धनंजय शुक्ल की कविता
 

शब्दों ने दुनिया बदल दी

एक अज्ञात और भयावह सी दुनिया
मेरे सामने मौजूद थी
जिसका कुछ भी मेरी समझ में नही आता था ।

मैं बार-बार अपनी झोपड़ी में लौट आता था
लेकिन झोपड़ी में कुछ भी नही था
सिवाय भूख और सन्नाटे के ।

जरूरतों ने लोगों से जोड़ा
लोगों से मिलने पर
शब्दों से और उसकी अहमियत से परिचय हुआ
शब्दों ने दुनिया बदल दी
दुनिया जिसमें गांव से लेकर
तमाम बड़े-बड़े देश शामिल थे
जो अक्सर टीवी में दिखता था
और किताबों में मिलता था ।

मन शब्दों से भर गया था
जो बड़े-बड़े देशों
बड़े-बड़े लोगों
बड़ी-बड़ी योजनाओं
और तमाम तरह की
तकनीकी कुशलता से सम्बंधित थे ।

अपनी झोपड़ी में भी होने पर
शब्दों का ये संसार--विशाल संसार
हर छुद्रता को महानता में बदलने के लिए
तत्पर रहता था ।

मैं शब्दों से घिरा हुआ था
हर चीज से पहले मुझे शब्द दिखते थे
रूस,अमेरिका,चीन और स्पेन
मेरे लिए शब्द थे
इन देशों के लेखक,कवि और दार्शनिक
मेरे लिए शब्द थे
और उनकी कविताएं भी ।

यह सब मुझे इतना महिमामण्डित करता था
कि मेरी झोपड़ी भी
मेरे लिए शब्द थी,
प्रेम तो खैर मेरे लिए हमेशा शब्द ही रहा,
भूख भी मेरे लिए शब्द ही रह गयी ।

यह वह दौर था
जब मैं अपने आदमीपने से
बहुत दूर चला गया था,
जब मैं अपनी झोपड़ी में भी रहकर
नही रहता था,
मुझे लौंकी, तोरई और सेम की बेलें
नही दिखती थी,
रिरियाते हुए कुत्ते के पिल्ले
और उसकी पूँछ पकड़कर खींच रहे बच्चे की उपस्थिति का भी पता नही चलता था ।


(
धनंजय शुक्ल की अन्य कवितायें)


श्रुति गौतम  की कविता

बसंत!

बारिश-ए-जनवरी से धुली
फरवरी की नम स्लेट पर
भीगी पीली चॉक उकेरा
एक हर्फ़ कुछ गहरा गहरा

किसी वर्ड फाइल में जानबूझकर
बोल्ड कर दिया गया जिसे
सिर्फ एक वही शब्द कि
नज़र बार बार उसी पर जा ठहरे ।

बिन भिगोये आँचल की कोर मिटता नहीं
औ मिट भी जाए तो हटते नहीँ नक्श-ए-पाँ
भरते जाते है सूनी टहनियों पे हरे पत्ते
पर हर बार हरे भी तो होते है गहरे घाव।

तुम आते हो तो लौट आते है गुजरे हुए दिन
वो दिन जिनके होने से मेरा होना है
कि जो नहीं होते तो जी लेती मगर ज़िंदा कहाँ होती
कि जिनसे रूह कुछ उजरी, ज़रा रौशन है।

देखो! मेरे मन का मौसम नहीं तुम
मगर मेरे सब मौसमों का मन हो।

बसंत!

तुम कभी थे/ इतना बहुत है मुझे।


(श्रुति गौतम की और कविताएं)


मदन कश्यप की कविता


उदासी का कोरस


पूरे उल्लास के साथ फैलाई जा रही है
उनकी उदासी की खबर
चहक कर बनाते हैं अनुयायी कि इन दिनों वे उदास हैं

उनके चेहरे पर मचल रही है उदासी की लहरें
वे ध्वनियों को दृश्यों में बदलने की कोशिश करते हुए
धीरे - धीरे मौन हो रहे हैं

अब वे कुछ कहना नही बस दिखना चाहते हैं

उन्हें मालूम है कि चुप्पी एक कलात्मक जटिलता है
और बोलना कलाहीन स्पष्टता

वे बदलाव की कुरूपता
और ठहराव की सुंदरता को जानते हैं
आशावादियों की उदंडता
और प्रतिवादियों की अभद्रता को पहचानते हैं

उन्हें मालूम है समय की जड़ता में खलल नही डाल सकती
किसानों की आत्महत्याएं
इरोम शर्मीला कभी नही बन पाएगी अण्णा हजारे
और अण्णा हजारे भी कब तक बने रहेंगे अण्णा हजारे

वे मानते हैं उम्मीदों की सारी चूलें हिल चुकी हैं
और जो जितना मानते हैं वही उतना ही जानते हैं

उन्हें गर्व है अपनी उदासी पर
यही क्या कम है कि वे उदास हैं
जबकि आज की आपाधापी में
लोग बाग़ उदास होना भी तक भूल चुके हैं
वैसे बहुत खूबसूरत है उनकी उदासी
सफ़ेद गुलाब की पंखुरियों के कोरों पर
झलकने की कोशिश कर रहे ललछौंह रंग सरीखी

