दिनकर मनवर
 

बिना दृश्य वाले दृश्य में


एक कवि जब अकेला होता है

एक कवि जब होता है एकदम अकेला
तो उसके सामने एक दृश्य होता है

एक लड़की अपनी पंक्चर हो चुकी साइकिल धकेल रही होती है
एक किसान बरसात की राह देख रहा होता है
एक आदमी को ख़ून की सख़्त ज़रूरत होती है
एक मां अपने गुमशुदा बेटे की याद में दहलीज़ पर बैठी होती है
एक यात्री स्टेशन पर ट्रेन के इंतज़ार में बेचैन हो रहा होता है
एक पंछी रास्ता भूलकर भटक रहा होता है आसमान में

कवि जब कविता लिखने के दृश्य में उतरता है
तो साइकिल के पहिए में अपने आप हवा भर जाती है
खेत में फसल लहलहाने लगती है अपने आप
आदमी जल्दी-जल्दी ठीक होकर अस्पताल से डिस्चार्ज ले लेता है
स्टेशन में ट्रेन अपने आप आकर खड़ी हो जाती है यात्री के इंतज़ार में
गुमशुदा बेटा भी मां की गोद में अनायास लेटा हुआ होता है
पंछी को भी अपने आप मिल चुका होता है अपना पेड़

बहरहाल इस दृश्य में कवि के खो जाने की भारी संभावना होती है
उसे शब्द ही नहीं मिलते हैं पहले वाले दृश्य में आसानी से लौट आने के लिए



परदे के पीछे वाले दृश्य में

परदे के पीछे वाले दृश्य में एक कवि रहता है
सच कहा जाए तो उसे कोई नहीं जानता
उसे मालूम है कि इस दृश्य के बाहर जो दृश्य है
उसमें कवि शब्द का बहुत ज़्यादा अर्थ नहीं बचा है

फिर भी कवि संभालकर रखता है दिल की गहराई में
एक-एक शब्द एक-एक अक्षर उसके उच्चारण के साथ
वर्ण स्वर व्यंजन मात्रा और अनुस्वार भी

कवि को अभी भी यह विश्वास है कि
शब्द मरेंगे नहीं ठंड से या प्रखर धूप से
वे साबुत रहेंगे पेड़ों में मिट्टी में पानी में हवा में
और इसके बावजूद भी शब्द अगर मर गए
तो फिर साबुत रहेंगे उसकी हड्डियों में हमेशा

जब शब्दों की ज़रूरत पड़ेगी अकाल में
तब कवि उठकर सीधा बाहर आ जाएगा इस परदे के पीछे वाले दृश्य से
और लौट जाएगा उनके पास जिन्हें ज़रूरत होगी शब्दों की सख़्त

कवि का लौट आना केवल लौटना नहीं होगा मूलत:
कवि लौटकर आएगा जैसे
प्यास लगने पर होठों के पास अपने आप आ जाता है पानी
 

मैंने उनसे कहकर देखा


मैंने उनसे कहकर देखा
कि मैं नहीं बोल सकता हूं
ख़ुद के शब्द

मैं केवल दूसरों के शब्द ही
प्रतिध्वनित कर सकता हूं
लार के रास्ते

फिर भी वे मेरे शब्द सुनने के लिए
उतावले हैं

कहने लगे कि इस बार तो तुम एक दफ़ा बाहर आ जाओ
हमें तुम्हारी आवाज़ सुननी है किसी भी तरह
बस एक बार तुम्हारी जीभ पर स्याही लग जाए काली-काली
फिर तुम ख़ुशी-ख़ुशी सुनते रहना हमारी प्रतिध्वनि

तुम्हें पता नहीं है श्राप मिला है तुम्हें
इस जनम में ख़ुद की भाषा न बोलने का



और यह आकाश की खिड़की तो

छांव में बैठा तो
उन्होंने पेड़ काट दिए

रास्ते पर चल रहा था तो
उन्होंने परछाईं उखाड़ फेंकी

आकाश की ओर सिर्फ़ देखा तो
उन्होंने बादलों को खदेड़ दिया

जब गा रहा था तो
उन्होंने मेरी जीभ काट डाली

मैंने पानी को छुआ तो
उन्होंने तालाब ही सुखा दिए

मैं डर गया हूं
मुझसे कुछ भी नहीं बोला जा रहा

मैं बुरी तरह थक गया हूं
अब मुझे पृथ्वी की गोद में दुबकना है

तो तलवारें झुलाते क्रुद्ध जमावड़े
मेरी दिशा में तेज़ी से दौड़े आ रहे हैं

और यह आकाश की खिड़की तो
कुछ भी करने पर खुल ही नहीं रही

 


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