कविता को कब मौन होना है, और कब मुखर? यह एक बड़ा मुद्दा हो सकता है। क्यों कि आसपास सदैव हलचलों में तैरता है तो भीतर सन्नाटों की पड़ताल करता है। कवि को सन्नाटों की वजहों को खोजना पड़ता है, यदि ये सन्नाटें भूख, पीड़ा, दर्द और वेदना से निकलें हैं तो कविता को उँची आवाज में चिल्लाना पड़ता है, क्यों कि अकसर ऐसी स्थितियों में मानवता के कान बधिरता के शिकार हो जाता है।

"कैसा है यह वक्त
कि
बच्चा गिर कर रो नहीं रहा है,
चोट लगने पर भी चुप है
रक्त स्राव उसे भयभीत नहीं कर रहा है
पाँच साल की उम्र में सत्तर साल के खाये पीये
आदमी को भूख का मतलब याद करवा रहा है"


इस भयानक वक्त में कविता दर्द को गहन करे, दुख जतलाया जाये या प्रेम की अफीम खा कर सो जाये। प्रेम कभी खत्म नहीं होना चाहिये, निसन्देह युद्ध के मैदान में भी नहीं। उसने कहा कहानी से कविता अपने प्रेम के बदौलत ही बन गई। लेकिन सवालों के तीरों को तेज करना भी जरूरी है।
सबसे बड़ा सवाल यह भी उठ सकता है कि क्या वास्तब में कविता की कोई भूमिका है इस समय में?

इन सभी के जवाबों को हम कविता में ही खोजने की कोशिश कर रहे हैं इस अंक में। धनंजय अपने वक्त की तमाम तल्खियों को शब्दों में उड़ेलने के बावजूद, सवाल करना नहीं छोड़ते, और यही पर कविता की जरूरत महसूस होती है।

"‍धनञ्जय बाबू , स्मृतियों का क्या करोगे ?
वे तो आयेगी
अपने साथ अनोखी घटनाओं और न रह गये
लोगों की अनुपस्थिति का दंश लेकर
उस मूक दर्द का क्या कर लोगे
जो क्षण भर में घटकर विस्मृति हो जायेगी"

सवालों के लिए ये बेहद सही समय है, क्यों कि हमारे पास सब कुछ है, लेकिन हमारे सवाल सुनने वाला कोई नहीं है। वीर सक्सेना की लम्बी कविता हमे सवालों के साथ जूझना भी सिखा रही है, यहाँ युवाकालीन सतेजता को अनुभव के गाम्भीर्य ने कुछ स्पष्ट किया है,

"यहाँ प्रश्न दिशाओं का रह जाता है—
एक भौतिक सुख की कालजीवी प्रतीक्षा
के बाद का वह नक्षत्र क्षण—
घूमता है—
पूरे परिवेश के सामने और अन्त में
एक आक्रामक मुद्रा में खड़ा रह जाता है—
मूर्त्त हुए कथन की
साक्षी में"

वीर सक्सेना पूरे भूगोल और परिपेक्ष्य से संवाद करते हैं-

"पूरा भूगोल काँपता है एक
संशय धुरी पर। यह धुरी
टूट क्यों नहीं जाती? यह किस
सभ्यता के रक्ताणु मनुष्य के रक्त में बहते हैं
और उसका रक्त लाल रहता है?
एक तान्त्रिक लिपि बनती है"

कविता का आखिरी कदम प्रेम हैं और श्रुति गौतम की सहज कविताए, वक्त के बिम्बो से प्रेम के चित्रों को उकेरती हुई इस राह को सफल बनाती है, -

"किसी वर्ड फाइल में जानबूझकर
बोल्ड कर दिया गया जिसे
सिर्फ एक वही शब्द कि
नज़र बार बार उसी पर जा ठहरे ।"

आशा है कि कुछ नये बिम्ब खिल कर आयें...
काफी कुछ और भी हैं इस अंक में , भारतीय ज्ञानपीठ सम्मान से सम्मनित कवि शंख घोष की बांग्ला कविताओं से लेकर समकालीन कवियों सहित....

और

बस एक आशा कि कविता का अगला कदम सिर्फ प्रेम हो, हालंकि यह अभिलाषअ अपनी ही तरह एक दम झूठी है, फिर भी कविता कामना तो कर सकती है।

इस अंक के कलाकार विजेन्द्र विज हैं जो काफी समय तक कृत्या से जुड़े रहे... विजेन्द्र की कला अमूर्त का चित्रण नहीं, बल्कि सवालों का जंगल है,...

शुभकामनाओं सहित

रति सक्सेना


     पत्र-संपादक के नाम                                                  
 


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