सोना वान , अरमेनियान कवयित्री की कविता
अंतिम युद्ध का स्वप्न

यह रोचक है………... मैं सोच रही हूं कि
(अपने तरल घाघरे को हिलाती हुई)
मरूभूमि महानों को जन्म देती
जबकि मैं -
साधारण बच्चों को


हर वक्त
जब कामुक हवा के झोंके मरूभूमि के घाघरे को उठाते हैं, तो
एक नया पैगम्बर जन्म लेता है
(एक मसीहा………..एक मूसा……….एक मुहम्मद)
और वे सब मेरे स्वप्न में एक ही मेज के चारों तरफ हैं
और
यह एक महत्वपूर्ण रात्रिभोजन है
अंतिम युद्ध के बाद
और एक शिक्षक की तरह
मेरी पीठ उनकी तरफ मुड़ी हुई
मैं लिख रही थी चाक से जो मेरी मुठ्ठी में थी
साफ
सुस्पष्ट
अंत
जैसा चलचित्र में होता है

P.S.
और जुडास………….. मैं भूल गयी
क्या वह बहादुरी के साथ नहीं मरा था


अनुवाद - अनामिका अनु


 


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