वीर सक्सेना की लम्बी कविता



वंश-वृक्ष और भूरा धुआँ
समय के हाशिए पर आत्मीय रक्त
बिखर गया है। एक दुर्घटना
आन्तरिक स्तर पर घटती है
और हम शताब्दी की तरह सिर्फ उदास
और आक्रान्त मुखाकृति लिए
देखते रहते हैं
पीठ झुकाए हुए
अपने सामने से गुजरती हुई जिज्ञासाओं को
जो बंधी हैं-
मनुष्य के पूरे यंत्रणा-काल से!

समय ने मुझे-
कितनी ही बार
समझाया है
इस तरह मनुष्य का
किसी भी एक कोण पर शताब्दी
हो जाना ठीक नहीं
स्थूल मांसलता और अमूर्त्त
काल के मध्य
सम्बन्ध सिर्फ केंचुओं की तरह
रेंगते रहे हैं
अँधेरे में खड़े हुए वृक्षों की
कतारों को कभी देखा है आपने?
अँधेरा किस तरह शब्दों को
जमा देता है। वह विकल्प होता है—

सच्चाई की आँखों से देखता है
समय को।
पहचान वैसे भी अपने में एक स्थूल तत्व
तो नहीं ही होता
वह निष्कर्षों की प्रतिगाथा के अन्तिम सूत्र
पर बुना गया
एक मार्मिक दृश्य को उकेरता हुआ
एक अन्वेषक क्षण हो सकता है—
और अन्वेषक क्षण आपको पता है
कैसा लगता है?
अँधेरे में खड़े हुए वृक्षों की कतारों को
देखा है आपने?
अँधेरा किस तरह शब्दों को
जमा देता है।

यातना अंश के निर्वासित सत्यों की
परिकथा के उद्भूत प्रसंगों के
लौटते हुए सन्दर्भ—वह शायद
एक परिकल्पनाहीन आकांक्षा की नींव में रखा हुआ
कारुणिक विस्फोट का एक क्षण है—
जो समय की आहत आत्मा
के साथ
अपनी सर्वांग सात्विक दृष्टि को
खोलता है और रुक जाता है—
यह इतिहास की कन्दरा के भीतर से
होती हुई अग्नि-यात्रा
हाँ तो आप चाहते हो ना कि मैं
इस अग्नि-यात्रा के साथ रहूँ?
हर बार आपके कन्धे इतिहास के कन्धे बन जाएँ
और एक पूरी त्रासदी का बोझ उठाते रहें
तो मैं क्या कहूँगा—प्रकारान्तर से
मनुष्य का पूरा अस्तित्व-बोझ
क्या कहेगा?
यह भी हो सकता है कि यह
सौन्दर्य-वृत्त
खींच देने की सुविधा
सिर्फ नियति के पास रही हो
और नियति—पूरे मनुष्य की नियति—एक सन्त्रस्त
भूखण्ड की आत्मा जहाँ केवल
जंगलों और स्याह लोगों और
टूटी हुई गर्दनों वाले भू-भागों में
सीमित रह गई है
क्या पूरा इतिहास इस तरह नामांकित किया जाता रहेग?

आप प्रतीकार्थ हैं—
आप इतने अधिक रूप और स्थितियाँ
क्यों हैं?
काले आदमी का उठा हुआ हाथ
कोयले की खदान में दबे हुए मजदूर की
पसली का टुकड़ा
झोंपड़ी के कक्ष में जलती हुई ढिबरी की
आँखों के जाले को काटती हुई उँगलियाँ
एक जला हुआ शहर
जिसके मलबे पर घूमती हुई
एक आकांक्षा
एक सन्तप्त सुबह की पूर्व नियोजित
भूमिका
या एक युद्ध की
शहीद होने के बाद की निस्तब्धता
का अर्थ समझाती हुई कृति!
या राख हुई फसलों के ढेर से
बच्चों के लिए दाने
समेटती हुई हवा।
इस शताब्दी का आत्मकथ्य
या एक निर्वासित सत्यकथा की प्रारम्भिक
शाब्दिक प्रक्रिया
या मात्र एक अस्तित्व-बोध
जो मनुष्य के सामने प्रश्नचिन्ह की तरह
खड़ा है?

हरी पत्तियों और पीले सन्दर्भों के
मध्य
एक विराग-कथा जब उगती है
अपनी ऊँचाई के शिखर को तोड़ती है
वही वायु दिशा की अग्निजन्मा चेतना

हाँ तो मैं कह रहा था
विराग-कथा जब-जब उगती है
सत्यों और संदर्भों की आग में
झुलसने लगता है एक पूरा
वर्तमान—
ऋतुओं के चेहरों पर। क्या
देखा है आपने ऋतुओं के
चेहरों पर? वह पूरा सन्दर्भित कोण
तो उगता है विराग-कथा के समानान्तर
सच है कि नहीं
वह पूरा सन्दर्भित कोण उगता है या नहीं
विराग-कथा के समानान्तर?
यहीं थी वह साँवली नदी। जल
के विस्तार के उन छोरों पर
आत्मिक यन्त्रणाओं के मध्य का
संज्ञायित स्वर—
कांपता क्यों है? यह आपकी अनुपस्थिति में
सारा जंगल काँपता क्यों है?

