नरेश मेहता : आधुनिक हिंदी साहित्य का गुमनाम कवि


मंयक

कहा जाता है कि पुरस्कार प्रसिद्धि का द्योतक होता है । हिंदी जगत के दो शीर्ष पुरस्कार हैं - ज्ञानपीठ पुरस्कार और साहित्य अकादमी पुरस्कार। एक साहित्यकार के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलना अर्थात सागर मंथन से प्राप्त सुधा की प्राप्ति होना जैसा है। ज्ञानपीठ की प्राप्ति सहज और अनायास नहीं होती है। लेखक की संवेदना, मानवीय मूल्य, नैतिक यथार्थ, समाज के विघटन, उसकी विद्रुपताएँ-विसंगतियाँ तथा सत्ता की बर्बरता एवं दुर्निवार पक्षों को दुस्साहस के साथ लेखनी में घोलना पड़ता है।

नरेश मेहता इन सभी पक्षों का समावेश कर इन्हें परंपरा, संस्कृति, धर्म, दर्शन, इतिहास,पौराणिकता,प्रकृति तथा मिथकीय तत्वों से जोड़ते हैं तथा आधुनिकता के आवरण में छुपे आज के तत्कालीन जीवंत तथा सूक्ष्म समस्याओं की पड़ताल करते हैं। इन्हें पता है कि भारत की जनता परंपरा-संस्कृति से अभिन्न रूप से जुड़े हैं।आधुनिकता के ढोल-नगाड़े इनके जड़ो का उन्मूलन नहीं कर सकते हैं तथापि पौराणिक कथाओं, इतिहास, मिथकीय-तत्व,प्रकृति, धर्म, दर्शन आदि के माध्यम से आधुनिक युग के परिदृश्य को पारदर्शी रूप में सामने रखते हैं तथा उन्हीं के माध्यम से वर्तमान युग का बयां-ए-हाल सुनाते हैं। साहित्य के हर विधा में कर्तव्यनिष्ठा के साथ एवं रचनाधर्मिता से सम्बद्ध होकर इन्होंने सर्जना की है। कविता,उपन्यास,कहानी,निबंध,आलोचना, यात्रा वृत्तांत,संपादन आदि सभी क्षेत्रों में महती भूमिका गर्व के साथ अदा की है।

इन सब अपरिहार्य क्षमताओं और योग्यताओं के बावजूद हिंदी साहित्य में वे एक गुमनाम लोकप्रिय साहित्यकार हैं।क्यों और कैसे? इसका उत्तर लेख के बीच ही सूत्र के रूप में पिरोए मिलेंगे। पूर्ण स्पष्टीकरण भी अवश्यंभावी है तथा वह भी व्यवस्थित तौर से इसी लेख के आभ्यंतर मिलेगा।

हर साहित्यकार मूलतः किसी एक विधा का स्वामी होता है। अर्थात जिस विधा में वह अपनी छाप छोड़ता है,उसी विधा में वह लोकप्रिय होता है और उसी विधा से संलग्न कर पाठक वर्ग उसे जानता-पहचानता है।नरेश मेहता मूलतः कवि थे,किन्तु उनकी कविता-निधि एवं उपन्यास-रत्नाकर का अनुशीलन किया जाए तो यह कहना ज़रा मुश्किल होगा कि मूलतः वह कवि थे या उपन्यासकार।इनके व्यक्तित्व से इन दो तत्वों को अलगाना ठीक वैसा ही है जैसे वायु से नाइट्रोजन और ऑक्सीजन अलगाना।हालाँकि अपने अन्तिम क्षण तक वे स्वयं को कवि ही मानते रहे।

इनके प्रमुख काव्य-संग्रह 'दूसरा सप्तक', 'वनपाखी सुनो', 'बोलने दो चीर को', 'मेरा समर्पित एकांत', 'उत्सवा', 'तुम मेरा मौन हो', 'अरण्या' , 'आख़िर समुद्र से तात्पर्य', 'पिछले दिनों नंगे पैरों', 'देखना एक दिन' और 'चैत्या' हैं।
इन सभी काव्य-संग्रहों में नरेश मेहता की सर्जनात्मक क्षमता शनैः शनैः प्रकति,प्रेम,कविता,विराट प्रेम,साहित्य,भाषा, मानवता एवं लोकपक्षों को समेटते हुए पूरे साहस और ज़िंदादिली के साथ प्रबलतर होती गयी है।इस के साथ ही उत्तर अधुनिकता की तह से निकले सभी 'वाद एवं विमर्श' को रचनाओं की माध्यम से इसके दुष्परिणाम एवं उपयोगिता को भी इंगित किया है।

