श्रुति गौतम
२)

तुम यूं तो नहीं आते थे कभी

अभी तो कूकी ही न थी कहीं कोई कोकिल
और खिल भी न सके थे कहीं नए किसलय
न फूटी थी आम के पेड़ पर नई मंजरिया
अभी बही भी न थी वो सुवासित पवन
और सरसों की फसल में भी तो फूल बाकी थे।

शेष था स्मृतियों का दंश चुभना भी अभी
बचा हुआ था रहमान के पुराने एल्बम्स सुनना
अभी पढ़नी थी मुझे जीमेल आर्काइव में स्टोर
किसी की रंज-ओ-तंज भरी आखिरी कविता
कि तुम्हारे आने का स्वागत भी तो करना था।

अभी कुरेदने भी थे कुछ भरे कुछ हरे घाव
और रोना था रात के तीजे पहर उठ उठ कर
सुबकियों की अनुगूँज सबसे छिपाते हुए
तुम पर लिख कर मिटानी थी एक लंबी तकरीर
तुम्हे कोसना था कि न कभी इधर कदम रखो।

अभी कुछ भी तो नहीं हुआ
तुम अचानक चले आये।

तुमने निगाह बदली थी, बसंत!
अंदाज़-ए-बयां भी बदला था।
ठीक था।

तुमने मेरे लिए अपने पुश्तैनी रंग बदल लिए।
मेरी प्लेलिस्ट के सारे गीत शफल कर दिए।
ठीक था।

दुपट्टे की किनार से टूट गई सब छोटी घंटिया
तुम साथ ले गए नेलपॉलिश के नियोन शेड भी
ठीक था।

सब ठीक था। कोई शिकायत नहीं।

मगर तुम तो इंसान भी नहीं थे ना, माय डिअर!
यूं फितरत बदलना तो कतई ठीक नहीं।

•••


३)

कोयल के कंठ में अटका हुआ एक
काँटा चुभता है बहुत। दिल तक
पहुंच जाती है फांस। जाने क्यूँ इन दिनों
एक दर्द तैरता है नज़र में। मन में
गहरी हूक उठती है। कहीं अंतस में
पिघलता है प्रेम। इसके बीतने के दिन गिनों।

•••


४)

सुनो, तुम!

कूकती कोयले केवल बसंत के स्वागत के ही गीत नहीं गाती
किसी बसंत किसी गीत के अधूरे छूट जाने का सोग भी मनाती है।

प्रेम का काँटा एक बार धंस जाए तो
फिर दिल के साथ ही बाहर निकलता है...

•••


५)

फिर कृष्ण ने कहा-
'ऋतूनां कुसुमाकरः'

खिल आए क्षिति पटल पर
सहर्ष सहस्त्र किंशुक कुसुम
सरसों पुहुप के स्वर्णिम रंग
शेष सभी रंग हुए गुम।

पवन की गति मंद, काँधे झुके
इतना था सुगंधि का भार
पुलकित पिक गाने लगी
सुर सरस स्वर में अपार।

आलाप लेने लगा आल्हादित
अवनि का अंग-अंग
तितलियों के परों के रथ,
बन गया सारथी अनंग।

कुछ उष्म हुए ठिठुरते
पंछियों के सीमे पाख
नव पल्लवों से भरने लगी
स्पंदित होने लगी शाख।

शिशिर को बढ़कर उसने
अपने आलिंगन में लिया।
बाकि बसंत ने उत्तर में
कुछ भी नहीं कहा।

•••


६)

अब अगर कोई उम्र का हिसाब-किताब पूछे तो ये क्यों न कह दूं :

'पच्चीस बसंत और बाकी पतझर।'

ठीक भी तो है ना!

उम्र का हिसाब बस बसन्तों में दिया जाना
बाकी मौसमों के साथ कोई इन्साफ नहीं।

•••


७)

वह नही कहता:
वेलेंटाइन डे वाली फरवरी है।
बातों बातों में जताता भी नहीं
कि बेसिकली बसंत है।

( कभी इसरार नहीं/ कोई तकरार नही )

बस लिख भेजता है किसी दिन
स्माइली के साथ
दो लाइन का एक टेक्स्ट:

'मुग़ल गार्डन चलोगी?
बस इन्ही दिनों खुलता है।'

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