इस वक्त दुनिया अनेक जाने और अनजाने खतरों से गुजर रही है, जिनमें से कुछ दिखलाई देते हैं, और कुछ नहीं। दिखलाई देने वाले खतरे हैं, एक के बाद एक संस्कृति का नाश, बेहिसाब युद्ध, असंतोष, भूख और पर्यावरण।

और जो खतरे दिखाई नहीं देते उनमें सबसे बड़ा है वर्चुअल दुनिया, जो हमें अनायास अकेलेपन में झौंक रही है, जो हमारे आस पास असन्तोष उत्पन्न कर रहा है, यह दुनिया हमे नकली सम्बन्धों के साथ नकलीपने की ओर ले चल रही है।

ऐसी स्थिति में कला या कविता की क्या स्थिति हो सकती है, कुछ समझ ही नहीं आता, क्यों कि कला और कविता प्राकृतिक सद्भाव चाहती हैं, वे संघटना चाहती हैं, और साथ काम करने की चाह।

अकेलापन कला और कविता को उद्भासित होने का प्रेरक तत्व अवश्य हो सकता है, लेकिन मूल कारण नहीं।

ऐसे समय में हम कला और कविता के साथ क्या कर रहे हैं, क्यो सोच रहे हैं, कि हमे इनकी जरूरत है, या सोच भी नहीं रहे, बस इनका भी उपयोग कर रहे हैं उपभोक्ता की तरह...

इन्हीं सभी सवालों के साथ कविता की दुनिया में कुछ खंगालने की जरूरत महसूस होती है।

कृत्या काफी वक्त से अनियमित चल रही थी. पिछले दो साल से हमने नई पत्रिका निकालना भी बन्द कर दिया था, लेकिन अब कुछ युवाओं के जुड़ने से पुनः चलाने की प्रेरणा मिली है।

इस बार हमारी नई सदस्या अनामिका ने वैश्विक समकालीन कवियों के अनुवाद किए हैं, और हम कोशिश करेंगे कि हर अंक में कुछ नए अनुवाद देते रहे।

इस अकं की कलाकार प्रसिद्ध कलाकार Charlotte Mumm हैं, जिन्होंने पहले भी कृ्या के लिए अपनी कलाकृतियां दी थी. Charlotte Mumm की कला एक तरह से वर्तमान वर्चुअल दुनिया में भी कला को तलाशने की ताकत रखती हैं, यही कारण है कि मुझे लगा कि इस अंक के लिए उनकी कला से बेहतरीन चुनाव नहीं हो सकता है।।

कृत्या अपने सवालों के साथ संभवतया कुछ जवाब भी लाए, इसी आशा से

रति सक्सेना


     पत्र-संपादक के नाम                                                  
 


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