सूरदास के पद

सूरदास के पदों से कौन अपरिचित होगा, हिन्दी कविता को जीवन रस से आप्लावित करने वाले सूरदास के पद जन जन में व्याप्त हैं। सूरदास के पद हीं तो हैं , जिन्होंने कविता को संगीत के क्षेत्र में स्थापित कर दिया। इस बार हम सूर दास के कुछ कम लोकप्रिय किन्तु सरस पदों को लेकर उपस्थित हुए है।


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राग--रामकली

माखन खात पराये घर को।

नित प्रति सहस मथानी मथिये मेघ शब्द दधिमाठ घमर को।।
कितने अहिर जिअत हैं मेरे, दधि लै बेचत मेरे घर को।।
नव लख धेनु दुहत है नित प्रति बड़ो भाग है नन्द महर को।।
ताके पूत कहावत हौ जी चोरी करत उघारत फरको ।
"सूर" स्याम कितनो तुम खैहो दधि माखन मेरे जँह तँह ढरको।।

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राग--नट

अनत सुत गोरस को कत जात।

घर सुरभी नव लाख दुधारी और गनी नहीं जात।।
नित प्रति सबै उरहने के मिस आवति है उठि प्रात।।
अन समुझे अपराध लगावति विकट बनावत बात।।
अतिहि निसंक बिबादति सनमुख सुनि मोहि नन्द रिसात।
मो सों कृपनि कहत तेरे गृह ढोटाऊ न अघात।।
करि मनुहारि उठाय गिद लै सुत को बरजति मात।
'सूर' स्याम नित सुनत उरहनो दुख पावत तेरो तात।।

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राग--नट

स्याम सब भाजन फोरि पराने।

हाँक देत पैठत है पैले नेकु न मनहिं डेराने।।
सींके तोरि मारि लरिकन को माखन दधि सब खाई।।
भवन मच्यो दधिकाँदों लरिकन रोवत पाये जाई।।
सुनहु- सुनहु सबहिन के लरिका तेरो सो कहूँ नाहीं।
हाट- बाट गलियन कहुँ कोऊ चलत नहीं डरपाही।।
ऋतु आए को खेल, कन्हैया सब दिन खेलत फाग।
रोकि रहत गहि गली साँकरी टेढ़ी बाँधत पाग।।
बारे ते सुत ये ढंग लाये मन ही मनहिं सिहात।
सुनहु सूर ग्वालिनि की बातैं सकुचि महरि पछतात।।

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राग--सारंग

कन्हैया तू नहिं मोहि डेरात।
षटरस धरे छोड़ि कत पर घर चोरी करि करि खात।
बकति बकति तोसो पचि हारी नेकहु लाज न आई।
ब्रज परगन सरदार महर, तू ताकी करब नन्हाई।।
पूत सपूत भयो कुल मेरो अब मैं जानी बात।
सूर स्याम अबलौं तोहि बकस्यो तेरी जानी घात।।

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राग--गौरी

सुन री ग्वारि कहौं एक बात।।
मेरी सौं याहि जकरि बाँधौगी बहुतै मोहि खिझाई।
साटन्हि मारि करौं पहुनाई चितवन बदन कन्हाई।।
अजहूँ मानु कह्यो सुत मेरो घर- घर तू जनि जाहि।
सूर स्याम कह्यो कबहुँ न जैहौं माता मुख तन चाहि।।

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राग--बिलावल

तेरे लाल मेरे माखन खायो।
दुपहर दिवस जानि घर सूनो ढूँढ ढँढोरि आपही आयो।।
खोलि किंवार सून मन्दिर में दूध दही सब सखन खवायों।
सींक काढि खाट मोहन कुछ खायो कछु लै ढरकायों।।
दिन प्रति हानि होत गोरस की यह ढोटा कौने ढँग लायो।
सूरदास कहती ब्रजनारी पूत अनोखो जसुमति जायो।।

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