वर्जेश सोलंकी -हेमंत दिवटे

 

वर्जेश सोलंकी

स्टूल

लकड़ी के जिस स्टूल पर बैठकर आज तक कविता लिखते आया हूं
उसी के आज पाये उखड़ गए

बाबा ने कहा तेरे जनम के बाद ही ख़रीदा था
इसका मतलब स्टूल और मैं समकालीन

स्टूल फिर बढ़ई से रिपेयर करवा लिया जाए या
तोड़कर चूल्हे में डाल दिया जाए या
हाल ही में बाज़ार में आया नया फ़र्नीचर ख़रीद लिया जाए
इस तरह के फ़ालतू विचारों में ही कुछ दिन निकल गए
आजकल कविता में भी पहले जैसी धार नहीं आती
लिखना-पढ़ना टाला जाए
घर के खिड़की-दरवाज़े बंद करके
अंधेरे के आलम में सुस्त होकर पड़ा रहा जाए
ऐसा भी कितने ही दिनों तक लगता रहा

स्टूल खड़ा नहीं रह सकता था
पायों के आधार के बिना
मैं भी
जी नहीं सकता था
शब्दों के बिना . . . इंसानों के बिना . . .
यह समझ में आते ही
हथौड़ी और कीलें लेकर
मुझसे जैसे बन पड़े वैसे
उखड़ा हुआ एक-एक पाया जोड़ने लगा हूं


चूहा

चूहा मरा पड़ा है
घर में

मैं मां बाबा काका बहन
नाक-मुंह पर रूमाल कसकर
युद्ध स्तर पर ढूंढ़ रहे हैं
चूहा कहां मरा पड़ा है
अटारी पर, अलमारी में, फ़र्नीचर के नीचे,
कोने में, कचरे की टोकरी में
घर का चप्पा-चप्पा छान मारा फिर भी
फ़लाना एक जगह उसकी छोड़ी लेंड़ियों के सिवा
हाथ नहीं लगा है
उसका कलेवर
हमारे सर चढ़कर भनभना रहा है
दुर्गंध का हिंस्र जमाव

इतने दिन
मेरा चमड़े का नया बटुआ, मां की साड़ी
बहन के मेहनत से बनाए हुए नोट्स
बाबा का नींद में पैर
कुतरने वाले चूहे का
बाज़ार से ज़हर की गोलियां लाकर
सभी ने उसे मारकर ले लिया था प्रतिशोध

मैं मां बाबा काका बहन
शायद हम सभी के ख़ून में भी बहती चली होगी
चूहे की तरह
एक-दूसरे को नाहक कुतरने की पाशविक शक्ति
लड्डू में मिलाई हुईं ज़हर की गोलियों की तरह
हम भी जी रहे होंगे
रिश्ते-नातों के नाज़ुक स्वांग
एक-दूसरे के आगे सिद्धहस्तता से फुदकते

घर में
चूहा मरा पड़ा है



महादेवन

महादेवन
ऑफ़िस की दो मंजिलें चढ़कर आता
तो भी हांफने लगता
बॉस के सामने थर्राता
और हमारे बीच मंडराते हुए
बिगड़ता रहता
टेबल पर रखे पेपरवेट की तरह

महादेवन
दुनिया इधर की उधर हो जाए
साढ़े नौ बजे मौजूद हो जाता
ऑफ़िस के काम में टेंशन क्रिएट होने पर
निकाल लेता जेब में रखा अय्यप्पा

महादेवन
तीस का है कहा जाने पर भी
देखने वाले को वह बात झूठ लगती
इतना वह उम्र में आगे सरक चुका था
अंदर धंसे हुए गाल
पीछे से पड़ता आने वाला गंज
कमीज़ उतारने पर
लग जाता हड्डियों का हिसाब
यह था हाल
चेहरा
दस जगह जैसे पैबंद लगे हों

महादेवन
सांताक्रूज की किसी परचून चाल में
मासी के यहां महीना दो हज़ार देकर रहता था
मां मर चुकी थी. बाप शराबख़ोर.
ज़रा भी पैदावार न देने वाली पड़ी हुई ज़मीन
पीछे दो बहने ब्याहने वालीं
ऐसा था टेरिफ़िक फ़ैमिली बैकग्राउंड
पिस्सू जैसा

