सुषमा  नैथानी


नोट:
कविता लिखना समझ न आने वाली बड़ी दुनिया के बीच खुद को तलाश लेने की एक बेहद निजी कवायद है जिससे अपने समय, समाज और इस दुनिया में होने की कोई समझ बन सके . इस लिहाज़ से यह बेहद अन्तरंग जगह है जो अपने साथ बैठ लेने की सहूलियत देती है , कभी चुपचाप, कभी झगड़ा करते हुए, और कभी दुलार के साथ . यह विशुद्ध प्रज्ञा को झकझोर देने. तर्क की विपरीत दिशा में आगे बढ़ने की मति व दुस्साहस है या फिर हमारे जीनोम में अमूर्तन का कोई कोड , या अवचेतन में छिपा कोई आदिम बोध है जो लगातार लय, ध्वनि और इमेजेज़ को चिन्हित करता रहता है . शायद कविता भाषा के पहले और भाषा के इतर की स्मृति की वाहक भी है, मन की किमीयागिरी है—जो अजाने संसार में, अनिश्चित यात्राओं में हमारी शरणगाह बनती रहती है. लिखना निजता के माईक्रोस्कोपिक फ्रेम के बाहर एक बड़े स्पेस में बनीबुनी समझ को परखना भी है, जीवन अनुभव के बेतरतीब ढेर को खंगालना है, भीतर चलती एक अनवरत तोड़फोड़ है सालों-साल की. इस प्रक्रिया में जो भी निज है, एक मायने में फिर निज नहीं रहता, सामाजिक हो जाता है, स्व:अनुभूत एक सामूहिक अनुभूती का छोटा सा टुकडा बन जाता है .

प्रवासी नोट्स


घर नहीं है अब

गाँव- शहर- किसी देश में,

सिर्फ़ कुछ तारीखें हैं

और चिंदी-चिंदी कागज के टुकड़े!

कहीं नहीं है घर का पता.

पृथ्वी पर पसरा हुआ है परायापन,

मुसाफिर मन सालों-साल.

घर ज़मीन से बेदख़ल

छिन्न विछिन्न पहचानों के बीहड़ में गुम

तिनके-तिनके बिखरा

स्थगित है जीवन

स्थगित नागरिकता...


जाने कौन सी आस रही,

कि निपट निराशा थी,

या ऊलजलूल से ढका आसमान था.

शायद खीझ भी थी कि

हमारे होने से भी कब कुछ होना था.

कि अजाने भूगोल में गुम होने का रोमान था

या अनचाहे बंधों, बेबसी,

शर्म से मुक्ति का कोई गान था

और पहचाने दायरे से ही भागा था मन....


अजनबी है अब वो देश

यहां, यह देश भी.

रिफ्यूजी मन ढूंढता रहता है

कोई पहचानी शै, परिचित चेहरा,

आवाज़, पहचानी हंसी,

किन्हीं आँखों में उतरती जानी सी चमक

एक ज़रा सा दिलासा

क्षणिक ही सही नेह की आश्वस्ति.



रोजमर्रा की भागदौड़ के बीच

स्मृति की नदी में तैरता बीतता है दिन.

रात चोर के मानिन्द करती है सेंधमारी,

किसी आवाज के अंदेशे में टूटती है नींद,

मद्धम रोशनी सी पसरती है चेतना

फिर कुछ देर को बैठता है दिल.

लावा सा आठ दिशाओं में पिघलता मन

अलसुबह की खुमारी में सोचता है कि

अब सपनों की सरहद तक है अपना होना...


***


2. तारा*

सांत्वना और प्रार्थना में साथ-साथ

बुद्ध की शरण में लौटती रही
निर्वाण के लिए नही

जीवन से ही है मोह भरपूर.
अहिंसा की चाह नही,

भीतर बहुत ज़रा सी सहेजी है हिंसा

और चौतरफा बाहर फ़ैली रही जो

यथाशक्ति किया उसका प्रतिकार.

कभी चुपचाप दूसरी दिशा चली,

अंधकूप में आत्मा बिलबिलाती रही,

ठस हुयी संवेदना,

समतल हुआ भाव संसार,
ख्व़ाब जाने किस अरगनी टांकती

निस्संग बनी नील तारा...



हे बुद्ध! बीतें, बिखरे हैं ढाई हज़ार साल

खत्म हुईं सभ्यतायें,

बिसरा गईं बोलीयाँ,

लोप गयीं भाषायें,

बीतें पूरब-पश्चिम के रेनेसां!

अनगिनत युद्धों ने दर्ज किये दस्तखत

और फिर रक्त की नदियों के बीचों हुईं सन्धियाँ.

जिजीविषा की हज़ार कथाओं के बीच

तुम्हारी कथा में भटकती रही श्वेत तारा...




