रमाकांत रथ उड़िया के वरिष्ठ कवि की कविताएं

आओ, अर्ध शेष ले लो


आओ, अर्द्ध शेष ले लो
जीवन का , किन्तु
मेरे शेष के हर क्षण को
अपनी आसक्ति से भर दो
क्या मोल तोल अनुचित है?
तो केवल एक क्षण छोड़
जीवन का शेष सब कुछ ले जाओ,
लेकिन नभ की तरह,
व्याप्त कर दो
उस क्षण से ऊपर सबकुछ को।

नहीं,नभ की तरह नहीं
करीब आकर बादल बन
मेरे भूत, वर्तमान और अतीत के ऊपर,
जिससे मैं स्वयं के स्पर्श के साथ
स्पर्श कर सकूंगा तेरे देह के मानसून को
तुम्हारी आह सांस ले सकें
दूर समुद्र की आहों से
उत्पन्न आंधियों के वेग को
जब मैं मुस्कुरा कर खुद को स्पर्श करता हूं
तो आंधी रूक जाएंगी,

मेरा जीवनकाल,
नजदीक आयी मृत्यु से बेखबर,
तुम्हारी युवावस्था के प्रारंभिक वर्षों की तीर्थयात्रा को हर दिन
नवीकृत करता हुआ।
तुम मेरे निर्देशों से तराशी गयी नीला द्रव्यमान हो
या
पूर्ण,अर्द्ध और अ ज्ञान का मेरा संपूर्ण नीला।
क्योंकि मैं हमेशा नीला पहनता हूं,
तुम भी नीली होगी,
तुम्हारा दूसरा रंग कैसे हो सकता है?
मेरा दिल दरक सकता है
अगर तुम्हारा रंग नील नहीं हुआ तो?

क्या ये मोल तोल अनुचित था?
फिर आओ ले जाओ,उस एक क्षण को भी।
लेकिन झुको नहीं,सीधे मेरी आंखों में देखो।
वहीं उस गुस्ताख यात्री से मिलो
जो एक के बाद एक
नरकों से होकर गुजरा है
और,अंतिम नरक के अंत में,
कदम्ब के पेड़ के नीचे तुम्हारे
आने का इंतजार कर रहा है।


अनुवाद -अनामिका अनु



इस देह के भीतर

देह के भीतर सन्नाटा
इस देह के भीतर बहुत तीव्र कोलाहल है
दारूण चीखें एक दूसरे के अस्तित्व को मिटाती
और एक विशाल बड़े सन्नाटे का निर्माण करती
तुम्हे समायोजित करने के लिए
इस शरीर का रक्त बर्फ सा ठंडा है क्योंकि
ये कई आगों में जला है
एक दूसरे को जलाती आगें
मेरी हड्डियां, जिंदगी जो मैं जिया और जो मैं जीउंगा
थरथरा उठती हैं ठंड में
फिर कहीं से एक ठंडी बयार आती


तुम्हारी आवाज़ को सुनने तक
मैं सन्नाटे को नहीं जानता था
तुम्हारे माथे को छूने तक मैं इस शीतलता को भी नहीं जानता
था
मेरे हाथ बर्फ की जमी शाश्वतता में पड़े थे और चंदन की लकड़ी
के लेप में


अनुवाद-अनामिका अनु

 


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