डेविड रन्डोनी, Davide Rondoni की कविता

(इतालवी कवि)

 

प्रेग्नेंसी टेस्ट

उसे अभी आवाज मत दो
वह पूरी तरह से आ रहा है
अपनी लगभग पारदर्शक शक्तियों के साथ
वह पहले से ही तुम्हारी मुस्कराहट का हिस्सा है
वह जंगल की सुगंध सा आ रहा है
अप्रत्याशित खरगोश के जबड़े से उसका कुछ लेना देना नहीं
वह पहले से ही तुम्हारे हाथों में थमा
वह उस सिंहासन पर विराजमान जो तुम स्वयं बन चुकी हो
वह विकसित हो रहा है बहुल बादलों में
वह डर जाता है
जैसे आरंभ में तेज़ हवा के झोंके जो टहनियों को झुकाती
लेकिन रंगों को सजीव करती
मेरी प्रिया,
खूबसूरत लेकिन चिंताओं से भरी
उसके चिन्ह तुम्हारे देह में परिलक्षित
खुशियां इंतजार कर रही है
वक्त ही खुशी है


प्रेम अपने आरंभ और अंत में एक मनोभाव नहीं होता
पर तुम्हारा आना
एक बेचैन करने वाला आवेश
चक्रवात के केन्द्र
पथरायी दृष्टि के स्वप्न जो ऐंम्बर के नीचे चकनाचूर हो गयी
हवा में और तुम्हारे चेहरे पर तारों की सजावट
हर कदम पर “लास्ट जजमेंट”
मनोभाव बदलते
लेकिन नहीं खत्म होता
वह संघर्ष जो
जीवन में जीवन को खोजता है
और
मृत्यु में जीवन को खोजता है
प्रिया मुझे कस के जकड़ो
तुम्हें महसूस हुआ
मौन ,इटली की गलियों में चिंघाड़ता
क्या इटली बन रही है खून की इन बूंदों
और अशिष्ट बैयरा के बीच में
कुछ ऐसा जिसके नाम का भी पता नहीं है
एक खूनी की तरह
न कोई आंख,न कोई भूत
दिन के नामों में घूमते हैं और बिषाक्त करते हैं
लेकिन तुमने आदि से अंत तक प्यार किया
हवा को बुलाया
लौटने के नये रास्ते खोजे
चौकों को अपने से महरूम मत करो
पालने और कार पर हाथें
सूरज के खिलाफ गठबंधन
कविताएं और औरतें
ये बावली औरतें

अनुवाद -अनामिका अनु

 


मार्गस लैटिक, मथुरा Mathura की कविता

(इस्टोनियन कवि)

माली

तुम माली हो
और मेरे बगीचे का हर फल भी
फिर भी क्यों
मैं खुद का जिक्र करता हूं
क्योंकि
मैं न तो बारिश हूं,न धूप
न बीज,न मिट्टी?
फिर भी
अभी जो मेहमान आए हैं
देखो मित्रों,
मैं अब भी कह रहा हूं
जो कुछ भी तुम्हारा है,मेरा है
क्या मुझे मालूम नहीं
जो भी मेरे पास है
वह तुम्हारा ही दिया है?
क्या मैं नहीं जानता कि केवल तुम्हारे
पुष्प ही कभी नहीं मुरझाऐंगे
क्या मैं नहीं जानता
जो भी मेरे पास है
वो तुम्हारा ही दिया है?
क्या मैं नहीं जानता
कि दुआओं से भरी वह ज़मीं,
वे पेड़ उगाऐंगी
जिन्हें कभी खाद की जरूरत नहीं होगी
क्या मैं नहीं जानता
कि वह नाम जो कभी नहीं मिटेगा
वह तुम्हारा होगा
भले ही वह रेत पर लिखा हो


अनुवाद - अनामिका अनु

 

(मार्गस लैटिक की अन्य कविताएं)
 


प्रमिता भौमिक  की कविता


"अजाना आकाश


साँझ के पार्श्व में लगे हैं
उड़ गए पंखों के रंग;
फटी हुई स्मृतियों के समान
टूटते जा रहे हैं सारे रास्ते
जगे रहने की आवाज़ से
थमता जा रहा है शरीर-मन
जिसे मैं फेंक आई थी
चाहकर भी उसे नहीं लौटा पा रही हूँ

तुम हटते जा रहे हो दूर
और थरथरा उठी है बुझती रोशनी
ख़ासी दूरी पार कर --
मेरी हथेली पर
मुड़कर देख रहा है अजाना आकाश

लगातार ऊपर उठते-उठते
ख़ुद को बहुत हलका महसूस हो रहा है
हालाँकि नीचे की ओर देखती हूँ तो
कुछ और दिन जीते रहने की इच्छा होती है।

(बंगला से उत्पल बनर्जी द्वारा अनूदित)
 