दलितों के आक्रोश
आदिवासियों के विक्षोभ
अल्पसंख्यकों के संशय
और स्त्रियों की छटपटाहट
के बरक्स
वे रच रहे हैं उदासी का बभन विमर्श


(मदन कश्यप की अन्य कविताएँ)
 


नित्यानंद गायेन की कवितां


अंतिम वक्त में तानाशाह

तानाशाह जब
बहुत डर जाता है
तो जोर से हंसने का
अभिनय करता है
और जैसे -जैसे बढ़ता जाता है उसका डर
हवा में गूंजने लगती है उसकी हंसी
वह भीतर ही भीतर महसूस करता
अपने अंत होते समय को
फिर भी
वह नकली हंसी से देता है
खुद को तसल्ली

भय के कारण
वह इतना जोर से हँसता है
कि, घुंटने लगता है उसका दम
टूटने लगता है उसका घमंड
उसे शायद
अहसास होता है उस वक्त
अपने अपराधों का
वह चाहता है कि कोई समझे उसे
कि उसे हो रहा है अहसास
अपने अपराधों का
घुटती सांसों के साथ

पर शर्म के कारण
वह कह नहीं पाता यह बात खुलकर
और एक बार फिर से
उसके भीतर का तानाशाह
कहता है उससे
कि अंतिम साँस के साथ
अपने अपराधों को स्वीकार करना भी
मूर्खता है |

यह सोच कर
तानाशाह
फिर से हंसने की
अंतिम कोशिश करता है

और फिर लम्बी ख़ामोशी ........


(नित्यानंद गायेन की कविताएं)


विजय सिंह की कवितायें


जंगल का समय


अंधेरे में जाग रहे हैं खेत

बीज के लिए आतुर मिट्टी
अभी करवट ले रही है

पगडंडी में सुस्ता रहे हैं
पावों के निशान

वृक्ष थपकी देकर पत्तियों को सुलाने की कोशिश कर रहें हैं
जुगनूओं की चमक में अंधेरा और निखर रहा है
जमी़न की सूखी पत्तियाँ खड़क खड़क कर लोरियाँ गा रहीं हैं
जिन्हें पेड़ में बैठी चिड़िया सुन रही है

दूर गाँव में बज रहा है मांदर और आसमान में लुका छुपी खेल रहा है चाँद
हवा की दिशा में कोई जहरीला सांप खेत ,लांघ रहा है
बांस की झुरमुट में
बेफ्रिक सोया पड़ा है बाघ

जंगल में रात दबे पांव नहीं आती
आती है तैयारी के साथ
सन्नाटे में गूंजती है उसकी आवाज
सांय - सांय और अंधेरे की मचान में
उसकी आंखें टिमटिमाती हैं

नींद में जागता है जंगल और थोड़ी सी आहट से सांप के फण की तरह उठ खड़ा होता है

जंगल का समय
हमसे भी
अधिक चौकन्ना है


( विजय सिंह की अन्य कविताएं)


निदा नवाज़

काले बादल का टुकड़ा

दोपहर की रूपहली धूप को
जाते हुए मैंने भी देखा
ऊँचे नंगे पर्वतों से
एक काले बादल का
टुकड़ा आया
और धूप की सारी किरणों को
समेट लिया
नगर-नगर अंधियारा फैला
घर-घर से
चमगादड़ों की चीखें गूंजी
पेड़-पेड़ पर
उल्लू बोले
बादल के इस
काले बिछू ने
बुद्धि को भी डंक मार दिया
लोग एक दूसरे का मांस
नोचने लगे
बेटे ने बाप को
काट के फेंका
भाई ने भाई का
गला घोंटा
अब हर एक के हाथ में
टूटी तलवारें
हर एक के कपड़ों पर
अपने ही ख़ून की छींटे
हर दिशा हैं
लाशों के ढेर
उन पर झपटते
आवारा कुत्ते
मंडलाती चीलें और कौए
मैं
हड्डियों के पंजरे के अन्दर
अपनी आँखों की ठिठकी ठहरी
सहमी बूँदों में
सिमट गया हूँ
कौए,चीलें और
आवारा कुत्ते
मुझको एक हड्डियों का
पिंजरा समझ कर छोड़ गये हैं
और मेरी भर्राई आँखों में
यह रिसता सपना
कि उस दोपहर को
केवल एक बार, मैं
फिर से देखूँ
हड्डियों के पिंजरे से निकलूँ
आकाशों में उड़ जाऊँ .
 

(निदा नवाज़  की अन्य कविताएं)


असंग घोष


तेरी हड़प नीति


तूने
सारे जल पर
अपना हक़ जताया
और आपस में बाँट ली
सारी जमीन
आकाश को भी
हथिया ही लिया
तूने
सांप की तरह अपनी
लपलपाती जिव्हा से
इस तरह जल ,
नभ ,
थल सब लील लिया
और बनाया अकस्मात्
अपना हिंदुस्तान !

 

(असंग घोष की अन्य कवितायें )


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