आदित्य शुक्ल की कविता


एक अदद बंदूक की जरूरत.

मैं इतना अच्छा आदमी हूँ कि सनक गया हूं
अँधेरे में मुझे आता देख एक साठ साला औरत अपने आँचल सम्भालती है
ये शर्म की बात उससे अधिक मेरे लिए
मैं अपने सौ से भी ज़्यादा टुकड़े कर सकता हूं
मेरे मस्तक में कीड़ों का साम्राज्य उग आया है
उनकी टांगें मेरे सिर पर छोटे छोटे सिंग जैसे बढ़ रहे हैं
आप मुझे कुछ भी ऑफर कर सकते हैं
बीड़ी, गांजा या बन्दूक।

1)
आवश्यक सूचना:
इश्तिहार के लिए बोर्ड खाली है
किराए के लिए घर
चलने के लिए सड़क
खाने के लिए रेस्तरां
जलने के लिए शमशान

आप किधर जा रहे हैं? नीचे दिए फोन नम्बर पर सम्पर्क करें।

2)
मौसम बदल चुका है
आदमी की नीयत भी
पहले बकरे से काम चला लेने वाला आदमी
आदमखोर हो गया है-
हरामजादा।

3)
सूखी पत्तियां मुझपर गिरती हैं
फूल नहीं गिरते।
फूल सड़क पर बीच में गिरते हैं
कारों ट्रकों से कुचल दिए जाने के लिए।

4)
इस साल मुझपर बहुत विपदाएं आईं
उनमें से एक कि मैंने बैंक में नौकरी कर ली।

5)
अगर तुम नहीं आओगी
तो तुम्हारे आने का इंतजार करूँगा
लेकिन अगर तुम नहीं आई
फिर?

6)
मैंने एक सवाल पूछा
सवाल पलट कर मुझे घूरने लगा।

7)
मेरे लिए एक तकलीफ हूँ मैं।


बस स्टैंड पर


बस-स्टैंड पर लोग-बाग बातें कर रहे हैं
और हो रही है बारिश.
हवाएं उड़ा लाईं हैं कुछ हरे पत्ते
कागज के टुकड़े
जो ठिठक गए हैं आकर पोल के पायताने जमे पानी में

लोग-बाग बाते कर रहें हैं
उनकी बातों में हैं तमाम बातें
बस की अब नहीं है उन्हें कोई चिंता
बस आएगी अपने नियत समय पर
बादल गरजेंगे
बारिश होगी
रास्ते में लग जाएगा जाम
पोल के पायताने जमा रहेगा पानी.
दूर रेडियो पर बजती रहेगी जानी-पहचानी धुन
बादल गरजते रहेंगे.

लोग-बाग बातें करते रहेंगे
बस-स्टैंड एक दृश्य बनकर लटक जाएगा सड़क किनारे.
लोगों की बातों में इन बातों का नहीं होगा कोई जिक्र
नहीं होगा कोई जिक्र कि कैसे कौन हवाएं उन्हें यहां लाकर ठिठका देती हैं
और फिर यकायक उड़ा भी ले जातीं हैं
वे तो जानते तक नहीं
अपना रुकना, ठहरना, दृश्य बन जाना

बस के आने तक होगा दृश्य
टूट जाएगा फिर
लोग हंसते-मुस्कुराते इधर उधर चले जाएंगे
अपनी अपनी छतरियां खोले
फिर कहीं और ठिठक जाने के लिए.


नींद ही है कि सच है

अधखुली आँखों से नींद टपकता,
बिस्तर रेशमी होता जाता है। तुम्हे आधा देखते और आधा छूते मैं पूछता हूँ
देखो तो सुबह हो आई है क्या, यह झुटपुटा सा क्यों है, सूरज लाल है क्या क्षितिज पर देखो तो।
मानसून की पहली बारिश है, हो रही। सड़कें भीग गयी है। कोई दो प्रेमी इस मिट्टी के रस्ते से गुजरे हैं
बारिश हो रही है। आँखों से टपकती है नींद बिस्तर रेशमी होता जाता है तुम कहती हो
चलो कहीं चले चलते है।
दूर।
तो क्या तुम मेरे साथ गाँव चलोगी, वहां हम खेतों में काम करेंगे और गन्ने और मक्के उगाएंगे
गाँव के लोगों ने कामचोरी में आकर ऐसी खेती करनी बन्द कर दी है या शायद वे उम्मीद करते करते ऊब गए हैं अब कुछ और नहीं, अब ईश्वर ही उनका एकमात्र सहारा है। वे अब मंदिरों और प्रार्थनाओं में अधिक मान्यताएं रखने लगे है। बजाए इसके कि वे खेती करते।
गाँव चलोगी क्या
या अगर मन बदल जाए तो मैं तुम्हारे साथ गाँव को जाने के लिए बैठे ट्रक पर से अचानक उतरकर कहूँ
कि नहीं, नहीं। चलो पहाड़ों पर चलते हैं जहाँ हमें कोई भी जानता नहीं। तो फिर भी तुम चलोगी क्या?
तुम मौन हो स्वप्न में मौन हो। पर तुम्हारी आँखें खुली हैं। पूरी की पूरी। तुम्हारी आँखों में दृश्य चल रहा होगा। दृश्य हमें मौन कर देते हैं फिर तुम कहती हो:
हाँ, चलो न। चलो कहीं भी। कहीं से उतर कर कहीं भी चले चलेंगे। मैं थोडा बहुत जितना भी जीना चाहती हूं वो बस तुम्हारे साथ। अगर हम पहाड़ों पर चले तो वहां एक स्कूल चलाएंगे। अब मुझे कभी-कभी बच्चों को पढ़ाने का मन करता है।
यह कहकर अकस्मात् तुम्हारी आँखों से नींद टपकती है बिस्तर किसी विशाल समुद्र में तब्दील हो जाता है।
मानसून की पहली बारिश है अलसुबह, अखबार बेचने वाला पुराने रेनकोट में आधा भीगते और चिल्लाते हुए कहीं से आ रहा है और कहीं को ओर चला गया। अखबारों में पता नहीं कैसी-कैसी ख़बरें हैं। कोई अच्छी खबर होती तो वह मेरे घर की बालकनी में भी अखबार फेंक जाता या पिछले महीने का बकाया मांगने आ जाता जब मैं या तुम अधखुली नींद में एक घण्टे बाद आने को कह देते।
नींद ऐसी टपकती है कि सब कुछ रेशम हो जाता है शहतूत के पौधे पर लगे फल मीठे हो जाते हैं और हम तोड़ते बीनते खाते जाते हैं। नींद टपकती आँखों के सामने न जाने किस फूल के पौधे पर तितलियाँ मंडरा रही हैं तितलियाँ ही हैं कि न जाने कुछ और और स्वप्न में नींद का ऐसा खुमार है कि तितलियाँ जान पड़ती हैं वे।


 


मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए | मुख्य पृष्ठ