नित्यानंद गायेन अन्य कविताएं
 

कहीं से तो हो शुरुआत


पता नहीं किसने तय किया था
सूरज के उगने की दिशा
और जब वह उग जाता है
तब भी आधी दुनिया में फैला रहता है अंधकार
यह बहुत अन्याय है !
आप चीखते रहिए गला फाड़ कर
सूरज पर
कि उसने क्यों तय किया अपनी दिशा
अंधेर नगरी के लोग हाथ उठा के चीख रहे हैं
कोस रहे हैं सूरज को
कि अब भी फैला हुआ अँधेरा
आधी दुनिया में
उन्हें सब्र ही नहीं |
एडिसन का बल्व आज भी नहीं फैला सकी है रौशनी लाखों घरों में
तो पत्थर लेके कहाँ खोजोगे उसे ?
यह सही है कि अँधेरे में डूबे लोग ही चिल्लाते हैं सुबह के लिए
और भरे पेट वाले ही ज्यादा चिंतित हैं
भूखे लोगों के लिए
किन्तु उनकी चिंता
चिंता तक ही सीमित है
अपने अनाज के गोदामों से कभी नहीं करते दान
अन्न का एक अंश भी
उनका दुःख यह है
कि उनके सिवा कोई और कैसे कर सकता है
भुखमरी की बात !
कैसे उनके मठों से पहले किसी ने की
भूख पर बात !
जायज है यह चिंता |
उजाले पर उनका पेटेंट हो जैसे
मानवाधिकार का सारा अधिकार
अमेरिका ने ले रखा है
बंदूक की नोक पर !
जो हमसे न हो सका
आप ही करो
तब कुछ बात बने |

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 क़त्ल को हादसा बना दिया जाता है यहाँ


भूल गया है देश
अभी और भी कोई 3 दिसम्बर आ सकता है
छीन लेगी हमसे
हमारी सांसे
गैस भी अदृश्य होता है
प्राणवायु की तरह
कोई नहीं जानता कब
किस रूप में हवा में घुल जाये जहर
और प्रवेश कर जाये हमारी सांसो में
यह साजिशों का दौर है
हम अब भी अचेत हैं
जयगान का शोर इतना तेज है
कि कान के साथ -साथ
कमज़ोर हो चुका है
सूंघने की शक्ति हमारी
हम ठीक से सूंघ नही पा रहे है
साजिश की बू

जीने के लिए जरुरी है
कि समय रहते हम
साफ़ कर लें
अपने कान और नाक
और सुन ले साजिशों की आहट
पहचान लें हवा में घुल रही ज़हर की गंध को |


कोई पूछे सवाल - क्यों ?

मौसम किस कदर बदला देखिये
हत्यारे को माफ़ी मिली
बेगुनाह को फांसी !
रुकी नहीं है अभी
सत्ता की हँसी !
टीवी रोज दिखाए हत्याओं की कहानी
हत्यारे को नहीं
बलात्कार हुआ सबको पता चला
बलात्कारी का चेहरा ढका है
कोई पूछे सवाल - क्यों ?
मौसम किस कदर बदला देखिये
आग खुद करे अब जलन की बात
हत्यारा करने लगा है
हमारी सुरक्षा की बात
जबकि उसके हाथों में
खून के धब्बे बाकी है अभी तक
उसके जयकार के शोर में
भूख से रोते बच्चे की मौत हो जाती है हर रात
सिपाहियों की कदमों की आहट ने चीर दिया है
रात के सन्नाटे को
तुम्हें भ्रम है
तुम्हारी बस्तियां सुरक्षित है !

राजा अपने कक्ष से
लगातर हंस रहा है
सहमे हुए हमारे चेहरे देख कर
गूंगी प्रजा राजा की ताकत बन चुकी है
सत्ता को मंजूर नहीं कोई सवाल
राजा ने खुद को ईश्वर मान लिया है |

००००००

रचना : -----नित्यानंद गायेन
प्रस्तुति : ---- मीता दास


 


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