(प्रमिता भौमिक की कविताएं)


आनन्द खत्री ( सूफ़ी बेनाम )  की कविता


एक चिऊंटी का छोटा सा बच्चा

एक चिऊंटी का
छोटा सा बच्चा
सीताफ़ल के खेत से अपहरणित
सब्ज़ी की बाज़ार में खोया-खोया
सहमा-सरकता चला आया
मेरी सफ़ेद कुर्ते की
मुड़ी हुई बाँह की सिलवट में
मेरे घर तक।

एक उंगली के सहारे
उतारा उसको मैंने
गर्मी से धूसरित बगीचे की
पोड़ी हुई पाँस-मस बेसुध
मिट्टी में,
वो माँ, मात्रे, मातुः, वालिदा पुकारता हुआ
धरा-प्रदेश में यूँ खो गया
जैसे अपनी माँ की गोद में
बैठ छिप गया हो।

खोई हुई चिउंटी रास्ता नहीं भूलती।
चिऊंटियां धरा को अपनी माँ
मानती हैं।


( आनन्द खत्री  की अन्य कविताएं)
 


चंद्रेश कुमार छतलानी की कविता


स्वयम हूँ स्वयम से दूर


मैं अपूर्ण हूँ,
फिर भी मैं केवल मैं ही हूँ |
स्वयम की स्वीकृति की साथ हूँ,
लेकिन अपर्याप्त हूँ|

मैं जानता हूँ कि
वो निर्विकार मुझमे समाहित है
लेकिन मैं भावबद्ध हूँ|

सृष्टि के सृजन की शक्ति के साथ
मैं अलौकिक का स्वामी हूँ|
फिर भी रक्त का हर कण
मुझे शुद्ध करना होता है |

मुझे काटना दिव्यता के लिए असंभव है
किसी और आवश्यकता नहीं है|
संचय की प्रवृत्ति के साथ,
मैं प्रचुर कैसे हूँ, विचार निःशब्द हैं|

मैं सभी आनंद का स्त्रोत हूँ,
हर विकार से हर क्षण परे हूँ|
लेकिन ब्रह्माण्ड की ऊर्जा को
सुख दुःख में परिवर्तित कर देता हूँ|


मैं कभी भी दर्पण में
अपने आप को नहीं देख पाता हूँ
स्वयम को पाना ही मोक्ष है
स्वयम से क्यों दूर चला जाता हूँ ?



(चंद्रेश कुमार छतलानी की अन्य कविताएं)


संजय चतुर्वेदी की कविता


संकेत

जंगल में रात को जो आवाज़ें आती हैं
उनमें शायद ही कोई आवाज़ आह्लाद की या ख़ुशी की होती हो
विकराल आवाजें भी कराहट और अवसाद से भरी होती हैं
जिन्हें मारा जाना है
या जिन्हें मारना है
दोनों ही दुःख में डूबे हुए हैं
और मैथुन की इच्छा से निकाली गई आवाज़ें भी
जिन्हें प्रेम से भरा होना था
दुखद संकेत बनके गूंजती हैं रात के गूढ़ आवरण में

लेकिन इनमें सर्वाधिक रहस्यमय होती हैं कीड़ों और मैढकों की आवाज़ें
जो घबराहट में भेजे गए रेडिओ संकेत जैसी लगती हैं
पटाक्षेप से पहले
ज़ुरूरी काम कर लिए जाने की हड़बड़ी में
प्रणय संकेत और आर्तनाद में अंतर नहीं रह जाता
जीवन कालिक है
और निरन्तर भी
और इसमें एक सनातन असुरक्षा छिपी है
जब एक ही आवाज़
प्रेमियों और भक्षकों को एक साथ पास बुलाती है
मारे जाने की कीमत पर भी
कीड़े संकेत देते रहते हैं

और ध्वनियों संकेतों का वह सर्वाधिक प्राचीन और विपुल आयतन
जो समुद्रों के गर्भ में छिपा है
जिसका एक हिस्सा प्रतिदिन शून्य में निकल जाता है
जिसमें संसार की लिपियों के रहस्य छिपे हैं
अन्य नीहारिकाओं को पानी की खोज में भेजे गए
मछलियों और शैवालों के संकेत
और उनके चुम्बकीय आकारों का विवरण छिपा है
और यह भी
कि कोटि कल्पों से
किसी दूरस्थ जीवन के लिए
कीड़ों-मकोड़ों के विपुल संसार की सनसनाहट
संकेत बनकर शून्य में फैल रही है
प्रेमियों और भक्षकों को
अपने होने की सूचना देती हुई
और यह भी
कि जीवन दुखी है
और जो जलमग्न है
वह भी जल रहा है ।

(संजय चतुर्वेदी की अन्य कविताएं)


मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए | मुख्य पृष्ठ