महादेवन
मैटिनी पर लगी गरम फ़िल्मों के बारे में बतियाता
कभी नहीं मिला या
ताव में आज की गांडू राजनीती की समीक्षा करता
वह कभी नहीं दिखा या
पैदल चलकर ऑटोरिक्शा का वाउचर पास करने के
फंदे में कभी नहीं पड़ा
इतना वह सोबर था

पानबीड़ीतंबाकूसिगरेटदारूलड़की
इत्यादि व्यसनों से चार हाथ दूर रहने वाला महादेवन
नींद में ही चला गया यह पता चलते ही
धम्म से मेरे सामने आ गईं
सफ़ेद-चिट्टी इडली जैसी उसकी आंखें
खुन्नस-रहित

इसके आगे का महादेवन देखना
मुझे पक्के तौर पर भारी पड़ने वाला था



आख़िर बिलकुल नज़दीकी व्यक्ति की मृत्यु भी


आख़िर बिलकुल नज़दीकी व्यक्ति की मृत्यु भी हम सहजता से सह लेते हैं
पहले-पहल तो तस्वीर पर नियम से चढ़ाते हैं ताज़े फूलों का हार
बाद-बाद में तो फ़्रेम पर जमी धूल पोंछने को भी आती है मनस्वी ऊब
‘प्रिय, ऐसा एक भी दिन नहीं जाता कि तुम्हारी याद न आती हो’
यह लिखकर
किसी स्मरणिका में छपवा देते हैं नज़दीकी व्यक्ति का फ़ोटो एकदम
विवरण सहित
या श्राद्ध के दिन बनाते हैं कुछ मीठा-वीठा, तीखा, उसकी पसंद का
सच कहें तो हमें जीना ही नहीं आता किसी का भी दुख
उसके बुझने के समय, हम होते हैं मरने की हड़बड़ी में नए फ़्लैट के लिए
फ़र्नीचर देखते हुए या
कलीग की दी हुई प्रमोशन पार्टी में फ़ोकट में मिली बियर पीते या
एक प्रक्रिया के तौर पर उसकी कॉट के पास दवा की गंध की तरह
लड़खड़ाते
दवा की ख़ातिर ही
आख़िर बिलकुल नज़दीकी व्यक्ति की मृत्यु भी हम सहजता से
सह लेते हैं



बिजली जा चुकी होती है


बिजली जा चुकी होती है
काम से
रात को
मैं
घर आता हूं जब

घर में
फैला होता है अंधेरा
एक ओर
टिमटिमा रहा होता है
मोमबत्तियों का उजाला
बहन पढ़ाई कर रही होती है
दिया पास में रख
कल होने वाली परीक्षा की
बाबा तर होकर पलंग पर
मां
स्टोव के सामने भनभनाती

मुझे दिखाई देता है
छत के शीशे में चांद
छिपकली की तरह धीरे-धीरे आगे सरकता
दिखाई देती है रात
चूल्हे के धुएं से काली
पड़ चुकी दीवार के जैसी

अंधेरे को थोड़ा लीपने के बाद
मोरी में ही
मैं हाथ-पैर धो लेता हूं
अंजुली के पानी में ही
देखने की कोशिश करता हूं
ख़ुद का थका-मांदा चेहरा
इतने अंधकार में भी
मुझे दिख जाते हैं
किसी हिंस्र जानवर के
पंजों के निशान
आंखों की रंगोली में
मिट्टी काली करके जा चुके

काम से
मैं
जब घर आता हूं
बिजली जा चुकी होती है.

...........

 

हेमंत दिवटे

मोहक


बेटे के मन में कोई मोहक है
जिसका वह इंतज़ार करता रहता है
या खोजता रहता है उसे  
बगीचे में, मैदान पर
या इधर-उधर फ़ोन करके

सुबह-सवेरे उसे
मोहक पीठ पर मुक्का मारकर
या उसकी जांघ पर
चिकोटी काटकर जगाता है
कभी उठता है हड़बड़ाकर वह नींद से
और रोते-रोते ही कहता है
मोहक की स्कूल बस छूट गई
तो कभी यह कि
मोहक ने उससे कुट्टी कर ली

हमने बहुत ढूंढा मोहक को
जन्मदिन पर बुलाने के लिए
बीवी ने छान मारा सारा कॉम्प्लेक्स
चेता दिया सिक्योरिटी को भी
जन्मदिन पर बेटे ने पांवों को हाथ में बांधकर
बहुत राह देखी
मोहक की
पर मोहक आया ही नहीं
आख़िर ऊबकर
मोहक का रिटर्न गिफ़्ट और केक-पीस
टेबल पर रखकर
वह सो गया

