मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 (ISSN 0976-5158)   


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कविता किस के लिए

काल और स्थान सापेक्ष है। कुछ ऐसे तत्व होते हैं, जो काल को चिह्नित करने में सक्षम होते हैं, ये समय के संस्कार हैं जो कभी कभी कला में परिलक्षित होते हैं। कला के स्वरों को हम कविता कह सकते हैं. जो प्रतिध्वनि की तरह मानवीयता के साथ भ्रमण करती है। कविता काल से परे हैं, जो आवर्तित होती हुई भी नवीन सी प्रतीत होती है।

कविता जितनी जमीन से जुड़ती है, उतनी ऊंचाइयों की तरफ रुख लेती है। वह एपने काल के साथ चलते हुए आगे भी रहती है. और पार्श्व की स्मृतियों को झोली में रखे रहती है।

कविता आदमी को जिन्दगी से जुड़ना सिखाती है तो जिन्दगी से परे सोचना भी .
कविता जितना साथ रहना सिखाती है उतना ही एकाकी पन से सुलह करना भी

कविता किसी खास के लिए होती है, तो कभी किसी के लिए भी नहीं

इसी कविता को झोले में भर कर कुछ व्यापारिक अंको को पार कर लेते हैं तो कुछ सब कुछ त्याग देते हैं.

कविता के अनेक चेहरे होते हैं. और कभी कभी सभी चेहरों पर एक ही कविता होती है

कविता मृत्यु में भी जिन्दगी के गीत सुनाती है. दीवारे तोड़ती है, प्रेम को स्वर देती है. बदरंग रंगों को खिलना सिखाती है, पैबन्द में मुस्कान खिलाती है।

रति सक्सेना
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उसे अभी आवाज मत दो
वह पूरी तरह से आ रहा है
अपनी लगभग पारदर्शक शक्तियों के साथ
वह पहले से ही तुम्हारी मुस्कराहट का हिस्सा है
वह जंगल की सुगंध सा आ रहा है
अप्रत्याशित खरगोश के जबड़े से उसका कुछ लेना देना नहीं
वह पहले से ही तुम्हारे हाथों में थमा
वह उस सिंहासन पर विराजमान जो तुम स्वयं बन चुकी हो
वह विकसित हो रहा है बहुल बादलों में
वह डर जाता है
Davide Rondoni
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तुम माली हो
और मेरे बगीचे का हर फल भी
फिर भी क्यों
मैं खुद का जिक्र करता हूं
क्योंकि
मैं न तो बारिश हूं,न धूप
न बीज,न मिट्टी?
फिर भी
अभी जो मेहमान आए हैं
देखो मित्रों,
मैं अब भी कह रहा हूं
जो कुछ भी तुम्हारा है,मेरा है
क्या मुझे मालूम नहीं
जो भी मेरे पास है
वह तुम्हारा ही दिया है?
क्या मैं नहीं जानता कि केवल तुम्हारे
पुष्प ही कभी नहीं मुरझाऐंगे
क्या मैं नहीं जानता
जो भी मेरे पास है
वो तुम्हारा ही दिया है?
मार्गस लैटिक,
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जंगल में रात को जो आवाज़ें आती हैं
उनमें शायद ही कोई आवाज़ आह्लाद की या ख़ुशी की होती हो
विकराल आवाजें भी कराहट और अवसाद से भरी होती हैं
जिन्हें मारा जाना है
या जिन्हें मारना है
दोनों ही दुःख में डूबे हुए हैं
और मैथुन की इच्छा से निकाली गई आवाज़ें भी
जिन्हें प्रेम से भरा होना था
संजय चतुर्वेदी
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कविता लिखना समझ न आने वाली बड़ी दुनिया के बीच खुद को तलाश लेने की एक बेहद निजी कवायद है जिससे अपने समय, समाज और इस दुनिया में होने की कोई समझ बन सके . इस लिहाज़ से यह बेहद अन्तरंग जगह है जो अपने साथ बैठ लेने की सहूलियत देती है , कभी चुपचाप, कभी झगड़ा करते हुए, और कभी दुलार के साथ . यह विशुद्ध प्रज्ञा को झकझोर देने. तर्क की विपरीत दिशा में आगे बढ़ने की मति व दुस्साहस है या फिर हमारे जीनोम में अमूर्तन का कोई कोड , या अवचेतन में छिपा कोई आदिम बोध है जो लगातार लय, ध्वनि और इमेजेज़ को चिन्हित करता रहता है . शायद कविता भाषा के पहले और भाषा के इतर की स्मृति की वाहक भी है, मन की किमीयागिरी है—जो अजाने संसार में, अनिश्चित यात्राओं में हमारी शरणगाह बनती रहती है. लिखना निजता के माईक्रोस्कोपिक फ्रेम के बाहर एक बड़े स्पेस में बनीबुनी समझ को परखना भी है, जीवन अनुभव के बेतरतीब ढेर को खंगालना है, भीतर चलती एक अनवरत तोड़फोड़ है सालों-साल की. इस प्रक्रिया में जो भी निज है, एक मायने में फिर निज नहीं रहता, सामाजिक हो जाता है, स्व:अनुभूत एक सामूहिक अनुभूती का छोटा सा टुकडा बन जाता है .

