मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 (ISSN 0976-5158)   


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कविता की बात कहीं से भी शुरु की जा सकती है, कविता का "क" तक ना मालूम हो तो भी, और अक्षरों से गुजर को ध्वनि को पकड़ना ना आता हो तब भी़। क्यों कि हर मनुष्य जन्मतः कवि ही होता है। संभवतया भाषा बनने से पहले ध्वनियां बनी होंगी , ओर ध्वनियों में रस रंग भरा गया होगा। कुछ भाषाएं तो होती ही ऐसी हैं जैसे कि चिड़ियां चहचहा रही हो। भाषा जितनी प्रकृति से दूर जाती है, जितनी संस्कारित होती है, उतनी शुष्क होती जाती है। यही स्थिति कविता के साथ होती है, यह जितनी नैसर्गिक होगी उतनी लयात्मक होगी, जितनी संस्कारित होगी उतनी कृत्रिम। कविता में समस्त रसों की संभावना है, हास्य की भी, लेकिन काव्यत्मक हास्य भौंडा नहीं बल्कि व्यंग्य से तीखा होता है।

कवि की स्वतन्त्रता बहुत अहम स्थान रखती है, और उसे सदैव शासन या प्रभूत्व के सामने सवाल बन कर खड़ा होना चाहिये। जिस काल में कविता प्रभूत्व के दरबार में सजी, उसी काल में वह लक्ष्य से भटक गई। वह भाव सौन्दर्य से शब्द चातुर्य की ओर चली गई। यहाँ कविता की गति मन्थर पड़ गई, अलंकारों का वजन बढ़ता गया। सच्ची कविता वही है जो अक्षर ज्ञानी से लेकन अल्पज्ञ तक के मन में उतर जाए. जो सबकी अपनी सी लगे.

जहाँ तक शासन का सवाल है, वहाँ कवि का स्थान सदैव विपक्ष होता है, ...

रति सक्सेना
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उस रात जब अँधेरा बहुत घना था

मौसम ज़रा गुनगुना

माँ ने अपने सर्द हाथों में थाम

मेरे हाथ को कहा

अरे तू तो तप रहा है भट्टी सा

उसके यह लफ्ज़ मेरे कान तक पहुंचे

और बिखर गये आँखों से

पिघलते आइसक्यूब के पानी की तरह

निर्मल गुप्त
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तुम माली हो
और मेरे बगीचे का हर फल भी
फिर भी क्यों
मैं खुद का जिक्र करता हूं
क्योंकि
मैं न तो बारिश हूं,न धूप

अशरफ अबोल याजिद
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विस्थापितों के नाम एक ख़त
तुम गुस्से में होगे बहुत,
बहुत नाराज़ भी हमसे.
घना होगा बहुत तुम्हारे
दुख का जंगल भी,

शिखर गोयल
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टोक्यो में उतने
कौए है
जितनी कि कब्रे हैं
लेकिन कौए भाग्यवान हैं
हालांकि तुलना नहीं हो सकती
फिर भी बहुत से कौए और
स्त्रियों के नंगे पांवों में, राह में
चेरी के पेड़ फल रहे हैं, चेरियां गिर रही हैं

शेन हाइबो
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यह फूल है
मैं इसे तोड़ नहीं पाया

मैने टहनी के लिए छोड़ दिया
मैंने उस मधुमक्खी के लिए छोड़ दिया

Gerry Loose
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कहा जाता है कि पुरस्कार प्रसिद्धि का
द्योतक होता है ।
हिंदी जगत के दो शीर्ष पुरस्कार हैं
- ज्ञानपीठ पुरस्कार
और साहित्य अकादमी पुरस्कार।
एक साहित्यकार
के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलना
अर्थात सागर मंथन से प्राप्त सुधा की
प्राप्ति होना जैसा है।
ज्ञानपीठ की प्राप्ति सहज और अनायास
नहीं होती है। लेखक की संवेदना,
मानवीय मूल्य, नैतिक यथार्थ,
समाज के विघटन,
उसकी विद्रुपताएँ-विसंगतियाँ
तथा सत्ता की बर्बरता एवं दुर्निवार
पक्षों को दुस्साहस के साथ लेखनी में
घोलना पड़ता है।

इन सब अपरिहार्य क्षमताओं और योग्यताओं
के बावजूद हिंदी साहित्य में वे एक गुमनाम
लोकप्रिय साहित्यकार हैं।क्यों और कैसे?
इसका उत्तर लेख के बीच ही सूत्र के रूप में
पिरोए मिलेंगे। पूर्ण स्पष्टीकरण भी अवश्यंभावी है
तथा वह भी व्यवस्थित तौर से
इसी लेख के आभ्यंतर मिलेगा।

