एमिली डिकेन्सन की पाँच कविताये-  अनूदित सुषमा नैथानी

आज अमरीकी साहित्य के दो पुरख़ों में से एक एमिली डिकेन्सन को माना जाता है, और दूसरा वॉल्ट व्हिटमेन को. अपनी कहन, क्राफ़्ट, और विषयवस्तु में वॉल्ट व्हिटमेन और एमिली डिकेन्सन दो विपरीत ध्रुव है, इन दो ध्रुवों के बीच से आधुनिक अमेरिकी कविता ने विस्तार पाया है. एमिली का स्वर एक
एकांतप्रिय, सम्भ्रांत, विदुषी का है, उन्होंने बड़े महीन-ज़हीन बुनावट की सघन कविताएँ लिखी, गागर में सागर भरने वाली, जो क्राफ़्ट की मास्टरी के लिए भी जानी जाती हैं. एमिली डिकेन्सन ने 56 वर्ष के छोटे से जीवनकाल (1830-1886) में लगभग 1800 कविताएँ रची जो उनकी 40 डायरियों में संकलित
मिलीं. अपने जीवनकाल में उन्हें कवि का दर्ज़ा हासिल न हुआ और न ही उनकी कोई रचना प्रकाशित हुई. उनकी मृत्यु के चार साल बाद 1890 में उनकी रचनाओं का पहला संकलन छपा. एमिली ने अपनी कविताओं को कोई शीर्षक नहीं दिया बल्कि क्रमांक दिए. बाद में सुविधा के चलते प्रकाशकों ने उनकी कविताओं की पहली पंक्ति को शीर्षक की तरह रख लिया.

#214 I taste a liquor never brewed

I taste a liquor never brewed --
From Tankards scooped in Pearl --
Not all the Vats upon the Rhine
Yield such an Alcohol!
Inebriate of Air -- am I --
And Debauchee of Dew --
Reeling -- thro endless summer days --
From inns of Molten Blue --
When "Landlords" turn the drunken Bee
Out of the Foxglove's door --
When Butterflies -- renounce their "drams"
I shall but drink the more!
Till Seraphs swing their snowy Hats --
And Saints -- to windows run --
To see the little Tippler
Leaning against the -- Sun –
***

# 214 मैंने विलक्षण मदिरा चखी

मैंने विलक्षण मदिरा चखी--
सिर्फ मोतीभर, पैमाने से--
राईन नदी के इलाके की मय भी ज्यादा नफ़ीस
बयार के असर में मदहोश--हूँ-- मैं --
और मैंने कुछ अधिक ही शबनम के घूँट भरे हैं--
आसमानी सराय से निकल अनंत तक--
लहर लहर डोलती हूँ -- ग्रीष्म के लम्बे दिनों --

जब फॉक्सग्लोव के फूल मदमत्त भ्रमरों
को धकेल कर अपनी पंखुड़ियाँ समेटने लगे--
जब तितलियाँ -- तृप्त हो अपने पंखों के भार से दब जायें
तब भी मेरा मद्यपान रुकने वाला नहीं!
जब तक फ़रिश्ते बर्फ़ ढकी टोपी से सलाम न बजाने लगे --
और सारे संत -- स्वर्ग की खिड़की पर मज़मा न लगायें --
देखने एक छुटकी पियक्कड़ को
जिसकी पीठ के पीछे है -- सूर्य–

***

#466 I dwell in Possibility

I dwell in Possibility —
A fairer House than Prose —
More numerous of Windows —
Superior — for Doors —
Of Chambers as the Cedars —
Impregnable of eye —
And for an everlasting Roof
The Gambrels of the Sky —
Of Visitors — the fairest —
For Occupation — This —
The spreading wide my narrow Hands
To gather Paradise —


***
#466 मैं सम्भावनाओं में जीती हूँ

मैं सम्भावनाओं में जीती हूँ —
गद्य से ज़्यादा सुंदर है मेरा (पद्य) घर —
कई-कई झरोखों-झिर्रियों का पुर—
आलीशान —दरवाज़े हैं—
जिनके भीतर झाँकना मुश्किल—
देवदार के नफ़ीस दरो-दीवार —
ऊँची मेहराब
फ़रिश्ते उठाए हुए हैं—
मेहमाँ सब—हसीन —
यही (शायरी) है— मेरा रोज़गार —
पूरी तरह पसरी हुई हैं मेरी अँजुरी—
इस स्वर्ग को समेटने—

