मंगेश नारायणराव काले

यह आकार है


यह सन्नाटा है अब साथ
और हमने तो कुछ भी नहीं लिया था
सच कहें तो लेने के लिए थी ही नहीं जेब
दर्ज़ी ने सिली

सिर्फ़ आकार था पतलून में जेब का
और जेब के आकार में सिला
एक नोट का आकार
हमारे साथ आया हुआ

जो ख़र्च नहीं किया जाने वाला था कभी
ऐसा शाश्वत नोट है हमारे पास
जेब के आकार में सिला हुआ
सच कहें तो थी ही नहीं जेब पतलून में

सिर्फ़ आकार ही तो सिला है
दर्ज़ी ने पतलून में
और बस जेब के आकार में
एक नोट का आकार है जड़ा

नोट के आकार में एक क़ीमत
न ली जा सकने वाली चीज़ों की
सिर्फ़ एक आकार है क़ीमत का
नोट के आकार में छिपा

उदहारण के लिए : एक नई कोरी साइकिल
होती है नोट के आकार में खड़ी
जो हमने कभी नहीं ली होती है
और चलाई भी नहीं होती है कभी

सिर्फ़ साइकिल चलाने का आकार
हू-ब-हू छिपा होता है नोट में
और उस आकार में खड़ी होती है मुट्ठी भर ख़ुशी
जो कभी नहीं मिली होती है हमें

मुट्ठी भर ख़ुशी के आकार में
डूबे होते हैं हमारे पच्चीस-छब्बीस साल
जो सच कहें तो फिसल चुके होते हैं
हमारे हाथों से अनजाने ही

पच्चीस-छब्बीस साल का यह सिर्फ़ आकार है
और हम अभी हैं वहीं खड़े
उम्र के अर्धव्यास पर
जहां हम कभी पहुंचे ही नहीं होते हैं

सच कहें तो सिर्फ़ आकार है यह हमारा
जो जा रहा है हमारे सामने ढुलकता . . .

२.
सिर्फ़ सन्नाटा है साथ
और हाथ हैं और पैर

एक जोड़ी हाथों को
एक जोड़ी पैरों ने अगर चलाया तो
गांव पार कर सकता है आदमी

हमने तो साथ लिया ही नहीं था गांव
सिर्फ़ आकार था गांव का हाथ में
जो तोड़ दिया पैरों ने
दूसरा गांव आते-आते

३.
एक गांव
अगर दूसरे गांव के आकार को निभा दे
तो बचता ही कहां है गांव आख़िर?

यानी दो गांव हो सकते हैं एक ही नाम के
या हो सकते हैं हू-ब-हू एक-दूसरे के जैसे
दोनों की परछाईं भी हो सकती है एक सी
फिर भी होता ही है अलग कुछ न कुछ दोनों गांवों में

यानी इस गांव का जामा
उस गांव को नहीं पहनाया जा सकता

४.
मतलब घर तो
पीछे ही छोड़ आए होते हैं हम
और साथ होती है सिर्फ़
तलाश एक नए घर की

घर छोटा होता है या बड़ा
छप्परों का टीन का खपरैलों का बीमों का कंक्रीट का
घर के पैर जनम के समय ही कर दिए जाते हैं कलम
इसलिए वह रहता है वहीं

कितने घर मिले पैरों को
पैरों को लगी कितनी घरघर
और घर को हमेशा दोनों हाथ जोड़कर भी
हमें मिला ही कहां है अपने घर का आकार

घर छोड़ते समय भी रोए कहां थे हम फूट-फूटकर?
और प्रथम प्रस्थान में भी कहां था फंसा पैर घर में?
पैर पुरज़ोर रेंगे होंगे ज़्यादा से ज़्यादा दो-चार साल
पर जाने की जल्दी में रहे हाथ

दो हाथों को या दो पैरों को
चाहिए ही होता है एक घर सच कहें तो
जो छूट जाता है बार-बार हाथ से
और आता ही नहीं है हमारे हाथ मरते दम तक



सज्जनों की इस दुनिया में

अगर दुर्जनों का नाश होना चाहिए तो
सज्जनों की विजय होनी ही चाहिए

और दुर्योधन तो मरेगा ही नहीं
जब तक जांघें न तोड़ी जाएं

कर्ण के भी रथ का पहिया
फंसाना है अनिवार्य

शिखंडी को रहना ही होगा खड़ा
भीष्म के सामने

और उठाना ही होगा शस्त्र
बृहद्रथ को कौरव सेना के सामने प्रत्यक्ष

नरो वा कुंजरो वा बोलना ही पड़ेगा
साक्षात धर्म को भी

तभी तो होगा नाश दुर्जनों का
इस पृथ्वी से समूल

कपट से ही मारी गई कौरव सेना
ऐसा दुर्योधन चाहे जितना मर्ज़ी कहे

फिर भी कौन करेगा भरोसा
सज्जनों की इस दुनिया में?



