दुष्यंत

1
सुनो!

मैं घग्घर लिखूंगा
तुम प्यास पढ़ लेना

मैं आग लिखूंगा
तुम उम्मीद पढ़ लेना

मैं मृत्यु लिखूंगा
तुम प्रेम पढ़ लेना

मैं भूख लिखूंगा
तुम स्वप्न पढ़ लेना

मैं साँस लिखूंगा
तुम अपना नाम पढ़ लेना

मैं जीवन लिखूंगा
तुम असंभव पढ़ लेना

मैं कुछ नहीं लिखूंगा
तुम सब कुछ पढ़ लेना!

2

सुबह के पाखी से कहना
रात को कुछ नहीं हुआ था

संध्याकाल में कुछ दीप जले थे
मध्य रात्रि तक बुझ गए थे
कौन गया था नींद के देश?
भोर तक उन दीपकों में
बातियाँ थी,
तेल भी था!

बुझ गया था कोई!
पाखी की प्रतीक्षा में
उनींदी आँखों के साथ!

प्रेम की वीथिका में
सूर्य एक उपमान भर है!

3
नीला मोती पहन लिया है इन दिनों मैंने
अपनी उसी उंगली में
तुम्हारी पसंदीदा उंगली जो सीधी दिल तक जाती है

दुनिया के सबसे पुराने ज्ञात नीले मोती को
होप डायमंड कहते हैं
जो भारत की किसी ख़ान से फ्रेंच यात्री को मिला था

नीला मोती
मेरे हृदय के सघनतम स्थान पर है
यह इंद्रियों से आगे अनुभव की विषयवस्तु है!

ज्योतिषी मानते हैं कि
शुद्ध नीला मोती कभी निराश नहीं करता!
शुद्ध नीलमणि!!

संध्या का दीप जल रहा है निरंतर, अकेला!
सुबह का तारा नहीं है वह
जो लेगा होड़ सूर्य से.
वह बुझ जाएगा मध्य रात्रि उपरांत
किसी भी क्षण कदाचित्!
नीली रौशनी में
नीले मोती की!

4
पढ़कर अधूरी छोड़ दी गयी किताबों
के हिस्से में प्रतीक्षा का अनंत विश्राम रहता है!

आधी कही बात के बाद आधी रह गयी बात
होठों पर शेष रहती है
सतमासे बच्चे के जीवन की आकांक्षाओं की तरह!

आधी देखकर छोड़ी गयी फिल्मों
की आंखों में रहता होगा एक
सूनेपन का ठहराव!

जीवन की कथाओं के अधूरे पड़ाव
सृजित कथाओं के 'मिड पॉइंट' जैसे नहीं होते
जिनका अंत रचता है कोई अमर कथाशिल्पी!

जो पंक्तियाँ अधूरी छोड़ दी जाती हैं
लिखकर कालपत्र पर
उनके अर्थों में छुपा होता है सार्थक कुछ
सदियों के लिए!
अधूरी पंक्तियाँ
कभी शिकायती खत नहीं लिखतीं
अधूरी पंक्तियों की आंखों का सूनापन अपठनीय होता है
अधूरी पंक्ति का सौंदर्य तुम क्या जानो!
जिसने केवल पूर्णता के गीत गाए हों
यूटोपिया के आत्ममुग्ध निवासी बनकर!

जो लिख गया अधूरा महाकाव्य
उसने जिया होगा
एक जीवन मुकम्मल!
तुम्हारे अहसास की परिधि में
कहां सिमटता उसका विराट अधूरापन!

तृप्ति के अधुनातन क्षितिजों का आविष्कार करते हैं
आधे रास्ते में छूटे संभोग, अधूरे चुंबन और
अर्धविरामित आलिंगन!
साँस की गति से छुआ होगा
तुम्हारी आत्मा के अंतिम छोर को
उसने आधे क्षण में!
तुमने कर ली होगी
सम्पूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा इतनी देर में !
चंद्रमा ने कर ली होगी यात्रा
अमावस से पूर्णिमा तक की!
अर्धचंद्र ठिठका होगा
तुम्हारे सघन स्पर्श की उस घड़ी में
जब दिशाएं सारी थक के सो गयी होंगी
किसी अज्ञात प्रहर !

अर्द्धसिंचित खेत का सुख और दुख
किसी किसान से पूछना
जिसके बेटे ने एमबीए के पहले सेमेस्टर की फीस
जमा करवानी है अबके बरस!
अधूरे गीत का प्रसंग किसी कवि से
अधूरी पढ़ाई छूटने की कथा
विद्यार्थी नहीं, उसका शिक्षक बताएगा!

ऐसे ही प्रेम का अर्थ पूछना
प्रतीक्षारत व्यक्ति से
जिसका प्रिय अनंत यात्रा पर निकल गया हो अकेले!

आधी रात को
आधा शेष स्वप्न होगा पूर्ण?
घनीभूत पीड़ाओं के बावजूद
प्रतीक्षा शब्दकोश का सुंदरतम शब्‍द है!

5

मैने घग्घर नदी के नाम एक पत्र लिख दिया है
तुम पढ़ लेना हाथ में उसका जल लेकर
अबके बरसाती दिनों में
जब नदी आएगी!

मेरी प्रतीक्षा के शब्‍द तुम्हें भिगो दें तो
मुझे तुम क्षमा करना!
अपनी इन आंखों का पानी
घग्घर नदी के पानी से मिलने मत देना
पानी में आग लगी तो कौन बुझाएगा!

कालपुरुष ने लिखे थे कुछ शब्‍द
तुम तक पहुंचेंगे मेरी कविता बनकर
नदी के सीने पर अंकित किए हैं मैंने
उन्हें अनुवाद मत समझना
तुम उनका गीत बनाकर अपने स्वर में गा देना

मेरी प्रतीक्षा के सघन आवेग से निकले शब्‍द सुनकर
उस संध्या रो पड़ी थी नदी
नदी का जलस्तर यूं ही नहीं बढ़ गया है!
समय मिले तो पूछना नदी से
मेरी आँख में प्रतीक्षा का सूर्य रोज़ डूबता था
गहरे जल में!
नदी का वह तट
तुमसे गले लग जाए तो बुरा मत मानना!
जहां मेरे शब्दों की सियाही क्षण भर
साँस लेते हुए ठिठक गयी थी!

मेरी प्रतीक्षा!
मिलना मुझे निद्रा के अनंतिम स्पर्श पर
स्वप्न की चौखट पर
सुदूर दक्षिण में इलायची के पहाड़ों पर
पूर्व में चाय के बागानों के बीच दीर्घ चुम्बन
गंगा के घाटों पर किसी संध्या आरती के समय!


अलिखित नियम है सार्वभौमिक काव्यशास्त्र का -
स्थानों, वस्तुओं के नवीन नामकरण कवियों का आदिव्यसन है
घग्घर नदी का नाम प्रतीक्षा नदी कर दिया है मैंने!

 

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