कविता महाजन
जगह

जिसमें मृत्यु की भी इच्छा न बची हो
उस इंसान की तरह
कोरा कड़क कैनवस
उस पर आकाश का एक रंगीन
अमूर्त निराकार टुकड़ा चिपकाना था . . .

आकाश की अभिलाषा मन में संजोते समय
ध्यान ही नहीं आया कि
हमें आकाश के साथ
अपनाने जितनी जगह
किसी भी घर में नहीं होती


अनुवाद

दूसरी भाषा में अनूदित की गई
अपनी कविता सुनते हुए
कुछ ऐसा लगता है :

पराये घर में किसी अनजान औरत को
मां कहकर पुकारते हुए
बोल रही है मेरी बिटिया कुछ-कुछ . . .

. . . ज़ोरों की भूख लगी है, जल्दी परोसो.
. . . कैसी लग रही हूं मैं इस फ्रॉक में?
. . . बताओ न, चांदनी को आकाश किसने दिया?
. . . देखो, मैं चल सकती हूं तुम्हारी जूती पहनकर!

और मैं चुपचाप, मेहमान की तरह
देख रही हूं केवल प्रशंशा से, कुर्सी पर बैठे हुए;
क्योंकि जवाबों की जवाबदेही मेरी नहीं होती है . . .


भूख

हां मैं तुम्हारी ग़ुलाम हूं
मालिक
मुझे चाहिए ये सारे बंधन
मैं स्वेच्छा से स्वीकार कर रही हूं
अपनी खो चुकी आज़ादी का एहसास
मेरी बेड़ियां तुम्हारे हाथ में हैं
मुझे घुमा रहे हो मेरा जुलूस निकाल रहे हो तुम
और घूम लेती हूं मैं भी . . .

मुझे मुक्त करने की भाषा
मत बोलो मालिक
मुझपर बहुत प्यार आने के बावजूद . . .
बाहर असंख्य बेड़ियां असंख्य पिंजरे,
असंख्य चाबुक असंख्य बासी टुकड़े लिए हुए हाथ
घात लगाए हुए हैं मालिक
मुझे रहने दो तुम्हारी ही ग़ुलाम
कभी इनके तो कभी उनके तलवे चाट-चाटकर
मेरी जीभ उकता गई है अब
उस पर शब्द चिकने होकर ही आते हैं
भोथरे दांतों पर रगड़ने पर भी नुकीले नहीं होते

यहां-वहां सदा-सर्वदा होंठ ज़ोर से भींच-भींचकर
क्षीण हो चुकी है आवाज़
नज़रों में बची है केवल लालसा
तुम्हारी थाली में बचा वह
एक टुकड़ा दोगे मालिक?
बहुत भूख लगी है . . .


ज़ख़म

ज़ख़म जब भरने लगता है
तो पहले बदलने लगता है उसका रंग

आसपास की नाज़ुक त्वचा
पहले हमेशा की तरह बनती जाती है
फिर ज़ख़म पर ही जमने लगती है नई त्वचा की मलाई
जलन ज़रा महसूस होती रहती है एकदम कम नहीं होती
टीस नहीं कहते-कहते अचानक
सनसनाहट उगा देती है मस्तक में फिर बुझ जाती है
अंतर बढ़ता जाता है टसक के बीच का

संभलने की नई आदत भी छूटने लगती है
यह एक प्रमुख लक्षण है
ज़ख़म के ठीक होने का
बातचीत में आने लगते हैं दूसरे विषय
और प्रशंशा ख़त्म होने पर
रोज़मर्रा का कामकाज शुरू हो जाता है
निहारने पर ही याद आएगा
इतना ही रह जाता है घाव

ज़ख़म का कारण भी याद नहीं आता
यह ज़ख़म ठीक हो जाने का निश्चित लक्षण है

 

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