अनवर सुहैल  की कविताएं
 

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गैर ज़रूरी

ग्लोबल वार्मिंग
पर्यावरण प्रदूषण
निरस्त्रीकरण से भी ज़रूरी है
मिटाना इंसानों के जिस्मो-जाँ में पेवस्त
नफरत के ज़हर को निकाल फेंकना
आओ, सोचें, कुछ ऐसा करें
कम हो दुनिया से इसका क़हर
वर्ना मिट जायेंगी आबादियाँ
बर्बाद हो जायेंगे नगर और शहर


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हद है


हर चीज़ में तुलना
जबकि हमने
उनसे कम की चोरी
उनसे कम की सीनाजोरी
उनसे कम की बेईमानी
उनसे कम की भ्रष्टाचारी
उनसे कम हुए दंगे
और उनसे कम बलात्कार
कितनी सफाई से चल रही सरकार
फिर क्यों इतना हाहाकार ...
इस आधार पर
हम हैं श्रेष्ठ...
हमारा प्रदर्शन बेहतर


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अनुशासित


अनुशासित जीवन जीने वाले
जब झुकाए नहीं झुकते
तब उन्हें तोड़ने की कोशिशें होती हैं
ऐसे लोग अक्सर खामोश रहते हैं
उनकी ख़ामोशी ओस बनकर झरती है
उदास रातों में जुगनुओं का कोरस गूंजता है
तमतमाया हाकिम इसे बर्दाश्त नहीं करता
टूकड़खोर प्यादों की चौकस निगाहें टोह लेती रहती हैं
टनों राख के अन्दर बची रहती हैं बगावत की चिंगारियां
आँचल की आड़ में बनाये काजल से माएं
अपने बच्चों के माथे पर डिठौना लगाती हैं
रे संझा माई, इन्हें बद्नज़र से बचाना
बढ़ई ने बनाये हैं सिंहासन
राजमिस्त्री ने बनाये महल-दुमहले
जुलाहे ने काते रेशमी-परिधान
लोहार ने बनाये तलवार-ढाल-बख्तर
किसानों ने उपजाए अन्न-फल-सब्जियां
पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुलामी करते मजदूर असंख्य
ताल-मृदंग की थाप पर गूंजता गायक का गान
ये न हों तो बिखर जाए
ताश के पत्तों सा सारा विधि-विधान
सारी कोशिशें इन्हीं लोगों को
अनुशासित करने के लिए होती रहती हैं
ये चलते रहें सालों-साल ताल-बद्ध
इसके लिए ही तो बनाये गये कठोर दण्ड-विधान
हाकिम कहाँ जानते हैं
कि ख़ामोशी सबसे बड़ा हथियार है
इस ख़ामोशी के जंगल में कब उग आये शब्दों के पेड़
और झरने लगे बेशुमार अर्थों के पत्ते
देखते-देखते उन अक्षरों को चुन-चुन कर
बना लिया गया एक नया संविधान
और भौंचक ताकते रह गये
हाकिम-हुक्काम


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डर चारों ओर

बस चंद रोज़ और
इसके बाद ये जो छाए हैं
हर दिल में डर के काले बादल
छंट जाएंगे और खिल जाएगी
सर्दियों वाली कुनकुनी धूप
समय आ रहा साथी
हम फिर गुनगुनाएंगे एक साथ
कि चीख रोके रखने की पाबंदियों से
सूख चुके थे हलक़ और उग आए थे काँटे
कि ढोलक की थाप पर नाचेंगे हम
हम ये जो परचम सबका रहे हैं
इसका रंग हमें संघर्ष की ताकत देता है
इन झंडों में घुला हुआ है
हमारे बलिदानी साथियों का रक्त
और यही रंग महावर है
हमारे लहूलुहान पैरों का
शुक्रिया साथियों बेशक तुम मजदूर नहीं
शुक्रिया साथियों बेशक तुम किसान नहीं
शुक्रिया कलाकारों, कवियों और रंगकर्मियों
शुक्रिया, कि अपने आरामगाहों को छोड़ कुछ देर
तुम साथ रहे और सुना आर्तनाद हमारा
हम जो जिंदगी से डरने लगे थे
हम जो मौत से प्यार करने लगे थे
हम जो भीड़ में भी अकेला हो जाते थे
देखो तुम्हें साथ पाकर महसूस कर रहे ऐसा
जैसे पा लिया हो पुनर्जीवन।

 


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