कविता की बात कहीं से भी शुरु की जा सकती है, कविता का "क" तक ना मालूम हो तो भी, और अक्षरों से गुजर को ध्वनि को पकड़ना ना आता हो तब भी़। क्यों कि हर मनुष्य जन्मतः कवि ही होता है। संभवतया भाषा बनने से पहले ध्वनियां बनी होंगी , ओर ध्वनियों में रस रंग भरा गया होगा। कुछ भाषाएं तो होती ही ऐसी हैं जैसे कि चिड़ियां चहचहा रही हो। भाषा जितनी प्रकृति से दूर जाती है, जितनी संस्कारित होती है, उतनी शुष्क होती जाती है। यही स्थिति कविता के साथ होती है, यह जितनी नैसर्गिक होगी उतनी लयात्मक होगी, जितनी संस्कारित होगी उतनी कृत्रिम। कविता में समस्त रसों की संभावना है, हास्य की भी, लेकिन काव्यत्मक हास्य भौंडा नहीं बल्कि व्यंग्य से तीखा होता है।

कवि की स्वतन्त्रता बहुत अहम स्थान रखती है, और उसे सदैव शासन या प्रभूत्व के सामने सवाल बन कर खड़ा होना चाहिये। जिस काल में कविता प्रभूत्व के दरबार में सजी, उसी काल में वह लक्ष्य से भटक गई। वह भाव सौन्दर्य से शब्द चातुर्य की ओर चली गई। यहाँ कविता की गति मन्थर पड़ गई, अलंकारों का वजन बढ़ता गया। सच्ची कविता वही है जो अक्षर ज्ञानी से लेकन अल्पज्ञ तक के मन में उतर जाए. जो सबकी अपनी सी लगे.

जहाँ तक शासन का सवाल है, वहाँ कवि का स्थान सदैव विपक्ष होता है, अर्थात् उसे जन हित में खड़ा होना चाहिये, लेकिन जब वह जनता के साथ खड़ा हो तो उसका स्थअन पक्ष होता है, अर्थात् उसे जनता की आवाज बनना चाहिए, और यदि किसी कारण से जनता की आवाज में कोई दोष हो तो उसे समझाने का प्रयत्न भी करना चाहिए।

लेकिन ये जो बाते में व्यक्त कर रही हूँ , क्या इस काल देश के लिए उचित हैं? यह वह वक्त है जब धन सबसे ऊपर स्थान ले रहा है, इस तरह का त्यागपूर्ण व्यक्तित्व की कामना कवि से की जानी चाहिये क्या?

कविता आज फैशन की तरह भी तो देखी जा रही है।

कविता यदि धन कमाने का जरिया नहीं तो प्रतिष्ठा कमाने का जरिया तो बन रही है।

फिर कैसे यह सोचा जाये कि कवि सब कुछ त्याग दे?


निसन्देह, यह वह काल है जब ज्ञान भी प्रपंच का रूप धारण कर रहा है, गुरुत्व धन कमाने का कारण बन रहा है, लेकिन यह वह भी समय है जब ईर्ष्या घृणा का अद्भुत प्रसार हो रहा है, इसलिए !से वक्त कवि का कर्म और कर्तव्य बढ़ जाता है, और उसे कवि होने से कुछ ज्यादा सोचना पड़ता है, उसे समाज का पहरुआ भी बनना पड़ेगा, और दीवारों के बीच भी खड़ा होना पड़ेगा।

कवि को वह सब करना पड़ेगा, जिसके लिए उसका कवि कर्म उत्तरवादी है

इस अंक की कलाकार शिल्पा मधुमंगेश हैं, शिल्पा की कला में मुझे जिस बात ने प्रभावित किया , वह है मुखाकृतियों में भावात्मक प्रतिक्रियाएँ, जिनमें इतनी अधिक विविधताएं हैं कि वे स्वयं में कविता का सन्देश देती हैं।

शुभकामनाओं सहित

रति सक्सेना



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