आधुनिक मराठी कविता की एक शताब्दी लगभग पूरी होने को आई है. इस कविता यात्रा में पहला महत्वपूर्ण मोड़ केशवसुत उर्फ़ कृष्णाजी केशव दामले (1866-1905) की कविता लाई, जो अंग्रेज़ी सौंदर्यवादी भाव कविता से प्रभावित होने के बावजूद आधुनिक थी. भारत की किसी भी भाषा में मज़दूर पर कविता लिखने वाले केशवसुत पहले कवि थे. यात्रा में अगला मूलगामी परिवर्तन लाने वाले कवि थे बाल सीताराम मर्ढेकर (1909-1956), जिन्हें नव कविता का प्रणेता माना जाता है. हिंदी कविता में जो स्थान गजानन माधव मुक्तिबोध का है, वही स्थान मराठी कविता में मर्ढेकर का माना जाता है. मुक्तिबोध की ही तरह, मर्ढेकर निबंधकार, आलोचक और उपन्यासकार भी थे. उन्होंने विंदा करंदीकर जैसे विशिष्ट समकालीन मराठी कवियों को बहुत गहराई से प्रभावित किया. गजानन मुक्तिबोध के छोटे भाई शरच्चंद्र मुक्तिबोध (1921-1984) भी मर्ढेकर जितने ही महत्वपूर्ण आधुनिक मराठी कवि-समीक्षक थे, लेकिन मर्ढेकर की काव्योपलब्धि का आकलन शरच्चंद्र की दृष्टि में कुछ और था, क्योंकि शरच्चंद्र मूलत: आशावादी थे और मर्ढेकर निराशावादी.


बीसवीं सदी के मध्य के आसपास कई नए लेखक समूहों, स्कूलों, और साहित्यिक एवं सामाजिक आंदोलनों के उद्भव के कारण मराठी कविता ने एक खंडित रूप धारण करना शुरू कर दिया. सौंदर्यशास्त्र, सामाजिक पृष्ठभूमि (चाहे वह वर्ग की हो या फिर क्षेत्र या जाति की) और सांस्कृतिक राजनीति की दृष्टि से, प्रत्येक समूह अलग-अलग सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करता था. इस काल की मराठी कविता को दुनिया के सामने रखने का प्रयास किया An Anthology of Marathi Poetry (1945-1965) ने, जिसका संपादन द्विभाषी कवि दिलीप चित्रे ने किया था. इस संचयन में 20 कवि सम्मिलित हैं और कुल 149 कविताएं हैं. ग़ौरतलब है कि चुने गए कवियों में नौ कवि ऐसे भी थे जिनका तब तक कोई स्वतंत्र संग्रह नहीं छपा था, और 117 कविताओं का अनुवाद चित्रे ने ख़ुद किया था. भालचंद्र नेमाडे ने इस संचयन में बहुत सी कमियों निकालीं और लिखा कि सबसे ज़्यादा सक्रिय मर्ढेकर स्कूल 1950 और 1960 के कुछ छोटे कवियों में जाकर थम गया.


साठोत्तरी मराठी कविता की नींव डालने वाले कवियों में कुछ प्रमुख नाम हैं दिलीप चित्रे, अरुण कोलटकर, नामदेव ढसाल, वसंत आबाजी डहाके और भालचंद्र नेमाडे. अगर आज की बात की जाए, तो साठोत्तरी मराठी कवियों में सिर्फ़ कोलटकर और चित्रे को ही अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली है, जिसका एक प्रमुख कारण उनका मराठी और अंग्रेज़ी में लिखना और विश्व कविता के मानकों की गहरी समझ रखना है.


1970 और 1980 के दशकों की मराठी कविता आलोचकों को आकर्षित नहीं कर पाई, हालांकि इस दौर के दस कवियों की रचनाओं को दया पवार द्वारा संपादित संचयन कविता दशकाची में स्थान मिला. 1985 के आसपास मराठी कविता की इस रिक्त जगह को भरने का यत्न ज़ोर पकड़ने लगा, और 1990 के क़रीब आते-आते शब्दवेध जैसी कुछ सजग और प्रभावशाली साहित्यिक लघुपत्रिकाएं निकलने लगीं. दा. गो. काले और उनके मित्रों द्वारा संपादित शब्दवेध का जनवरी 1999 में मात्र 58 पृष्ठों का नव्वदोत्तरी कविता विशेषांक (‘नव्वद’ यानी नब्बे) आया, जिसके अतिथि संपादक थे अभिजीत देशपांडे. इस अंक में 14 मराठी कवियों की कविताएं और तीन लेख थे. भूमंडलीकरण की प्रतिक्रिया में उभरी ‘जेनस-मुखी’ रचनात्मक-विध्वंसात्मक संवेदनशीलता ने जिस कविता में अभिव्यक्ति पाई, वही कमोबेश ‘नव्वदोत्तर’ मराठी कविता कहलाती है. उपभोगतावाद की विकर्षक गंध और वीभत्स इमेजरी से लबरेज़ इस काव्य धारा का विशिष्ट संकर मुहावरा शुरू-शुरू में तो ज़रूर लुभाता है, पर अत्यधिक तिकड़मबाजी के चलते धीरे-धीरे पाठक पर अपना प्रभाव खोने लगता है. इक्कीसवीं शताब्दी की शुरुआत में डॉटकॉम बबल फूटा था, और इस शताब्दी में लगभग दस बरस भीतर आते-आते ही नव्वदोत्तरी मराठी कविता का बुलबुला भी फूट चुका है. ग़नीमत है कि कुछ मराठी कवियों ने भूमंडलीकरण-ग्रसित कविता के फ़ैशन को ज़्यादा गंभीरता से नहीं लिया. उन्हीं में से दस कवियों की कुछ रचनाओं का अनुवाद प्रस्तुत है.


सरबजीत गरचा

 

इस अंक के अतिथि सम्पादक और सभी कविताओं के अनुवादक हैं सरबजीत गरचा


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