथिया ही लिया असंग घोष
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वंश-वृक्ष और भूरा धुआँ
समय के हाशिए पर आत्मीय रक्त
बिखर गया है। एक दुर्घटना
आन्तरिक स्तर पर घटती है
और हम शताब्दी की तरह सिर्फ उदास
और आक्रान्त मुखाकृति लिए
देखते रहते हैं
पीठ झुकाए हुए
अपने सामने से गुजरती हुई जिज्ञासाओं को
जो बंधी हैं-
मनुष्य के पूरे यंत्रणा-काल से!

समय ने मुझे-
कितनी ही बार
समझाया है
इस तरह मनुष्य का
किसी भी एक कोण पर शताब्दी
हो जाना ठीक नहीं
स्थूल मांसलता और अमूर्त्त
काल के मध्य
सम्बन्ध सिर्फ केंचुओं की तरह
रेंगते रहे हैं
अँधेरे में खड़े हुए वृक्षों की
कतारों को कभी देखा है आपने?
अँधेरा किस तरह शब्दों को
जमा देता है। वह विकल्प होता है—

सच्चाई की आँखों से देखता है
समय को।
पहचान वैसे भी अपने में एक स्थूल तत्व
तो नहीं ही होता
वह निष्कर्षों की प्रतिगाथा के अन्तिम सूत्र
पर बुना गया
एक मार्मिक दृश्य को उकेरता हुआ
एक अन्वेषक क्षण हो सकता है—
और अन्वेषक क्षण आपको पता है
कैसा लगता है?
अँधेरे में खड़े हुए वृक्षों की कतारों को
देखा है आपने?
अँधेरा किस तरह शब्दों को
जमा देता है

वीर सक्सेन

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जन्मदिन

तुम्हारे जन्मदिन पर और क्या दूँगा सिवाय इस वचन के

कि कभी फिर हमारी मुलाक़ात होगी।

मुलाक़ात होगी तुलसीवट पर

मुलाक़ात होगी बाँस के पुल पर

सुपारीवन के किनारे मुलाक़ात होगी।

हम घूमेंगे शहर में डामर की टूटी सड़कों पर

गुनगुनी दोपहर या अविश्वासों की रातों में

लेकिन हमें घेरे रहेगी अदृश्य

उसी तुलसी अथवा पुल अथवा सुपारी की

कितनी ही सुंदर तन्वंगी हवाएँ।

हाथ उठाकर कहूँगा

यह देखो

सिर्फ़ दो-एक दर्द बचे रह गए हैं आज भी।

जब जाने का समय होगा

तो इस तरह देखूँगा कि भीग जाएँगी आँखें

हृदय को दुलराएगा उँगलियों का एक पंख

मानो हमारे सम्मुख कहीं कोई अपघात नहीं

और मृत्यु नहीं दिगंत तक।

तुम्हारे जन्मदिन पर और क्या दूँगा सिवाय इस वादे के

कि कल से हरेक दिन मेरा जन्मदिन होगा!

शंख घोष

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सूरदास के पद

सूरदास के पदों से कौन अपरिचित होगा, हिन्दी कविता को जीवन रस से आप्लावित करने वाले सूरदास के पद जन जन में व्याप्त हैं। सूरदास के पद हीं तो हैं , जिन्होंने कविता को संगीत के क्षेत्र में स्थापित कर दिया। इस बार हम सूर दास के कुछ कम लोकप्रिय किन्तु सरस पदों को लेकर उपस्थित हुए है।

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राग--रामकली

माखन खात पराये घर को।

नित प्रति सहस मथानी मथिये मेघ शब्द दधिमाठ घमर को।।
कितने अहिर जिअत हैं मेरे, दधि लै बेचत मेरे घर को।।
नव लख धेनु दुहत है नित प्रति बड़ो भाग है नन्द महर को।।
ताके पूत कहावत हौ जी चोरी करत उघारत फरको ।
"सूर" स्याम कितनो तुम खैहो दधि माखन मेरे जँह तँह ढरको।।

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राग--नट

अनत सुत गोरस को कत जात।

घर सुरभी नव लाख दुधारी और गनी नहीं जात।।
नित प्रति सबै उरहने के मिस आवति है उठि प्रात।।
अन समुझे अपराध लगावति विकट बनावत बात।।
अतिहि निसंक बिबादति सनमुख सुनि मोहि नन्द रिसात।
मो सों कृपनि कहत तेरे गृह ढोटाऊ न अघात।।
करि मनुहारि उठाय गिद लै सुत को बरजति मात।
'सूर' स्याम नित सुनत उरहनो दुख पावत तेरो तात।।

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VOL - X/ ISSUE-II(जनवरी फरवरी2017)

प्रमुख संपादकः
रति सक्सेना

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