मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 (ISSN 0976-5158)   

नव्वदोत्तरी मराठी कविता विशेषांक
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आधुनिक मराठी कविता की एक शताब्दी लगभग पूरी होने को आई है. इस कविता यात्रा में पहला महत्वपूर्ण मोड़ केशवसुत उर्फ़ कृष्णाजी केशव दामले (1866-1905) की कविता लाई, जो अंग्रेज़ी सौंदर्यवादी भाव कविता से प्रभावित होने के बावजूद आधुनिक थी. भारत की किसी भी भाषा में मज़दूर पर कविता लिखने वाले केशवसुत पहले कवि थे. यात्रा में अगला मूलगामी परिवर्तन लाने वाले कवि थे बाल सीताराम मर्ढेकर  जिन्हें नव कविता का प्रणेता माना जाता है. हिंदी कविता में जो स्थान गजानन माधव मुक्तिबोध का है, वही स्थान मराठी कविता में मर्ढेकर का माना जाता है. मुक्तिबोध की ही तरह, मर्ढेकर निबंधकार, आलोचक और उपन्यासकार भी थे. उन्होंने विंदा करंदीकर जैसे विशिष्ट समकालीन मराठी कवियों को बहुत गहराई से प्रभावित किया. गजानन मुक्तिबोध के छोटे भाई शरच्चंद्र मुक्तिबोध  भी मर्ढेकर जितने ही महत्वपूर्ण आधुनिक मराठी कवि-समीक्षक थे, लेकिन मर्ढेकर की काव्योपलब्धि का आकलन शरच्चंद्र की दृष्टि में कुछ और था, क्योंकि शरच्चंद्र मूलत: आशावादी थे और मर्ढेकर निराशावादी.
बीसवीं सदी के मध्य के आसपास कई नए लेखक समूहों, स्कूलों, और साहित्यिक एवं सामाजिक आंदोलनों के उद्भव के कारण मराठी कविता ने एक खंडित रूप धारण करना शुरू कर दिया.
सरबजीत गरचा

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कोई अनजान आदमी आत्महत्या कर ले
मरते हुए उसकी जेब में अपना
नाम-पता मिल जाए
उसी तरह तुम्हारी लू
मेरी कविता में जगह-जगह बिखरी हुई है
सलील वाघ
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मैं उठाकर देखती हूं रिसीवर
एक बार फिर यह सुनिश्चित करने के लिए
कि फ़ोन चालू है . . 
कविता महाजन
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ईश्वर एक ऐसी चीज़ है उस्ताद
जो पहरेदार है तुम्हारे सद्विवेक के ख़ज़ाने का
या अभय का अड्डा
तुम्हारे किए-अनकिए पापों का
मनोज सुरेंद्र पाठक
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दोस्त! कीचड़-मिट्टी में खेलते-खेलते
हमने ‘जय भीम’ के नारे लगाना सीखा
ख़ूब आंच लेकर ही
हमारे तलवे हो गए बड़े
वैसे ही एड़ियों की दरारें भी
अरुण काले
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इस दृश्य के एक दृश्य में
एक अतृप्त आदमी
ज़मीन पर महज़ बैठा हुआ है
और उसके पास कुछ नहीं है
दिनकर मनवर 
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दो बंद हो चुकी घड़ियां
मेरी आंखों के खांचों में
एक में दस बजकर चौदह मिनट हुए हैं
दूसरी में चौदह बजकर दस मिनट.
अपनी कलाई की आंखों में देखकर
बताता हूं तुम्हें
कि कितना टाइम बचा है.
सचिन केतकर

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कवियो,
इक्कीसवीं सदी की कवियो

कम से कम एक मिलियन आंखें डिजिटल
पर कविता के लिए अवेलेबल केवल दस

इंटरनेट पर नग्नता सिडक्शन की लाल बाराखडी को स्टैंसिल करते हुए बॉडीफाय हो रही है
कम्यूनिकेशन की battery all time चार्ज हो रही है
इन्फॉर्मेशन को fashion का दर्जा प्राप्त हो रहा है
और हर ऐरा ग़ैरा डिज़ाइन किए हुए कपड़े पहनकर वेबसाइट बना रहा है

इस बेशुमार काल में
कविता के लिबास के नीचे बॉडी ही नहीं बची है
कविता की battery ह्रदय को रीचार्ज नहीं कर रही है
कविता की वेबसाइट पर कोई भी रहने के लिए नहीं आ रहा है

ऐसे समय में, कविता के धंधे के लिए क्या तुम तैयार हो, कवियो?