हर साहित्यकार मूलतः किसी
एक विधा का स्वामी होता है। अर्थात
जिस विधा में वह अपनी छाप छोड़ता है,
उसी विधा में वह लोकप्रिय होता है
और उसी विधा से संलग्न कर पाठक वर्ग
उसे जानता-पहचानता है।नरेश मेहता
मूलतः कवि थे,किन्तु उनकी कविता-निधि
एवं उपन्यास-रत्नाकर का अनुशीलन
किया जाए तो यह कहना ज़रा मुश्किल
होगा कि मूलतः वह कवि थे
या उपन्यासकार।इनके व्यक्तित्व से
इन दो तत्वों को अलगाना ठीक
वैसा ही है-
मंयक 

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विनोद विट्ठल

वह पूरी ताक़त से कहना चाहता है -
हम सबसे नयी, युवा और बेहतर पीढ़ी थे
बेहतर दुनिया का नक़्शा था हमारे पास
आधार कार्ड से पहले हम आए थे धरती पर
ज़ुकरबर्ग से पहले बजी थी हमारे लिए थाली
हम अड़तालीस साल बाद भले ही obsolete हो रहे हैं
पर सुनो हमें, ज़िंदगी की रिले रेस की झंडी हमसे ले लो
ये धरती फ़ेसबुक का फ़र्ज़ी अकाउंट नहीं है
जितनी मेरी है उससे ज़्यादा तुम्हारी है !

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क्या हमारी राजनीति को टी-शर्ट नहीं हो जाना चाहिए ?

फ़िंगर प्रिंट से खुलनेवाली चीज़ों के इस दौर में
बिना पासवर्ड वाले टाइपराइटर की तरह है टी-शर्ट
जबकि पति शेयर नहीं कर रहे हैं पासवर्ड पत्नियों के साथ भी
शेयरिंग कितना विरल मूल्य हो गई है
बावजूद इसके कि इंस्टाग्राम के मंच पर शेयर की जा रही है
हनीमून की हॉट तस्वीरें
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लैटरबॉक्स

अल्लाउद्दीन ख़िलजी के बनाए हौज़ ख़ास की दीवारों पर
खुरच कर लिखे गए एक कूट नाम की तरह
अदेखे पिता के बरसों से अचुम्बित गालों की तरह वीरान
पुराने और प्रिय इंक पेन के टूटे निब की तरह अकेले
ओछी हो गयी बेलबॉटम की तरह अप्रचलित
तस्वीर में बदल गयी बम्बईवाली मौसी की तरह अनुपस्थित
तुम कहाँ हो लैटरबॉक्स ?
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मैंने भाषा के सबसे सुंदर शब्द तुम्हारे लिए बचा कर रखे
मनचीते सपनों से बचने को रतजगे किए
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मैंने विलक्षण मदिरा चखी

मैंने विलक्षण मदिरा चखी--
सिर्फ मोतीभर, पैमाने से--
राईन नदी के इलाके की मय भी ज्यादा नफ़ीस
बयार के असर में मदहोश--हूँ-- मैं --
और मैंने कुछ अधिक ही शबनम के घूँट भरे हैं--
आसमानी सराय से निकल अनंत तक--
लहर लहर डोलती हूँ -- ग्रीष्म के लम्बे दिनों --
जब फॉक्सग्लोव के फूल मदमत्त भ्रमरों
को धकेल कर अपनी पंखुड़ियाँ समेटने लगे--
जब तितलियाँ -- तृप्त हो अपने पंखों के भार से दब जायें
तब भी मेरा मद्यपान रुकने वाला नहीं!
जब तक फ़रिश्ते बर्फ़ ढकी टोपी से सलाम न बजाने लगे --
और सारे संत -- स्वर्ग की खिड़की पर मज़मा न लगायें --
देखने एक छुटकी पियक्कड़ को
जिसकी पीठ के पीछे है -- सूर्य–

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मैं सम्भावनाओं में जीती हूँ

मैं सम्भावनाओं में जीती हूँ —
गद्य से ज़्यादा सुंदर है मेरा (पद्य) घर —
कई-कई झरोखों-झिर्रियों का पुर—
आलीशान —दरवाज़े हैं—
जिनके भीतर झाँकना मुश्किल—
देवदार के नफ़ीस दरो-दीवार —
ऊँची मेहराब
फ़रिश्ते उठाए हुए हैं—
मेहमाँ सब—हसीन —
यही (शायरी) है— मेरा रोज़गार —
पूरी तरह पसरी हुई हैं मेरी अँजुरी—
इस स्वर्ग को समेटने—
एमिली डिकेन्सन
अनूदित सुषमा नैथानी
***

मैं तुम्हारे साथ बसर नहीं कर सकती –
यूँ यह जीवन होगा –
लेकिन होगा –
उस अलमारी के पीछे
जहाँ चर्च का चपरासी संजोता है –
एमिली डिकेन्सन की पाँच कविताये- अनूदित सुषमा नैथानी
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VOL - XiV/ ISSUE-III

मई -जून 2019

प्रमुख संपादकः
रति सक्सेना


 

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