यह बिना गति के सरसराहट
कैसी है? इस ठहराव के बाद भी
यहा सारा जंगल काँपता क्यों है?
मैं फिर प्रश्न कर रहा हूँ
संकेत और अन्तराल के
सौन्दर्य-सूत्र कहाँ
छूट पाते हैं एक लम्बी नेपथ्य-कथा
के मध्य
आप आश्वस्त रहिए! मैं नेपथ्य
के संवादों को दुहराए जाने वाला
निरीह चरित्र नहीं हूँ
इतना मुक्त हूँ कि संवाद के सत्य को
उजागर कर सकूँ—अर्थ दे सकूँ
यथार्थ की पूरी दृश्यावली को—
मैं सौन्दर्य साक्ष्य के विराम पर
खड़ा हुआ यक्ष तो नहीं। न वह
सूचक-संगीत हूँ जो दृश्यावली को
बाँधता है लयात्मक परिदृश्य में—
इस लंबी नेपथ्य-कथा के मध्य।

शिलालेख कहाँ हैं? समय की
कटी हुई उँगलियों से
शिलालेख लिखे जाते हैं कहीं?
भग्न शब्द कोई भाषा-दोष नहीं
करते क्या?

यह चित्रों में स्याह रंग क्या
अर्थ देता है? शताब्दी की
खाली और निष्काम हँसी—अपने होने
के पूर्व का प्रतिहास—किस मौलिक
उद्भावना की प्रतिक्रिया कहती है?
मेरे आकार की उस कथा का
विस्तार? क्या
हुआ मेरे आकार की उस कथा का
विस्तार?
क्या हुआ? जहाँ मैं हूँ वहाँ क्यों
इस तरह बार-बार अपने को
दुहरा रहा हूँ
यह जंगल अपने को दुहराता
क्यों है?

स्वीकार करता हूँ कि
मैं एक अन्वेषिक मुद्रा में हूँ
यह मुद्रा—कालक्रम की उस
वैकल्पिक मुद्रा को ग्रहण करने के बाद
बनी है
जो प्रत्येक मन:स्थिति को
सांकेतिक खोज के अँधेरे की तहों में
अकेला छोड़ देती है—
एक अन्वेषक होकर
लगातार अपने भीतर की धमनियों में
तलाशते रहना एक आग—
समय मेरे माध्यम से...मुझसे होता हुआ—
उस आग तक पहुँच जाए
यह अर्द्धसत्य तो नहीं कहा जाएगा ना?

प्रश्न दिशाओं का रह जाता है—
एक भौतिक सुख की कालजीवी प्रतीक्षा
के बाद का वह नक्षत्र क्षण—
घूमता है—
पूरे परिवेश के सामने और अन्त में
एक आक्रामक मुद्रा में खड़ा रह जाता है—
मूर्त्त हुए कथन की
साक्षी में!
यह मूर्त्त होना और कथन की
साक्षी में प्रक्रिया-बद्ध हो जाना
किसी सन्धि-रेखा को तोड़ता है
मैं अपनी सन्धियों के मध्य से
जिस युग-सन्दर्भ को देखने की
कोशिश कर रहा हूँ
उसका कोई कोण सभी के निकट
अर्थ रखता है—
और यह अर्थ रखना ही सन्धि-रेखा को
तोड़ता है—
रंगहीन दृष्टि और रेत के संस्कार
क्या होते हैं? अथाह
सामुद्रिक दौड़ की सीमा-रेखाओं पर
जल-अश्वों की त्वचा मढ़ी जाने पर
क्या होता है समुद्री हवाओं को?
मैं किन त्वचा-सेतुओं के मध्य घिरा हूँ?
मत्स्य-गन्ध घुलती रहती है! जल में
घुली हुई गन्ध तो सूखकर रेत नहीं
बनती ना?
फिर क्यों वह रेत के इतिहास को—
उसके अक्षरों को—सामुद्रिक दौड़ की
सीमा बताते हैं?

पूरा भूगोल काँपता है एक
संशय धुरी पर। यह धुरी
टूट क्यों नहीं जाती? यह किस
सभ्यता के रक्ताणु मनुष्य के रक्त में बहते हैं
और उसका रक्त लाल रहता है?
एक तान्त्रिक लिपि बनती है
और पीछे से एक सफेद पार्श्व
उभरता है। ऋतु की
परिकथा धरती से भिन्न कैसे हो जाती है?

यह मुद्राएँ किसने कहाँ ग्रहण कीं? यहाँ
मेरा होना कोई अर्थ नहीं रखता है
जिसके रक्षित क्षण पर
कोई विदेह संज्ञायित पुरुष
एक तान्त्रिक सिद्धि का अन्तिम उपाख्यान करे।
मैं तब भी मात्र साक्षी बना रहा
जब मेरा होना—एक सफेद पार्श्व उभारता रहा
और एक तान्त्रिक लिपि बनती रही।

एक भूखण्ड पर आँच आती है
तो पूरे मानचित्र पर यक्ष छायाएँ
नाचने लगती हैं। यह नृत्य-मुद्राएँ
भीरु क्यों कर देती हैं मनुष्य को?

आदम संज्ञाओं का उपजीव्य क्यों होता
है एक पूरा मांसल संस्कार? कहाँ होता
है सामूहिक आत्म-हत्याओं का अन्तिम बोध?
यह बोध जिसे हम बार-बार दुहराते हैं
रक्तहीन और सूखे वनखण्डों के समीप ही तो
नहीं ले जा रहा?

यहाँ, जहाँ हम अब तक पहुँचे हैं
नीले फूलों से भरने की प्रतीक्षा में
केवल एक रिक्त पात्र रखा है—
और भूरा धुआँ
इस वंश-वृक्ष के चारों ओर
वृत्ताकार घूम रहा है

***
 


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