चेहरे पर मेकअप पोतकर उनका मुखौटा बनाने वाले सौंदर्यशास्त्र आसपास
विशफुल थिंकिंग का सोप ऑपरा पेश करने वाला व्यवहारज्ञान सीधे सांसों में

यह पाइपड्रीम है या पाइपों का बिज़नेस है?
यह टेक का फ्यूचर है या रेवल्यूशन फीचर है?

कंपनियां रिस्क में भकभका रही हैं या फलफला रही हैं?
यह काल के ऊपर आक्षेप है या काल का हस्तक्षेप है?

इंसान को डिजिटल नैरेटिव बनाने वाला यह काल
कलेजे को सोशल मीडिया बनाने वाला यह इंटरनेट का फाल?

श्रीधर तिलवे

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एक नॉस्टैल्जिक भजन

जैसा कि तय था, कल ही मां और पिताजी से सदिच्छा भेंट हुई
कल के फ़ोटो भी ‘पैरेंट्स’ वाले फ़ोल्डर में सेव कर लिए
सावधानी के तौर पर एक फ़ाइल ऑनलाइन भी लोड कर दी
काम से निजात पाई
फिर भी निरंतर गूंज ही रहा है मन में यह नॉस्टैल्जिक भजन

२.
जब वे यहां थे, सारा घर ही नॉस्टैल्जिक हो जाया करता
पिताजी की भूतों वाली कहानियां
बीमारी के बाद वाला उनकी गर्दन का निशान
हो जाता बिलकुल ठोस
श्रद्धा के मैदान में उनका जीवट करतृत्व
हॉल के हर कोने में छटपटाता रहता
गलीचे के ऊपर रखे मालिश के तेल की उग्र महक से
मैं चिढ़ जाता
जब वे लाठी टिकाकर चलते तो उनकी छाती की धौंकनियां
बढ़ा देतीं मेरा ब्लड प्रेशर
अनुवांशिकता का एक वायरस उनसे होते हुए मुझमें
उतरकर मचा रहा है उधम
कॉरपोरेट मित्रों को लगता मल्टीपरपस
उनका और मेरा साथ-साथ रहना
कवि मित्र सराहते हैं देशीयता के प्रति मेरे समर्पण को
और उनके निमित्त से मैंने भी कर ली अनुभव झूठी महानता
उन्हें घिसट-घिसटकर चलते हुए देखकर
डिस्चार्ज हो जाता है मेरा पावरप्लस आवेग
दिनभर के काम का स्ट्रैस
मां से मिलने पर बदल लेता दिशा
उनके फटे हुए पैरों पर
 

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मंगेश नारायणराव काले

यह आकार है

यह सन्नाटा है अब साथ
और हमने तो कुछ भी नहीं लिया था
सच कहें तो लेने के लिए थी ही नहीं जेब
दर्ज़ी ने सिली

सिर्फ़ आकार था पतलून में जेब का
और जेब के आकार में सिला
एक नोट का आकार
हमारे साथ आया हुआ

जो ख़र्च नहीं किया जाने वाला था कभी
ऐसा शाश्वत नोट है हमारे पास
जेब के आकार में सिला हुआ
सच कहें तो थी ही नहीं जेब पतलून में

सिर्फ़ आकार ही तो सिला है
दर्ज़ी ने पतलून में
और बस जेब के आकार में
एक नोट का आकार है जड़ा

नोट के आकार में एक क़ीमत
न ली जा सकने वाली चीज़ों की
सिर्फ़ एक आकार है क़ीमत का
नोट के आकार में छिपा

उदहारण के लिए : एक नई कोरी साइकिल
होती है नोट के आकार में खड़ी
जो हमने कभी नहीं ली होती है
और चलाई भी नहीं होती है कभी

सिर्फ़ साइकिल चलाने का आकार
हू-ब-हू छिपा होता है नोट में
और उस आकार में खड़ी होती है मुट्ठी भर ख़ुशी
जो कभी नहीं मिली होती है हमें

मुट्ठी भर ख़ुशी के आकार में
डूबे होते हैं हमारे पच्चीस-छब्बीस साल
जो सच कहें तो फिसल चुके होते हैं
हमारे हाथों से अनजाने ही
.
***
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VOL - X/ ISSUE-III(मई जून जुलाई2017)

प्रमुख संपादकः
रति सक्सेना

अतिथि सम्पादक -सरबजीत गरचा

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