सलील  वाघ की कविता

एरिक गिल सत्यजित रे
शमशेर और साल्वादोर दाली
पीछे छूट जाते हैं
क्वाड्रा एवी पावर पीसी
जब सामने
होता है
बिंदुमानी रेखामानी
भेद
बिसर जाते हैं
रिश्तों के चर्मवाद्य की गूंजें कानों की ओट में
ठंडी पड़ जाती हैं
जागृति के पहाड़ के पीछे
अस्त हो जाता है संदर्भ
हज़ारों रंगों के रण-कोलाहल में
फ़ोटोशॉप कलर स्टूडियो के
खांचों-पैतामों में
अतिवास्तव रिस जाता है
ब्लर हो जाती हैं प्रतिमाएं
ब्लर हो जाते हैं पिछले दस बरस
भाषा के जाल के नीचे
धधकती है पिछले
दस बरसों की चांदनी
परायापन उगाता है परस्पर पराया होता जा रहा मॉनसून
सुनहरे बालों वाली राजकन्या बेख़बर

अपनी मिट्टीमोल मराठी
भाषा की मिट्टी मैं उड़ाता हूं
नुक्कड़-नुक्कड़ पर गांव-देहात में
हटती जा रही मराठी बंजर
यथार्थ को मैं बिल्कुल संबोधित नहीं करता
किसी और चीज़ को ही उल्टा मैं यथार्थ नाम देता हूं
कविता में जगह-जगह मिटाए हुए शब्द
इच्छा लेकर मर जाते हैं उनकी अतृप्त आत्मा
बाद में आगे के शब्दों में आती है
तब से लेकर अब तक मैं एक ही कविता लिख रहा हूं
अपनी भाषा का शायद मैं कवि हूं आख़री


(सलील वाघ की अन्य कवितायें)

 


कविता महाजन  की कविता


दोपहर

मैं उठाकर देखती हूं रिसीवर
एक बार फिर यह सुनिश्चित करने के लिए
कि फ़ोन चालू है . . .
पंखा घूम रहा है मतलब बिजली खेल रही है
वायर्स के भीतर, फिर भी एक मरतबा
मैं घंटी बजाकर देखती हूं . . .
निहारकर आती हूं लैटरबॉक्स
बहुत-सी चिट्ठियां समा जाएंगी छोटी-बड़ी उसमें
एकाध पत्रिका भी . . .

खिड़की खोलकर बाहर देखते हुए लगता है
इतना भी नहीं चिलचिला रही है धूप
कि कोई भी न फटक पाए . . .
दूर से आवाज़ें आ रही हैं, सारी
लोकल ट्रेनें चल रही हैं, ऑटोरिक्शा
कर रहे हैं आवाजाही
किसी भी तरह का बंद वगैरह नहीं होगा
या कहीं दंगा-फ़साद भी नहीं . . .

मैं काट रही हूं चक्कर
बैठक से रसोई में
रसोई से बैडरूम में
बैडरूम से फिर बैठक में . . .

उठाकर देखती हूं रिसीवर . . .
 

(कविता महाजन की अन्य कविताएँ)
 


मनोज सुरेंद्र पाठक  की कवितां


ईश्वर एक ऐसी चीज़ है उस्ताद


ईश्वर एक ऐसी चीज़ है उस्ताद
जो पहरेदार है तुम्हारे सद्विवेक के ख़ज़ाने का
या अभय का अड्डा
तुम्हारे किए-अनकिए पापों का

वह बिजूका है
तुम्हारी झुलसी हुई फसलों के
खेत में खड़ा
या पार्टनर
गोरखधंधे का

ईश्वर एक आसान उत्तर है
जब तुम थक जाते हो
या एक जम्हाई
तुम्हारे आलस्य की

वैसे वह एक अटल मोहर है
तुम्हारे ललाट पर मारी हुई
या एक कठपुतली
तुम नचाओगे वैसे नाचने वाली
या नाचोगे वैसे नचाने वाल

 

(मनोज सुरेंद्र पाठक  की कविताएं)


अरुण काले  की कवितायें


खेद

दोस्त! कीचड़-मिट्टी में खेलते-खेलते
हमने ‘जय भीम’ के नारे लगाना सीखा
ख़ूब आंच लेकर ही हम
रास्ते पर आए नंगे पांव
हमारे तलवे हो गए बड़े
वैसे ही एड़ियों की दरारें भी