२.
कार्टून नेटवर्क का प्रोग्राम देखा
उसकी टाइम लाइफ़ की किताबें खोजीं
पज़ल-गेम खंगाल डाले
स्कूल में संदेश भेजा
सबकुछ कर लेने पर भी
मोहक का पता नहीं लगा

एक बार बेटे ने कहा
आज मैं और मोहक
खेल रहे थे टीवी गेम
और जब मैंने उसे 100 मीटर की रेस में
हरा दिया तो
टीवी गेम के सॉफ़्टवेयर ने ख़ूब तालियां बजाईं
मगर मोहक ने एक भी नहीं
अब मैं उससे कुट्टी हूं

मां से पूछा
“क्या उसका कोई दोस्त आया था खेलने?”
मां ने कहा “कोई भी नहीं”
पिता से पूछा
“आप उसके साथ क्या-क्या खेलते हैं?”
पिता ने कहा “पज़ल-गेम”
जब उससे गुस्सा होकर पूछा तो
वह बोला “कोई नहीं है मेरे साथ खेलने वाला”

३.
एक मोहक है
मेरे भी मन में
और मैं भी
बेटे का मन बनकर
न जाने कब से कर रहा हूं
उसका इंतज़ार



तितलियां

कॉम्प्लेक्स के गार्डन में घूमते हुए
मैंने यों ही मित्र से कहा
अरे, गहरे पीले रंग की
छोटी तितलियां
नज़र ही नहीं आतीं आजकल
तो वो सहजता से बोला
वह ब्रैंड अब बंद हो चुका है



आज 1 जुलाई है 10 बज रहे हैं

आज एक जुलाई है
एक जुलाई को मुझे बच्चा होने वाला है
पत्नी को पंडित जी ने बताए हैं तीन मुहूर्त
डॉक्टर को सुबह का फ्रेश मुहूर्त अच्छा लगा
सुविधाजनक लगा सभी को

दस बजे नहीं होता
स्टेशन रोड पर ट्रैफ़िक जाम
दस बजे होता है हर अस्पताल में
किसी न किसी के बच्चे का जन्म

दस बजने से पहले
मेरे मन में दस लाख विचारों का
हो रहा है जन्म और मरण
विचार अमीबा की तरह जन्म ले रहे हैं
अमीबा की तरह मर रहे हैं
मेरे विचारों का ड्रेनेज सिस्टम
हो चुका है जाम

होने वाले बच्चे की सोनोग्राफ़ी में
गर्दन को बल डालती हुई नाड़ी
कास रही है फंदा मेरे गले पर
मेरा दम घुट रहा है
एक सीज़ेरियन ब्लेड मुझे चीर-चीर चीर रहा है
ख़ून की एक पिचकारी
फूट पड़ी है मेरे मन में
ब्लेड मेरे मन में सरक रहा है
आड़े-तिरछे
एक खंजर खच् खच् फाड़ रहा है मेरा गला
आरपार
कोई म्यूज़िक किसी पुराने टेप रिकॉर्डर के
उजड़े हुए हेड को घिसकर
रगड़कर
खिसक रहा है मेरे मस्तिष्क में
रिस रहा है
सत्रह सौ साठ सुइयों से छिदे हुए रंध्रों से

बच्चा होने वाला है
जीवित या फिर शायद मृत
मन की हत्या करके
बच्चा होने वाला है या
होने वाला है मन की हत्या से छूटकर

बम विस्फोट हो रहे हैं सीरियली
मेरे सर में
मुझे रौंद-रौंदकर मार रही है भीड़
मैं पागलों की तरह कर्फ़्यू लगे रास्ते पर
दौड़ रहा हूं
मेरे पीछे लगा हुआ है हथियारबंद जमघट
दंगा शुरू होने वाला है
मुझसे
मुझसे शुरू होने वाली है
फांसी की शुरुआत
मुझसे शुरू होने वाला है युद्ध
ये एंबुलेन्स, फायर ब्रिगेड की गाड़ियां
सफ़ेदपोश स्ट्रेचर वाले
सफ़ेद कपड़ों वाली थुलथुल नर्सें
सायरन बज रहे हैं भयावह
गोलियों, विस्फोटों की आवाज़ें
बरस रही है प्रेतों की धज्जियां
मेरे ही प्रेतों के परखचे
लाखों बीवियां छाती पीट-पीटकर
रो रही हैं
जड़ रही हैं ख़ुद को ही थप्पड़
सब मेरी ही पत्नी की हमशक़्ल हैं