***

#556 The Brain, within its Groove

The Brain, within its Groove
Runs evenly — and true —
But let a Splinter swerve —
Twere easier for You —

To put a Current back —
When Floods have slit the Hills —
And scooped a Turnpike for Themselves —
And trodden out the Mills —
***

#556 यह मस्तिष्क, अपने खाँचे के भीतर


यह मस्तिष्क, अपने खाँचे के भीतर
समतल — और शुद्ध (बना रहता है)
लेकिन एक ज़रा सी खरोंच —
तुम्हारे लिए रस्ता खोल देती है —

असंभव है रोकना उस वेगवती को—
जिसकी बाढ़ ने पहाड़ के सीने को चीर—
सब अवरोध तोड़ —
दोनों किनारों पर खड़ी मिलों को
मटियामेट कर दिया हो

***

#640 I cannot live with You

I cannot live with You –
It would be Life –
And Life is over there –
Behind the Shelf
The Sexton keeps the Key to –
Putting up
Our Life – His Porcelain –
Like a Cup –
Discarded of the Housewife –
Quaint – or Broke –
A newer Sevres pleases –
Old Ones crack –

I could not die – with You –
For one must wait
To shut the Other’s Gaze down –
You – could not –
And I – could I stand by
And see You – freeze –
Without my Right of Frost –
Death’s privilege?

Nor could I rise – with You –
Because Your Face
Would put out Jesus’ –
That New Grace
Glow plain – and foreign
On my homesick Eye –
Except that You than He
Shone closer by –


They’d judge Us – How –
For You – served Heaven – You know,
Or sought to –
I could not –

Because You saturated Sight –
And I had no more Eyes
For sordid excellence
As Paradise

And were You lost, I would be –
Though My Name
Rang loudest
On the Heavenly fame –
And were You – saved –
And I – condemned to be
Where You were not –
That self – were Hell to Me –


So We must meet apart –
You there – I – here –
With just the Door ajar
That Oceans are – and Prayer –
And that White Sustenance –
Despair –
****

#640 मैं तुम्हारे साथ बसर नहीं कर सकती

मैं तुम्हारे साथ बसर नहीं कर सकती –
यूँ यह जीवन होगा –
लेकिन होगा –
उस अलमारी के पीछे
जहाँ चर्च का चपरासी संजोता है –
हमारा जीवन – और अपने बर्तन –
(उन) प्यालों की तरह –
जिन्हें गृह स्वामिनी फेंक देती है –
पुराने – या टूटे-फूटे –
(संजोग से) हाथ आती है नये की ख़ुशी –
और टूटे की टूटन –

मैं मर नहीं सकती – तुम्हारे साथ –
उसके लिए एक को प्रतीक्षा करनी होगी
दूसरे की आँख मूँद जाने तक –
तुम – कर नहीं सकोगे–
और मैं – क्या मैं कर सकूँगी
कि तुम्हें तुम्हें निर्जीव होते देखूँ
अपनी मौत तलब किये बग़ैर –
मौत के आगे सर नवा लूँ?

मैं नहीं खड़ी हो सकती मैं – तुम्हारे साथ –
क्यूँकि तुम्हारा मुख
ईसा को ढक लेगा –
वह नई सूरत
दुःख दर्द में डूबी – व अजनबी
मेरी आखों को न भायेगी –
सिवा इसके कि उससे ज़्यादा तुम
मेरे क़रीब चमक जाओगे–
(ईसा दूर हो जायेगा)

उन्होंने हमारे बारे में फ़ैसला किया – कैसे –
तुम्हारे लिए – स्वर्ग – तुम जानते हो
या चाहा –
मैं नहीं चाह सकी –

क्यूँकि तुमने मेरी नज़र को ढक दिया –
मेरे पास दृष्टि न बची
आलौकिकता के लिए
स्वर्ग के लिए

और क्या तुम खो गए थे, मैं भी खो जाती –
भले ही मेरा नाम का स्वर्ग में नगाड़ा बज रहा हो –
और क्या तुम्हें –बच लिया गया –
और मैं –शर्मसार हुई
जहाँ तुम नहीं थे –
वह वजूद – मेरे लिए नारकीय था–

इसलिये हमें दूर-दूर से ही मिलना होगा
तुम वहाँ – मैं यहाँ –
बस बीच में ज़रा सा खुला दरवाज़ा
कई समंदर – और प्रार्थना –
और वह उजली धुन्ध–
और निपट निराशा–
***


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