अनुमान

दुर्योधन कहने को तो नाम है सिर्फ़
फिर भी अनुमान लग ही जाता है
आने वाले क़दमों की आहट का

रावण कहने को तो नाम है सिर्फ़
फिर भी अनुमान लग ही जाता है
लंका के युद्ध-पर्व का

एकलव्य कहने को तो नाम है सिर्फ़
फिर भी अनुमान लग ही जाता है
अंगूठा कटने का

बाली कहने को तो नाम है सिर्फ़
फिर भी अनुमान लग ही जाता है
पाताल में पहुंचने का

यानी नाम में छिपा है सबकुछ
और कंठस्थ हो चुका है लिखा-संजोया हुआ
यानी बदला ही नहीं जा सकेगा इस काली किनारी को

नाम से जो लिपटी हुई है
और कभी मिटाई भी नहीं जाएगी
यह सुनाई गई सुविधाजनक कहानी

यानी अनुमान तो लग ही जाता है
नामों का इतिहास लिखने वाले हाथों का
अब भी




इतिहास

जिस अर्थ में इस पुरातन हवेली की क़िलेबंदी से उखड़े हुए पत्थर पुरातत्व विभाग ने जोड़ दिए हैं और इन नए-कोरे पत्थरों को अनेक जिस्म एक जान कर दिया है पुरातन पत्थरों के वंश में उस अर्थ में नए सिरे से होना पड़ेगा इस पुरानी व्यवस्था का पाबंद और यह कुशलता भी सुगमता से आने लगी है इन गूंगे पत्थरों को और ख़ुशी-ख़ुशी पुरातन वंश के बरगद के पेड़ की परछाईं अपने कंधों पर उठाकर निकालने लगे हैं जुलूस ये साज़िंदे यानी पुरातन क़िलेबंदियां दीवारें बुर्ज हो जाते हैं चूर-चूर या उखड़कर गिरने लगती है एक एक शिला तब पत्थरों को भी मोल मिल जाता है थोड़े समय के लिए और वंशज बन जाते हैं पत्थर सच कहा जाए तो पत्थरों का कोई वंश ही नहीं होता कहने वालों के लिए यह उत्तर ही है जो लिखकर नहीं रखा गया है आज तक फिर दस्तूर यही है कि जैसे ही पत्थर उखड़ता है वैसे ही सरका दिया जाता है नया पुराने की जगह और जोड़ दी जाती है दरार यानी ज़्यादा से ज़्यादा कितनी ज़िंदगी हो सकती है गढ़ी हुई इन पत्थरों की और कौन सा मोल आएगा पुनश्च इस काले कुतूहल में ऐतिहासिक?

जिस अर्थ में की जा रही है ज़मींदोज़ कोई न कोई भुरभुराती इमारत यानी बेच-बेचकर समूल नष्ट की जा रही है पुरातन परंपरा यानी कोई न कोई आख़िरी घर तो होगा ही जो होगा ज़मींदोज़ ढहते पत्थरों को जोड़े बिना फिर से बनाई जाएगी नई इमारत पुरानी वाली की जगह और पढ़ा जाएगा नया फ़तवा नई इबारत यानी अभी-अभी जो गिराई गई है आख़िरी इमारत या हवेली महल कबूतरख़ाना तबेला तालीमख़ाना और तो और नाटकशाला भी वह साक्षी थी या जीर्ण पन्ना आख़िरी यहां के इतिहास का या इस शहर के इतिहास का आख़िरी अंश था त्वचाहीन हो चुका यानी गर्भनाल ही थी एकदम मूल से तोड़ी हुई.

जिस अर्थ में ये गगनचुंबी इमारतें खड़ी हैं दिमाग़ में और रास्ते बेदाग़ रेंगते डामरी उस अर्थ में उनके नीचे गाड़ा ही गया होगा एक पुरातन शहर यानी कभी रात-बेरात सुनाई देती है टापों की आवाज़ और हिनहिनाहट अभी भी.



परंपरा

लकड़हारे की कहानी
बार-बार सुनाई जा सकती है

वह दादाजी ने पिताजी को सुनाई हुई होती है
पिताजी ने हमें
और हमने बच्चों को सुनाई हो सकती है

यानी पिताजी की या दादाजी की कहानी का
लकड़हारा हो सकता है हमारी
कहानी के लकड़हारे का बेटा या फिर पोता परंपरा से

यानी लकड़हारे की कहानी
हमेशा से होती ही होती है
और उसकी कुल्हाड़ी कुएं में गिर चुकी होती है

देवता आता है भागकर लकड़हारे की मदद करने इस बार भी
और एक बिल्कुल वैसी ही कुल्हाड़ी तांबे की देता है निकालकर
वह कहता है मेरी नहीं है परंपरागत

सच तो यह है कि वह आकार ही होता है केवल
लकड़हारे की कुएं में गिरी हुई कुल्हाड़ी का
देवता दूसरी निकालकर देता है चांदी की तुरंत

यह भी केवल आकार ही होता है
कुएं में गिरी लकड़हारे की कुल्हाड़ी का
वह भी मेरी नहीं कहता है जंटलमैन

प्रसन्न हो जाता है देवता लकड़हारे के ईमान पर
उसकी गिरी हुई कुल्हाड़ी निकालकर देता है
और झटपट सारी कुल्हाड़ियां भी दे देता है कृपालु

लकड़हारा घर लौटता है
कुएं में गिरी कुल्हाड़ी लेकर
और तांबे चांदी सोने की कुल्हाड़ियां भी ईनाम के तौर पर

सच तो यह है कि जो घर लौटता है वह लकड़हारा होता ही नहीं मूलत:
आकार होता है केवल लकड़हारे का
जो कुएं में न गिरने के बावजूद मिला होता है उसी को

लकड़हारे की कहानी
बार-बार सुनाई जा सकती है


 


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