कहा जाता है कि मनुष्य जब कवि बनने की प्रक्रिया से गुज़रता है और इसी प्रक्रिया के प्रथम पड़ाव में जब वह कविता रचता होता है,तो वह कविता 'प्रेम' की कविता के रूप में उभरती है।संभवतः वह तरुण वयः में उपजने वाला तरल एवं मोहक प्रेम है जिसके आकर्षण से हृदय के कपाट स्वतः ही खुल जाते हैं।
किन्तु नरेश मेहता के प्रथम काव्य-संग्रह(दूसरा सप्तक) में ग्राम एवं उसमें उद्भूत नैसर्गिक प्रकृति का अद्भुत समन्वय है।
ग्रामीण-जीवन के भोर की बेला का यह विहंगम दृश्य द्रष्टव्य है-:
"बरस रहा आलोक- दूध है
खेतों खलिहानों में
जीवन की नव किरण फूटती
मकई औ धानों में" ।

इसी क्रम में कुछ और उद्धरण पर दृष्टिपात हो
"अमराई में दमयंती सी
पीली पूनम काँप रही है
अभी गई-सी गाड़ी के
बैलों की घण्टी बोल रही है" ।

इन दृष्टांतों से यह साफ़ परिलक्षित होता है कि नरेश मेहता का ग्राम और प्रकृति प्रेम,वैयक्तिक प्रेम से आगे था,शुरुआती क्षणों में।

आधुनिक हिंदी कविता में 'नयी कविता एवं प्रयोगवाद' के काल से ही नवीन उपमाओं के प्रयोग का कारवां आगे बढ़ने लगा था। 'कलगी बाजरे की' में अज्ञेय ने पारम्परिक उपमाओं को दरकिनार कर नए उपमाओं को प्रश्रय दिया।

किन्तु, इसके पीछे का कारण क्या था,यह समझना और जानना अत्यावश्यक है।
"दूसरे तार-सप्तक" की भूमिका में 'अज्ञेय' ने कहा है -:

'हम कहते हैं 'ग़ुलाबी' और उससे हमें एक विशेष रंग का बोध होता है।निस्संदेह इसका अभिप्राय है ग़ुलाब के फूल जैसा रंग,यह उपमा उसमें निहित है।पर अब वैसा नहीं है।अब इस अर्थ का चमत्कार मर गया है,अब वह अभिधेय हो गया है।चमत्कार मरता है और चमत्कारिक अर्थ अभिधेय बनता रहता है"।

इसी कारण अज्ञेय, शमशेर बहादुर सिंह और नरेश मेहता उस चमत्कार के श्वास को बचाये रखने हेतु नए-नए उपमाओं का प्रयोग करते रहे हैं।

शमशेर बहादुर की एक कविता है 'उषा'।आधुनिक हिंदी कविता में प्रयोग की दृष्टि से यह कविता काफ़ी चर्चित है।
इस कारण इसकी प्रसिद्धि हिंदी साहित्य में दिग्दिगन्त है।
कविता कुछ इस प्रकार है -:

"प्रातः नभ था बहुत नीला शंख जैसे
भोर का नभ
राख से लीपा हुआ चौका (अभी गीला पड़ा है)
बहुत काली सील ज़रा से लाल केशर से
कि धूल गयी हो
स्लेट पर या लाल खड़िया चाक
मल दी हो किसी ने
नील जल में या किसी की
गौर झिलमिलाहट देह
जैसे हिल रही हो
और.....
जादू टूटता है उस उषा का
अब सूर्योदय हो रहा है"।
बेशक यह कविता रंगों के साथ प्रकृति का अद्भुत एवं रोचक मेल को प्रतिपादित करती है जो गाँव के चौके को नए ढंग से परिभाषित करती है।


क्मशः
 

अगले अंक में जारी.......


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