अरुण काले
गुरु

तमसमयी भारी हो चुके हाथों को
सवेरे उसने धार प्रदान की
धार पर अंगूठा फेरते हुए
एकलव्य की याद आई
अब गुरुदक्षिणा का सवाल ही नहीं उठता
गुरु ख़ुद ही बाप है
शत्रु को भी उसने उघाड़ दिया
और दिखा दिया कि
सांप के साथ ही केंचुल है


तुम कहते ही हो तो!

तुम कहते ही हो कि रोना है
हमारे लिए!
तो हम भी कहते हैं
एक बार तुम्हारी आंखें जांच ही लें
तुम कहते ही हो कि झड़ना है
हमारे लिए!
तो हम भी कहते हैं
एक बार तुम्हारे संबंध जान ही लें
तुम कहते ही हो कि लड़ना है
हमारे लिए!
तो हम भी कहते हैं
एक बार तुम्हारे दिमाग़ की धार
और हाथों के वार तौल ही लें
तुम कहते ही हो कि उड़ना है
हमारे लिए!
तो हम भी कहते हैं
एक बार तुम्हारे पंख देख ही लें!


अलग-अलग मसानों की ओर

एक छोटा-सा गांव
एकदम लग जाता है उसका ठांव
यहां के सारे बच्चों को
जन्मता है
एक ही प्रसूति गृह
और वहीं से धीरे-धीरे
चलने लगते हैं उनके रास्ते
अलग-अलग मसानों की ओर


केंचुओं के बन में

केंचुओं के बन में
आठों पहर गाए जाते हैं
निष्ठा के चिकने गीत
फहराए जाते हैं गिरगिटों के ध्वज
फन कैसे, कब और कहां उभारे जाएं
होते हैं इस पर भुरभुरे परिसंवाद
खाई हुई मिट्टी के संग ईमान रखने की
ली जाती हैं लिज़लिज़ी क़समें!
पूंछ नहीं है, दिशा नहीं ले सकते
होता है इस बात का शीतोष्ण खेद
केंचुओं के बन में!


स्कूल से लौटते हुए

धानाकुल खेल का गीत
पहली बार ही कानों से सुना
खेल के बारे में पता नहीं था
शब्द भी नया ही था
दोपहर भर खोखले हो चुके पेट से
भात सिर्फ़ पकड़ा हुआ था
चावल के दानों को धोती हुई
मां दिख रही थी
दो चूड़ियों की
खनखन सुनाई दे रही थी
चूल्हे ने जान दबोच ली थी
धुंआ सारा सरक चुका था

डबडब गुड़गुड़ आवाज़ आ रही थी
मन से भी आगे पेट दौड़ रहा था
स्कूल से लौटते हुए . . .

 

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