मदन कश्यप

 नये युग के सौदागर


ये पहाड़ों की ढलान से आहिस्ता - आहिस्ता उतरने वाले
तराई के रास्ते पांव - पैदल चलकर आने वाले
पुराने व्यापारी नही हैं

ये इमली के पेड़ के नीचे नही सुस्ताते
अमराई में डेरा नही डालते
कांख में तराजू दबाये नही चलते

ये नमक के सौदागर नही हैं
लहसुन - प्याज के विक्रेता नही हैं
सरसों तेल की शीशियां नही हैं इनके झोले में

इन्हें सखुए के बीज नही पूरा जंगल चाहिए
हंड़िया के लिए भात नही सारा खेत चाहिए

ये नये युग के सौदागर हैं
हमारी भाषा नही सीखते
कुछ भी नही है समझाने और बताने के लिए इनके पास
ये सिर्फ आदेश देना जानते हैं
इनके पास ठस - ठस आवाज करने वाली
क्योंझर * की बंदूकें नही हैं
सफ़ेद घोड़े नही हैं
नही रोका जा सकता इन्हें तीरों की बरसात से

ये नये युग के सौदागर हैं
बेचना और खरीदना नही
केवल छीनना जानते हैं
ये कभी सामने नही आते
रहते हैं कहीं दूर समंदर के इस पार या उस पार

बस सामने आती हैं
उनकी आकांक्षाएं योजनाएं हवस

सभी कानून सारे कारिंदे पूरी सरकार
और समूची फ़ौज इनकी है

ये नये युग के सौदागर हैं
हम खेर ** काटते रहे
इन्होंने पूरा जंगल काट डाला
हम बृंगा *** जलाते रहे
इन्होंने समूचा गांव जला दिया ।



* ओडिसा का एक शहर जहाँ बंदूकें बनती हैं ।
** जंगली घास
*** खर - पतवारों को इकठ्ठा कर जलाना

००००००

[ ३ ]  बिजूका ​


​सबसे पहले दुनिया को बदलने का सपना मरा
एक खूबसूरत दुनिया में हो मेरा घर की जगह पर मैं
​सोचने लगा
दुनिया में हो मेरा खूबसूरत घर
फिर एक - एक कर वह सब कुछ मर गया
जिनके मरने से आदमी मर जाता है


अपने कुटुंब को आपद - विपद से बचाने के लिए
राजी - ख़ुशी ही तो मैं खड़ा हुआ था यहाँ अनंत की ओर बाहें फैलाये


धीरे - धीरे मेरा कपड़ा तब्दील हो गया लत्ते में
धरती में गड़े पाँव और फैले हुए हाथ
जड़ता के ताप में सूखकर लकड़ी हो गये
बदन काठ का एक टुकड़ा भर रह गया
फिर एक दिन महसूस हुआ
मेरा सर एक औंधी हुई हांडी में बदल गया है
महीनों दाल पकाने के बाद त्याग दी गई काली हांड़ी में ।

००००००

रचनाकार ----- मदन कश्यप
प्रस्तुति ------ -- मीता दास

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