तुमने ख़ुद को झोंक दिया
पर मैं कामचोर ही बना रहा
रात में मैं पैरों पर तेल चुपड़ता रहा
तुम हवा की तरह घूमते ही रहे
ऐन उम्मीद के दिन तुमने क़ुरबान कर दिए
मैं फिर भी तुम्हारे हाथों में धरा झंडा लेने
आगे नहीं आया

दोस्त! दुनिया की नज़रों में तुम बर्बाद हो गए
लेकिन मैं वैसा नहीं समझ सकता
तुम भी वैसा नहीं समझते
दोस्त! सच में आबाद तो तुम ही हो
बस्ती-बस्ती में तुम्हें मिलते ‘जय भीम’
ही तुम्हारी मिलकियत हैं
दोस्त! तुम ऊंचाई में बढ़े मुक्त
मैं सिर्फ़ उम्र में बढ़ा गरारी में
तुमने कभी फ़िक्र ही नहीं की जमाख़र्च की
दोस्त! आज भी तुम रास्ते में खड़े हो
झंडा हाथ में लिए
इसलिए मैं शीतल हवा में बैठकर
कविता लिख रहा हूं


दोस्त, वैसे तुम दिलदार हो
लेकिन मेरी हिम्मत टालती है
तुम्हारे सामने आना
मैं यह भी समझता हूं कि मेरी
सहानुभूति की तुम चीरफाड़ करोगे
मैं पूरी तरह निरुपाय हूं
जैसे-जैसे मैं बहुत निस्तेज दिखने लगा हूं
वैसे-वैसे तुम रास्ते में, धूप में चमक रहे हो
दोस्त! तुम्हारे कारण निर्विघ्न छांव भोगने वाले
कृतघ्नता से तुम्हें बुरा-भरा कहते हैं
मैं वैसी विदाई नहीं कर सकता
कोई कितनी भी टांगें ऊपर करे
मैं तो तुम्हें किसी भी दर्शन शास्त्र से
कम नहीं मानता. बस!


( अरुण काले  की अन्य कविताएं)


दिनकर मनवर की कवितायें


बिना दृश्य वाले दृश्य में


इस दृश्य के एक दृश्य में
एक अतृप्त आदमी
ज़मीन पर महज़ बैठा हुआ है
और उसके पास कुछ नहीं है

इस दृश्य के एक दूसरे दृश्य में
दूसरा अतृप्त आदमी
चटाई पर बैठा हुआ है
और उसके पास थोड़ा-सा सुख
महक रहा है

इस दृश्य के एक तीसरे दृश्य में
तीसरा अतृप्त आदमी
खाट पर सुस्त बैठा हुआ
पेट पर हाथ फेर रहा है
और उसके आसपास
सुख उमड़-उमड़कर बह रहा है

इस दृश्य में अनुपस्थित एक अतृप्त आदमी
बिना दृश्य वाले दृश्य में
कितने ही दिनों से खड़ा है
और उसके बैठने के लिए जगह ही नहीं है

न जाने कितने दिनों से वह राह देख रहा है
ज़मीन पर बैठा हुए अतृप्त आदमी के
दूसरे दृश्य में से उठकर चले जाने की


(दिनकर मनवरे की अन्य कविताएं)


सचिन केतकर

सेल्फ़-पोर्ट्रेट बनाते समय हुए लोचे


दो बंद हो चुकी घड़ियां
मेरी आंखों के खांचों में
एक में दस बजकर चौदह मिनट हुए हैं
दूसरी में चौदह बजकर दस मिनट.

अपनी कलाई की आंखों में देखकर
बताता हूं तुम्हें
कि कितना टाइम बचा है.

मेरा मुंह यानी भारतीय बैठक के
पाख़ाने का सफ़ेद साफ़सुथरा कमोड
जिसमें होगा तुम्हें
विश्वरूप दर्शन.

मेरे कान तालों के सुराख़ हैं
जिनमें मेरी पत्नी
भूल गई है अपनी चाबी.

बाहर मेरी धूल भरी संकरी गली पर
हज़ारों ख़ाली खिड़कियां उगी हैं
बिना फ़्रेम की
जिनमें हैं मेरे
हज़ारों अदृश्य पोर्ट्रेट्स

इस कमरे की तस्वीर बनाते हुए भी
बहुत-से लोचे कर दिए

सीलिंग फ़ैन की जगह है
मेरी मुंडी

और मुंडी की जगह है
घरघराता सफ़ेद सीलिंग फ़ैन.

अगर भूनना हो तो
सीलिंग फ़ैन के ऊपर वाली मुंडी की
स्पीड बढ़ा लो.

(सचिन केतकरकी अन्य कविताएं)


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