एक विराट आईना गिर पड़ा है
टूटकर एक विशाल मैदान में
हर आईने में लहूलुहान
मेरी एक आंख तड़प रही है
सारी दुनिया में मेरी अनाथ आंखें
कर रही हैं इंतज़ार दस बजने का
दस बजे मैं कौन होऊंगा?
बच्चे का बाप? या फिर
मरे हुए मन का?
मेरे मन में दस बज रहे हैं
और दुनिया मेरी ओर मुंह किए खड़ी है
ठसाठस इकट्ठा होकर

देख रही है दुनिया मेरे चेहरे पर कैमरे ताने
लाइव टेलीकास्ट ऑफ़ बिकमिंग अ फादर
लाइव टेलीकास्ट ऑफ़ बिकमिंग मैड

दस बज रहे हैं
क्या दस बज रहे हैं?
क्यों बज रहे हैं?
दस बज रहे हैं
बज रहे हैं दस
बज रहे दस हैं दस रहे हैं बज रहे हैं बज दस

कहां बज रहे हैं?
या मैं दस बजने की कल्पना कर रहा हूं?
कल्पना कर रहा हूं या
जिस-तिस की घड़ी में, मोबाइल में
कंप्यूटर में, एफ़.एम. पर, टीवी पर
स्टेशन पर, बस में, ऑफिस में, मरघट में, कार में
बार में, गली-कूचे में, सारी की सारी मुंबई में
दस बज रहे हैं

आओ दस बजे करें हम सेलिब्रेट
चलो दस बजे हो जाएं हम स्किट्ज़ोफ़्रीनिक
चलो दस बजे हो जाएं हम एक के दस या
दस के एक

किस भाषा में दस कैसे बजते हैं?
अलग-अलग भाषाओं में एक ही दस बजें
अलग-अलग रंगों में एक ही दस बजें
एक बार दस बज जाएं किसी भी तरह

कम से कम आज तो बज ही जाएं



एक नॉस्टैल्जिक भजन


जैसा कि तय था, कल ही मां और पिताजी से सदिच्छा भेंट हुई
कल के फ़ोटो भी ‘पैरेंट्स’ वाले फ़ोल्डर में सेव कर लिए
सावधानी के तौर पर एक फ़ाइल ऑनलाइन भी लोड कर दी
काम से निजात पाई
फिर भी निरंतर गूंज ही रहा है मन में यह नॉस्टैल्जिक भजन

२.
जब वे यहां थे, सारा घर ही नॉस्टैल्जिक हो जाया करता
पिताजी की भूतों वाली कहानियां
बीमारी के बाद वाला उनकी गर्दन का निशान
हो जाता बिलकुल ठोस
श्रद्धा के मैदान में उनका जीवट करतृत्व
हॉल के हर कोने में छटपटाता रहता
गलीचे के ऊपर रखे मालिश के तेल की उग्र महक से
मैं चिढ़ जाता
जब वे लाठी टिकाकर चलते तो उनकी छाती की धौंकनियां
बढ़ा देतीं मेरा ब्लड प्रेशर
अनुवांशिकता का एक वायरस उनसे होते हुए मुझमें
उतरकर मचा रहा है उधम
कॉरपोरेट मित्रों को लगता मल्टीपरपस
उनका और मेरा साथ-साथ रहना
कवि मित्र सराहते हैं देशीयता के प्रति मेरे समर्पण को
और उनके निमित्त से मैंने भी कर ली अनुभव झूठी महानता
उन्हें घिसट-घिसटकर चलते हुए देखकर
डिस्चार्ज हो जाता है मेरा पावरप्लस आवेग
दिनभर के काम का स्ट्रैस
मां से मिलने पर बदल लेता दिशा
उनके फटे हुए पैरों पर
चारों खाने चित पड़ा भूतकाल
और उनके खुरदरे हाथों का दर्दनाक वर्तमान
मेरे हृदय के ग्रेनाइट पर सरसर जाता है रगड़

