मनोज सुरेंद्र पाठक
 
टुकड़े जोड़ते समय आ जाए मृत्यु

संदर्भ खो जाते हैं
हम असहाय हो जाते हैं
इतना कि कविता के पन्ने तक फाड़ देते हैं
मन की सपाट दीवार पर
छिपकली की तरह रेंगते रहते हैं विचार

जबसे गूढ़ कविताएं पढ़ी हैं
चूहे और कौए का
एक नया ही डर
मन की बस्ती में बस गया है
घर में और बाहर
शत्रुओं की संख्या एक-सी है
यह अभी पता चला

फिर भी कोई बिजली चमके
और दिखाई दें कुछ बिखरी पड़ी
आशावादी कविताएं
तमाम ज़िंदगी को रखा जाए
गिरवी इन कविताओं के लिए
और फाड़ी हुई कविताओं के
टुकड़े जोड़ते समय आ जाए मृत्यु.


हद पार कर रही भाषा की तरफ़

नए शब्दों में
भाषा का दम घुट गया
नई हवा में सांसों का
हमारा पुराना घिसा-पिटा दिमाग़ थक जाता है
पुराने कवि की सांस फूल जाती है
वह भागकर लौट नहीं सकेगा अब
पिछले समय में

क्या वह शस्त्रों को धार लगाकर
छीलकर उलटी टांग दे भाषा?

झूल फट गई है
जो अब नहीं ढंकेगी
कवि की पुरानी भाषा की लाज

हद पार कर रही भाषा की तरफ़
बेबसी से देख रहा है कवि


. . .

ताकि तुम न काटो इसलिए मैं कुछ ब्रैड के टुकड़े तुम्हारे सामने डाल रहा हूं मेरे पास भी बहुत ब्रैड है ऐसा नहीं है लेकिन मुझे डर है कि कहीं तुम काट न लो फिर ड्रेसिंग घाव धोना इंजेक्शन इसमें समय जाने का व्यर्थ भय है कई बार मैं भूखा रहकर तुम्हें ब्रैड खिलाता रहता हूं शायद मुझे आदत ही पड़ गई है तुम्हारे सामने टुकड़े डालने की और तुम्हें भी अक्सर टुकड़े चबाने की सच तो यह है कि हमने तुम्हें अपनी रखवाली करने के लिए चुना था पर वो छोड़कर तुम टुकड़े मांगने लग गए और हमें छूट देने लग गए. हम में से कुछ लोग तो अब सीधे तुम्हारे सामने ब्रैड का टुकड़ा ऊंचा उठाते हैं और तुम कुई कुई करके पूंछ हिलाते दो पैरों पर खड़े हो जाते हो.

तुम ख़तरनाक हो तुम्हारा यह अधोपतन ख़तरनाक है अब टुकड़ों के बग़ैर तुम्हारा गुज़ारा हो ही नहीं सकता ऐसी परिस्थिति तुम अपने ऊपर ले आए हो तुमने टुकड़े न डालने वालों को नोचा काटा और मार भी डाला तुम्हारा एक भयानक समाज बनता जा रहा है और उसे मान्यता मिलती जा रही है यहां हम हमारी पत्नियां बच्चे कुपोषित होते जा रहे हैं लेकिन भूखे पेट वाले हमारे दिमाग़ में बहरहाल उठा-पटक शुरू हो गई है इस बात को कलहपूर्ण ही कहा जा सकता है क्योंकि हम एक ही घराने के हैं लेकिन टुकड़ों की इस भूख ने लालच ने हमें जुदा कर दिया है.

एक तिल और सात भाइयों की कहानी अब बहुत पुरानी हो चुकी है.


मरम्मत

मुझे कुछ कविताओं की मरम्मत करनी है
छातों चाबियों तालों के मामूली कारीगर की तरह
मैं बैठा हूं खुले में
तुम्हारे इस उच्चकुलीन नर्म मृदुमुलायम शहर में
तो तोड़फोड़ और ठोकपीट की
कुछ आवाज़ तुम्हें सहनी पड़ेगी

अंदर-अंदर की ख़राबी मेरा काम बिगाड़ देती है
और बिगड़े मन से बिगड़े हुए शब्द आते हैं
मुझे तुम्हारे और अपने स्वास्थ्य की चिंता है
इसीलिए तो मरम्मत का यह बीड़ा उठाया है
और सारी कविताओं पर
Under Repair के बोर्ड लटकाए हैं

जैसा कि इस कवित
ा पर भी वह है ही


 


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