सामने हैं बहुत सी काली दीवारें

जिनके आरपार देखना असंभव,

उदास है समय, व्यथा एकसार.

बचा कोई महाद्वीप न कोई टापू.

सब जगह बिखरे हैं बुद्ध के भग्नावशेष

टटोलती रही हरित तारा...




आगे है

अदेखी संभावनायें,

क्या सचमुच कभी

रेत के महल सरीखे सब प्रपंच ढहे जायेगें
होंगे हम निष्पाप, बेपर्दा

आत्मा तक पारदर्शी!

नमक की डली सरीखे

घुले जायेंगे

पराजय, अपमान,

डर, दंभ व क्षुद्रता के दंश,

निर्विकार होगा मन,

समूचे हम मुक्त होंगे,

समूची होगी सभ्यता.

सांत्वना और प्रार्थना में

लौटती रही तारा...


***

तारा*: बोधिसत्व का स्त्रीरूप


3. प्रायमरी स्कूल


बस ज़रा सी याद है मुझे प्रायमरी स्कूल की

पहाड़ की छाँव और खेतों के बीच धूप नापते,

रिक्ख, बाघ के डर के साये,

डेढ़ घंटे पैदल-पैदल चलना,

और रोज़ पेन्सिल का आधा टुकड़ा गँवाना.



दो मास्‍टरनियां थीं जिनके पढाएं का

भरोसा नहीं करते थे माँ-बाप,

दो मास्साब थे जो ठोकपीट सीखा देते थे पहाड़े,

और एक ताई थी जो इंटरवल में खिलाती थी दलिया.

वैसे यह सूचना है कि अब उस स्कूल की छत

ताई ने ठीक करवा दी है उस मुआवज़े से

जो उसे २३ साल के सैनिक बेटे की शहीदत के बाद मिला था.


तीसरी कक्षा में मुहम्मद साहेब का एक पाठ था

जिसका सिर्फ़ एक वाक्य अब तक याद है

"अरब में लोग बेटियों को ज़मीन मे गाड़ देते थे".

नहीं मालूम था कहाँ अरब देश

पर गाली गढवाल में भी थी “खाडू म धरूल”६

माने छोरियाँ जैसे ज़मीन में गाड़ने को ही बनी थीं.

मेरी नज़रें जब-तब ज़मीन में गड़ी छोरियाँ ढूंढती रहती,

और कई बार मेने माँ से पूछा कि मुझे कब गाड़ेगी?

माँ सुनकर आगबबूला होती,

मुझे तब नहीं पता था कि मैं पहली संतान नही.


चौथी में सम्राट अशोक के ह्रदय परिवर्तन का एक पाठ था

कलिंग को ध्वनि के मोह में ‘कर्लिंग’ लिखती रही

लिखती रही.. मार खाती रही.. कई-कई दिन.

तंग आकर मास्साब ने अलमारी के ऊपर बिठाया आधा दिन

और शाम को माँ से कहा


“इस लड़की को कुछ समझाना मुश्किल”



तीन दशक बाद एक पराये देश में

अपने बच्चे के लिए ढूंढ रही हूँ प्रायमरी स्कूल.

परिचित, पडौसी बताते है कि

अच्छे प्रायमरी स्कूल की सरहद में मकान की कीमत बढ़ जाती है.

मंदी की मार के बीच प्रोपर्टी एजेंट इस बात की तसदीक करता है

उसकी चिन्‍ता शिक्षा नही प्रोपर्टी की रीसेल वेल्यू है


अमरीका में अच्‍छे स्कूल का मतलब

उच्चमध्यवर्गीय बसावट का नजदीकी स्कूल है,

और मुक्त बाज़ार तय करता है स्कूल में संगत.

इस बीच ओबामा रास्ट्रपति हैं,

एक दशक के युद्ध और लगातार बढ़ती मंदी के बीच

शिक्षा के लिए बजट कटौती हुई है.

स्कूल में वॉलेन्टियर करते अभिवाहक हैं,

शिक्षा की बदहाली पर “वेटिंग फॉर सुपरमेन”७

और “एकेडेमिकली अड्रिफ्ट” ८ है.

गोकि जीवन में स्कूल से ही बंधी हूँ

प्रायमरी एजुकेशन का कोई प्राइमर नही मेरे पास...


***

६“खाडू म धरूल”; गाड़ दूंगी, एक गाली

७“वेटिंग फॉर सुपरमेन”; डेविड गूगनहाइम द्वारा निर्देशित डोकुमेन्टरी फिल्म(२०१०) ,

८“एकेडेमिकली अड्रिफ्ट रिचर्ड अरम और जोसिपा रोक्सा की किताब (२०११)


 


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