३.
उनसे मिलने का मतलब
सबकुछ ढह जाना
अब मैं उनसे कैसे मिलूं?
दिल पर पत्थर रखकर मिलूं या मिलूं जैसे मिला करता था हर रोज़
घर आने पर — आंखों से ही?
या वैसे जैसे कभी दो-चार शब्द कहकर मिलता
दमघोंट संवाद करते-करते
खाना खा लिया? तबीयत कैसी है?
आज किसी का फ़ोन वगैरह?
कैसी है गर्दन? कैसी है पीठ?
सांस तो नहीं फूलती? बिस्तर लगा दूं?
कैसे हैं पंढरी काका? कैसे हैं फलाना-ढिकाना?
आप तो वह भी नहीं पूछा करते
लेकिन मैं आपके चेहरे पर देख लिया करता
मेरा आपके आसपास होने का संतोष
और मेरे हृदय में आपका क्षीण सहवास

४.
अब हम कितने आदी हो चुके हैं न
फ़ोन पर हालचाल पूछने के
इतने ज़्यादा कि प्रत्यक्ष मिलने पर क्या बोलना है
इस उलझन का अंधेरा
अब हमारे दरमियान बचता ही नहीं
और औपचारिकता का नारियल फोड़ने की
कृत्रिम आवश्यकता नहीं रहती
फ़ोन पर अपने आप हम
कनेक्टेड होने का हैलो बोलते हैं
पूछते हैं कि सब कैसे हैं
सुखी होने की आह भरते हैं
फोन पर ही सब अपना नाता कैसे निपट
मां-बाप-बेटे का बन गया है
और प्रत्यक्ष मौका आने पर कैसे हम
परायों की तरह
एक-दूसरे को टालते-टालते हुए मिलते हैं
मुझे पता है कि आप कितना ख़ुश होते हैं
यह जानकर कि मैं आपसे मिलने आने वाला हूं
तब आप अपने मन का मंदिर बुहार लेते हैं
पूजा-अर्चना करते हैं पोथी पढ़ते हैं
आपको भूख नहीं लगती चाय तक की तलब नहीं होती
जैसे आपका ईश्वर ही मिलने आने वाला हो आपको
और मैं भेंट से पहले और बाद में
मुरझाए हुए फूल की तरह
आपके स्निग्ध मन-मंदिर में ख़ुद को
पूरी तरह न बहाकर या बहा देने से पहले ही बन जाता हूं निर्माल्य



शॉपिंग करते समय आए हुए सपने

सामने वाली इस मादक औरत के हाथ का
जैगुआर शावर हूं मैं
सर से पांव तक उसे चूम रहा हूं
घुरघुरा रहा हूं उसके सारे छिद्रों पर
लगता है जैसे घुसकर देख रहा हूं उसके छिद्रों में
उसका अंग-अंग खिल उठा है
मेरा अंग-अंग बिसर चुका है

वह मुझे लटकाती है परितृप्त होकर
मैं एकदम से उसके अंगों को घिसने वाला
वैलस्पन टॉवल बन जाता हूं
सर से पांव तक उसे पोंछ डालता हूं
उसके अंग-अंग पर अपने होंठ घुमाता हूं
टपक-टपक जाता हूं सराबोर होकर
मसल डालता हूं मैं उसे वह मुझे

मैं उसे अच्छी तरह मथते हुए
राह देखता हूं
अंतिम मंथन की

कराह उठती है वह
जब मैं उसके बालों का गुच्छा बनाता हूं
और मेरा गुच्छा फूटने से पहले ही
वह मुझे
दुत्कार देती है

मैं छटपटा रहा हूं
उस क्रूर मादा का इंतज़ार करते हुए

जैसे मेरी तरह तुम सारे
शावर और टॉवल
इस शॉपिंग मॉल के लेवल टू के
लेफ़्ट-आउट कोनों के

२.
मैं इस मॉल के फर्निचर ज़ोन का
एक ब्रैंडेड सोफ़ा हूं
कुछ देर के से एक बिना बैग वाली औरत मुझ पर सवार है
उसकी गुदा में फंस गई है मेरी नाक
मैं पिचक गया हूं उसके भार से
हे ईश्वर मुझे इसके ड्रॉइंग रूम का
नर्क मत दिखाना
मैं इसके एवज़ में
तुम्हें घसीटाराम के 21 मोदक खिलाऊंगा
11 भिखारियों को मक्डॉनल्ड्स का मिनी लंच खिलाऊंगा
तुम्हारी एक रात सजाऊंगा


 


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