निदा नवाज़
 

कर्फ्यू


चील ने भर दी है
अपने पंजों में
शहर की सारी चहल-पहल .
सड़कों पर घूम रही है
नंगे पांव चुप्पी की डायन .
गौरैया ने अपने बच्चों को
दिन में ही सुला दिया है
अपने मन के बिस्तर पर
और अपने सिरहाने रखी है
आशंकाओं की मैली गठरी .
हवाओं के सर्प
पेड़ों की टहनियों में
भर रहे हैं डर .
दूर बस्ती के बीच
बिजली के खम्बे के उपर
आकाश की लहरों पर
कश्ती चलाता एक पंछी
गिर कर मर गया है.


वह मिलती है
(वजूद-ए-ज़न से है तस्वीर-ए-कायनात में रंग)


वह मिलती है
अल्ट्रा सोनोग्रफिक स्क्रीन पर
माँ के गर्भ में दुबकी
अंजाने डर से सहमी
एक डाक्टर को हत्यारे के रूप में
देखती हुई

वह मिलती है
स्कूल के आंगन में
मासूम सी मुस्कान
और तितली सी पहचान लिए
भविष्य के छोर की ओर दोड़ती
सामने वाली खाई से बेपरवाह
छोटी-छोटी गोल-गोल
आँखों में
ढेर सारे सपनों को
संजोती हुई

वह मिलती है
चहरे पर इन्द्रधनुषी रंग बिखेरती
दांतों तले ऊँगली दबाती
पूरे ब्रम्हाण्ड को निहारती
अपनी आँखों से
प्यार छलकाती
होंठों के नमक को
पूरे सागर में बांटती हुई

वह मिलती है
झील-ए-डल के बीचों-बीच
कहकहों की कश्ती पर
अपने पानी में लहरें तराशती
कमल तोड़ता
अपने ही आप से बातें करती
मुस्कुराती
झरनों के जल तरंग के बीच
भीगती हुई

वह मिलती है
अपने ही खेत की मेंड पर बैठी
धान की पकी बालियों को
अपने कोमल हाथों से सहलाती
दरांती की धार को महसूस करती
भीतर ही भीतर शर्माती
नजरें झुकाती
यौवन के सारे रंगों में
नहाती हुई

वह मिलती है
क्रैकडाऊन की गई
बस्ती के बीचों-बीच
लोगों के हजूम में
कोतवाल की वासना भरी नज़रों से
अपने आपको बचाती
अपने चेहरे पर उमड आई
प्रवासी भावना को छुपाती हुई

वह मिलई है
अँधेरे रसोई घर के
कड़वे कसैले धुएं को झेलती
मन की भीतरी जेब में
माचिस और मिट्टी के तेल की
सुखद कल्पना संभालती
चूल्हे में तिल-तिल
जलती हुई

वह मिलती है
पत्तझड़ के मौसम में
अपने बूढ़े चिनार की
मटमैली छाँव में
झुर्रियों की गहराई मापती
दु:खों को गिनती
आईने को तोड़ती हुई

वह मिलती है
जीवन-मरुस्थल में टहलती
रेत की सीढ़ियां चढती
कैकटस के ज़िद्दी काँटों से
दामन छुड़ाती
यादों की सीपियाँ समेटती
इच्छाओं के घरोंदे बनाकर
उनको ढहते देखती
रोती बिलखती
अपने ही सूखे आंसुओं में
डूब कर मरती हुई

वह मिलती है
उम्र के सभी पडावौं पर
संसार की सारी सड़कों पर
अपने पदचिन्ह छोड़ती
रूप बदलती
जीवन को एक
सुन्दर और गहरा अर्थ देती हुई .


 नव वर्ष मुबारक हो

लम्हों का घुमाव है
यह सारा जीवन
इन ही की नोक पर
परिस्थितियों की मोरनी के संग
करते रहते हैं हम सब
एक अंतहीन नृत्य
और ये परिस्थितियां ही
लिखती है
हमारे भाग्य की इबारतें
यही खींचती हैं
हमारे जीवन की रूप रेखा
बजाती हैं
हमारी सांसों की बांसुरी
बीनती हैं
हमारे विचारों की ख़ुशबु
समय और स्थान की
मुट्ठी में है सब कुछ
इस से परे कुछ भी नहीं
परिस्थितियों का
उल्ट फेर है समय
और विभिन्न तत्वों के
उलट फेर से हैं
सब जीव जन्तु...
मानव,पशु-पक्षी,पेड़-पौधे
सब एक दूजे के आधार
सनातन सम्बन्धी
अनादि काल के भाई-बन्धु
जीवन है मिलने बिछुड़ने
और आकार बदलने का
एक प्राकृतिक उत्सव
कठपुतलियों का
एक विराठ खेल
समय और स्थान की
कड़ियों के बीचऊंबीच
इस विशाल ब्रम्हाण्ड के
एक छोटे से कोने में
इस छोटे से ग्रह पर
रचते हैं हम सब
अपनी अपनी सृष्टि
खेलते हैं
जीवन और मृत्यु का
यह छिपा–छिपी का खेल
मृत्यु जीवन का ही
एक रूप
और जीवन
मृत्यु की कोख का ही
खिला एक फूल
कल,आज और कल
केवल एक काल्पनिकसमय-बंटवारा
हर समय हमारा है
हर वर्ष हमारा है
हम ही होंगे हर समय
परिस्थितियोंयों के पर्व में
रूप बदल कर
आकार बदल कर...
हर समय मुबारक हो
नव वर्ष मुबारक हो
हर वर्ष मुबारक हो .


रचनाकार : ---- निदा नवाज़
प्रस्तुति : -------- मीता दास

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