आदित्य शुक्ल की कविता
 

किसी अदृश्य में तुम.

एक अदृश्य में तुम्हारी
प्रतिछाया मिली
एक अदृश्य के साथ
शहर के हर रेस्तरां में गया
हर अनबैठे कुर्सियों पर बैठने
हर अनकही बात बताने के लिए
हर अनखाया व्यंजन खाने के लिए।

सारा अनहुआ, हुआ हो गया।
पृथ्वी पर कोई जगह नहीं बची
जहाँ हमारे पदचिन्ह न हों।
सारा अनकिया घटित हुआ
— जिस अदृश्य में तुम्हारी प्रतिछाया थी।


(आदित्य शुक्ल की अन्य कविताएं) 


दुष्यंत  की कविता


1
सुनो!

मैं घग्घर लिखूंगा
तुम प्यास पढ़ लेना

मैं आग लिखूंगा
तुम उम्मीद पढ़ लेना

मैं मृत्यु लिखूंगा
तुम प्रेम पढ़ लेना

मैं भूख लिखूंगा
तुम स्वप्न पढ़ लेना

मैं साँस लिखूंगा
तुम अपना नाम पढ़ लेना

मैं जीवन लिखूंगा
तुम असंभव पढ़ लेना

मैं कुछ नहीं लिखूंगा
तुम सब कुछ पढ़ लेना!

(दुष्यंत की अन्य कविताएं) 


सोना वान , अरमेनियान कवयित्री की कविता
 

बाढ़ का इससे कुछ लेना देना नहीं है

मैं बिस्तर पर बाइबिल पढ़ रही हूं-
शुरू में शब्द उसके बाद युद्ध
और युद्ध
शतरंज का शाश्र्वत खेल
सिपाही
गिरने का इंतजार
या
गिर चुके
इतिहास चुप है
भगवान की तरह
जैसे वक्त या कुछ और भी
जो आत्मचेतना विहीन है
बच्चे- तुम मेरे स्वप्न की खाली कुर्सियां हो
रहस्यपूर्ण
वान गा़ की चित्रकारी
समय स्वंय में रक्त की गतिमान नदी
एक ही नदी में दो बार नहीं उतर सकते
भगवान शब्द विहीन कविता
चुप्पी
विलोपित मर्म
आज से तुम रास्ता
इस कहानी का आरंभ और अंत
या तो पवित्र
या
गुलाबों का
मेरे मुंह में वैसी ही पितलाया स्वाद
वहां तालु में वही कहानी
अंगखंडित सैनिक हर तरफ
जैकेट के वहीं परतदार बाजू
हाथों को बर्फ के अंदर बीज की तरह
रखा गया है
नये युद्ध के लिए
दुनिया तुम्हारा राजा नंगा है
पालनों का चोर
शिथिल
उभयलिंगी
जिसकी आसक्ति मांसपेशियों और चेहरे के बाल में है
कोई नहीं डूब सकता
उसका बलून सा शरीर हवा से भरा
इस दुनिया में कोई भी नहीं तोड़ सकता
जांता पत्थर वाले उसके हृदय को
कोई भी नहीं- वह जो मुझसे पैदा हुआ
मैं बाइबिल पीछे से आगे की ओर पढ़ती
बाढ़ सारे हथियारों को डिब्बे से बहा ले जाएगी
मैं अपने गीत को कपोतों की तरह उड़ने देती हूं
मैं लौट आऊंगी
जब रक्त चला जाएगा
और जब बीज अंडों की तरह बड़े होते हैं।

P.S.
बाढ़ या बर्फबारी का इससे कुछ लेना देना नहीं,
यह जो हमारे भीतर है वो मुझे ठंडा कर रही है।


अनुवाद - अनामिका अनु


(सोना वान की अन्य कविता)


Dragan Dragojlović प्रमुख सरबेरियन कवि, अनुवादक और राजनैयिक
 

काल परिणाम

अग्नि, भाग्य के बनाए
रास्ते पर चलते हुए

मैने तुम्हारी ज्वालाओं को
अपने हाथों से गढ़ा है

आज भी,मेरा हृदय उष्मा पाता है
तु्म्हारे शब्दरहित प्रकाश में
और पड़ताल करता है
गत मौन मौसमों के चढ़ावों की

मैं तुम्हारी ऊंची ज्वालाओं को प्रणाम करता हूँ
जो, शून्यता के उतराव शीतकाल तक
पहुंचतीं हैं
और कोसता हूँ उन वर्षों को
जब हम अलग हो, अकेले पड़ गए थे

अग्नि, तुम तब तक जलती रहो,जब तक जले मेरा हृदय
उसी के कंपन को मैं तुम्हारी लपटों पर रखता हूँ
जिसके पूर्वाभासों को मैं अपनी कामनाओं से छलता रहा हूँ
एक घर के बुझे सपनों का अग्निस्थान
जिसमें प्रेम कभी मर नहीं सकता।

 

अनुवादक रति सक्सेना

( Dragan Dragojlović  की अन्य कविताएं)


अनवर सुहैल  की कविताएं


आओ!

बोलना है ज़रूरी
वे डराकर, धमकाकर
खामोश करने में माहिर हैं
लेकिन हम भी तो हैं जिद्दी कम नहीं
हम जो चुप रहकर
सहते रहने के फायदे जानते हैं
और जुबान खोलने की हिमाक़त की
सजाओं से भी हैं बाजाप्ता वाकिफ

हम कि हर दौर में लब खोलने वाले
हम तो दीवाने हैं ऐसे ही सफ़र करते हैं
आओ, देखो तो सही, कितना मगन रहते हैं....

(अनवर सुहैल  की अन्य कविताएं)


मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए | मुख्य पृष्ठ