प्रवासी नोट्स
घर नहीं है अब

गाँव- शहर- किसी देश में,

सिर्फ़ कुछ तारीखें हैं

और चिंदी-चिंदी कागज के टुकड़े!

कहीं नहीं है घर का पता.

पृथ्वी पर पसरा हुआ है परायापन,

सुषमा
 नैथानी

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Charl Pierre Naude

विज्ञान की खूबसूरती

एक शाम
मैं नीचे गया था
शोरगुल से भरे मुख्य मार्ग पर
लैम्प चमक रहे थें
जैसे
तारों के जाल में फंसे सितारे

रेस्तरां की वो मद्धिम रोशन खिड़कियां
अतीत की परिक्रमा
जैसे तारागृह में
झिलमिलाते वृत्ताकार चक्र

हम एक चीनी रेस्तरां में घुसे
वह जगह जहां हमने सृजन को समझना शुरू किया
हममें से प्रत्येक
एक अपरिपक्व खगोलज्ञ

बहुत सतर्कता से
परिरक्षित किया है
इस बहृमांड को
जूते के डिब्बे में
और एक दिन अप्रत्यासित
धुंधली आशुचित्रों से
लबालब
वह भानुमती का पिटारा
ताखों पर से नीचे गिरता
और विज्ञान जीवित हो उठा
जैसे हवा में सीधी लकीर खींच गयी हो
कैसे ये सूक्ष्म चौकोर कालीन पर चारों तरफ घूम रहे है
ये बताते हैं
जीवन का अंत:प्रवाह
पूर्णतः आकस्मिक है।
लेकिन दूसरों को विश्वास है
कि
सृजन सूक्ष्मतम नियोजन को परिलक्षित करता है।

देखो राख की बारिश
या बर्फ की
प्रत्येक येशु कण
षड्कोणीय
गुलामों के द्वारा निर्मित
गिरिजाघर
जिनमें महान आत्मा
धीरे धीरे उतरती है
यह मान लिया गया है कि
व्योम और उसमें उपस्थित हर चीज घुमावदार है
 

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ऊपर जो दरारे दिख रही हैं
क्या स्वर्गकम्प का परिणाम है?

यदि ऐसा है तो विंसेन्ट हुईडोब्रो को
रास्ता मिल गया होगा
घावों ने निशान दिख रहे हैं
बादलों के बीच?
वे पर्यावरण को सरकस के तम्बू में बदल रहे हैं
जिसके चबूतरे पर
आरामदायक दुर्भाग्य बैठा है
काव्यात्मक दृष्टि के अवशेष से काफी दूर

ऊपर जो दरारे हैं, सभवतया
आसमान की ओर फैंके गये पत्थर हैं

किसने फैंके पत्थर
कौन फैंक सकता है उन्हें?
किसने इतनी ताकत को होने दिया
कि आसमान में पत्थर फैंक सके?
कौन इतना निराशावादी है
कि हाथ छिपा लिया?

यहाँ तक कि पत्थर तक नहीं
हम जैसे सुस्त हैं, तो केवल
वे भभाके देख पाये जो अब भी ऊपर चढ़ रहे हैं
और ये गैसे बदबू मार रही हैं
अस्पष्टता अभी भी ऊपर उठ रही है
और ये द्रव भी चढ़ रहे हैं अभी
ना देखे जा सकते ना सूँघें
लेकिन जैसे नजदीक से गुजरते हैं होंठ फट जाते हैं
आँखों में खुजली और जलन होने लगती है

तर्जनी के सिरे पर विलाप
हम कहते हैं कि ये भभाके
ये गैसे और, ये द्रव्य परिरेखाएँ हैं
घिसटने हैं पत्थरों द्वारा छोड़ी गईं
अब आसमान चूर चूर हो गया है
हमारे सिर पर गिर
पड़ने की आकांशा है

बहुत से छेदों अथवा
घने प्रतिशोधों के कारण

चमकते दर्पण हवा में लटकते हैं
हर जगह आँखे खिल उठती हैं
सर्जिओ इन्फेन्ते
***
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VOL - XI/ ISSUE-V

मार्च- अप्रेल 2019

प्रमुख संपादकः
रति सक्सेना

 सम्पादक: अनामिका अनु
 

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