सलील वाघ की कविता


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सारा जमा-ख़र्च देखने के लिए
पुराने कैलेंडर लेकर बैठने पर
समझ में आता है कि कितना नाहक खुरचता है
निष्पत्र पेड़ों में सरकता जाता चांद
नदी में झिलमिलाते इमारतों के प्रतिबिंब
समंदर आकाश टीले बिजलियां सूरज तारे
गुड्डों जैसे दिखते लोग और बारिशों के मौसम
ये सब होते हैं बार-बार आने वाले
फिर भी क्षणों की चिमटी में पकड़ना नहीं आया
इसमें का सबकुछ हमें
उनके द्वारा एक-दूसरे को दी गई गालियों का ही
अध्ययन किया हमने ईमानदारी से
बेकार में जबड़े दुखाए सवालों की बड़बड़ में
और सरपट दौड़ गए सच्चे जवाब आए
तब दुबककर बैठ गए
कविता की टिकाऊ ओरी में
उदासीन

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इस दिन
किसी न किसी बहाने
तुम आती हो
यह मुझे अब पक्का पता चल गया है
क्योंकि
प्रकाश का स्रोत
ज़मीन से जब
लगभग एक सौ अस्सी अंश का कोण बनाता है
तब
कोमलमुलायम मिट्टी पर
मामूली छोटे कंकड़ों की भी
परछाइयां पड़ती हैं
इस दिन
तुम बिना चूके आती हो
यह मैंने बिल्कुल जान लिया है
क्योंकि नया अस्फुट बौर
थोड़ा-थोड़ा कहीं एकदम प्रस्फुटित हो रहा होता है
और फिसलकर गिरने वाले पत्ते परस्पर
हवा में तैरते कहां से कहां चले जाते हैं
पेड़ों रास्तों ठिकानों
की देह से
एक बहुत उम्दा सुगंध आती है

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कोई अनजान आदमी आत्महत्या कर ले
मरते हुए उसकी जेब में अपना
नाम-पता मिल जाए
उसी तरह तुम्हारी लू
मेरी कविता में जगह-जगह बिखरी हुई है

हम दोनों के जनम में
ठीक एक सपने का अंतर पड़ा है

लगा था मेरी उग्र तपस्या से तुम प्रकट हो जाओगी और
अपने दह में डूबी मेरी गाथा को उबार लोगी

तुमने मुझ पर अन्याय बो दिया
(यह कहते हुए मेरा स्वर ऊंचा नहीं होता —)
— इस बात का मुझे संतोष है

बहुत प्रेम से पोसा है प्रेम का वृक्ष
उस पर अब कहीं मधुर दुख के
फल लटक रहे हैं
उनकी मिठास को किरकिरा मत करो मेरे दुख की लय


द्राविडी प्राणायाम

सशक्त
महानदी जैसी जांघें
मैं प्रवाह में उल्टा तैरते हुए
जा रहा हूं विरुद्ध सांप के समान
स्रोत की ओर

तुम्हारे पानी में खिंचाव है बहुत

मैं स्रोत से पहुंच रहा हूं
गंगोत्री

गुनगुने कुंड में पवित्र होता हूं

सारे प्रवेशद्वारों के पास
मैं कर रहा हूं भीड़ एकदम
चारों ही आठों ही गोपुरों से
मैं भीतर भागने की फ़िराक़ में हूं
एकाएक ही मचती है मेरे आसपास मेरी ख़ुद ही की भगदड़

कुंभ स्वस्तिक चक्र पुष्प पद्म
कूर्म वृक्ष और रत्न
सबको स्पर्श करते
शुरू की हुई
प्रदक्षिणा पूरी कर रहा हूं

अर्थविस्तार की लहरें
अर्थविस्तार की भाषा
अर्थविस्तार का धर्म

सांवली जांघों के झुरमुट में
बुझ गए मेरी बुद्धि के ठूंठ

क्लांत फेंक दिया गया हूं
रेत जैसी मिट्टी में
तलछट त्रिभुज प्रदेश में

गाढ़ी मलाई जमी है
लहकती सांसों पर
 


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