अशरफ अबोल याजिद (ASHRAF ABOUL-YAZID) की कविता


उदासी

उदासी, वह स्त्री है,जिसने मुझसे मुहब्बत की
भोर के जगने तक , मेरे इर्दगिर्द नाचती है

और मेरी जिन्दगी के सूरज के डूबने तक
मुझे मोहित करती है...
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सांझ

फटे मुखौटो के ढ़ेर के बीच
बिन वापरे
चेहरों को खोजते हुए
अपने मिलने को रहस्य को रखते हुए
एक तरह की उदासी मेरे
दिल से लिपट जाती है
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अनुवाद रति सक्सेना
Translated by Rati Saxena


(अशरफ अबोल याजिद की अन्य कविताएं)


निर्मल गुप्त की कविता

 

माँ को याद करते हुए


उस रात जब अँधेरा बहुत घना था

मौसम ज़रा गुनगुना

माँ ने अपने सर्द हाथों में थाम

मेरे हाथ को कहा

अरे तू तो तप रहा है भट्टी सा

उसके यह लफ्ज़ मेरे कान तक पहुंचे

और बिखर गये आँखों से

पिघलते आइसक्यूब के पानी की तरह



उस रात पहली बार उसने कहा

सरका दे खिडकियों पर लगे मोटे परदे

मैं देखना चाहती हूँ

बगीचे में खिले वासंती फूलों की आभा

आसमान में तिरते खूबसूरत पंछी

और परस्पर उड़ान की होड़ में लगी

बहुरंगी पतंगों का तिलिस्म.



उस रात उसके कहते ही

खिडकियों के पट चौपट खुल गये

रोशनदान के लाल पीले नीले कांच से छनकर

फुदकने लगा धूप का सुनहला छौना

उसकी चारपाई पर बिछी चादर की सिलवटों पर

पूरा कमरा भर गया मौसमी फूलों की सुवास से.


उस रात उसने कहा

जा जल्द ले आ थोड़े से लौकाट मेरे लिए

बड़ी भूख लगी है मुझे

तेरे पिता होते तो ले आते

लाहौर वाले क़ादिर के बाग़ से

रुमाल में बाँध रस से चुहचुहाते फल.


उस रात माँ देखती रही सघन अँधेरे में

रोशन उम्मीदों के सपने खुली आँखों

बाट जोहती मेरे पिता की

प्रेमपगे उलहानों के साथ

पूछती रही मुझसे निरंतर

क्या रेडियो पर आनी बंद हुई युद्ध की खबरें

क्या आज भी डाकिया नहीं लाया

उनकी कोई खोज खबर.


उस रात वह अचानक चली गयी

मेरे हाथों में सौंप

अपनी यादों और इंतजार की अकूत विरासत

अँधेरे और रोशनी के आरपार

मैं उसके ठंडे हाथों को

अपनी रूह में सम्भाले रोज पूछता हूँ.

क़ादिर के बाग़ का पता.

 

(निर्मल गुप्त की अन्य कविताएं)




शिखर गोयल की कविता


विस्थापितों के नाम एक ख़त
तुम गुस्से में होगे बहुत,
बहुत नाराज़ भी हमसे.
घना होगा बहुत तुम्हारे
दुख का जंगल भी,
कैसे उठी होंगी उसमें दर्द की टीसें
जब हमारे बुलडोज़र घुसे.
इस बात को शायद ही
हम कभी समझ सकें.

तुम्हारे सबसे डरावने सपने
हमारे सबसे हसीन ख़्वाब थे.
हमारे वक़्त के घर में,
तुम वो अँधेरी कोठरी थे,
जहाँ धूप नहीं जाती.
जहाँ रहती है वो सारी चीजें,
जिन्हें हम भूल जाना चाहते है.
जहाँ छोड़ा जाता है ज़हर,
चूहों और काक्रोचों को मारने के लिए.
तुम हमारे लिए इससे ज़्यादा,
कुछ नहीं थे, कभी भी.
इस बात की बर्बरता का एहसास हमें,
तुम्हारे जाने के बाद हो कभी, शायद.
पर आज नहीं है.

आज, हम तुम्हे नहीं समझ सकते,
तुम्हारे खेतों की ज़रखेज़ ज़मीन हमें चाहिए,
हमारी ऊंची इमारतों की फसलों के लिए.
तुम्हारी नदी का पानी हमारे कारखानों की ज़रुरत है
तुम, तुम्हारे घर, पहाड़ और जंगल सब लगेगा
हमारे ख़्वाबों की तामीर में.
आज हम, तुम्हे नहीं समझ सकते
आशा है, तुम हमें समझोगे.


 


शेन हाइबो (Shen Haobo)  की कविता


टोक्यो

टोक्यो में उतने
कौए है
जितनी कि कब्रे हैं
लेकिन कौए भाग्यवान हैं
हालांकि तुलना नहीं हो सकती
फिर भी बहुत से कौए और
स्त्रियों के नंगे पांवों में, राह में
चेरी के पेड़ फल रहे हैं, चेरियां गिर रही हैं
पीली पंखुड़ियों पर
गोरी टांगें और काले जूते हैं।
 

अनुवाद रति सक्सेना
Translated by Rati Saxena


(शेन हाइबो की अन्य कविताएं)
 


Gerry Loose की कविताएं (स्काटलैण्ड )


यह फूल है
मैं इसे तोड़ नहीं पाया

मैने टहनी के लिए छोड़ दिया
मैंने उस मधुमक्खी के लिए छोड़ दिया

और अब
यह तुम्हारे लिए है

‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‌‌‌‌.....................................
दीवारें

वे दीवारें अकसर लोहे और ईंटों से बनी नहीं होती हैं
वे दीवारें बम और ज्वालामुखि गुह्वर से भी बनी होती हैं

सारी दीवारे गिर गईं
सारे बम गह्वर भर गए

पहली दीवार चीन की दीवार
हैड्रियन दीवार है, उत्तरी इंगलैण्ड में
अन्टोनिने दीवार, स्काटलैण्ड में
बर्लिन वाल
फिलिस्तान को काटती दीवार,
और ट्रम्प की दीवार, जो अभी बननी हैं


अनुवाद रति सक्सेना
Translated by Rati Saxena


(
Gerry Loose की अन्य कविताएं)


ओनार सकरिया /Onur Sakarya तुर्क के युवा कवि


सीमेन्टी नाखुशी (Concrete Unhappiness)


शुक्रिया मेरे प्रेम
हम लम्बी जुदाई के खूनचूते किनारे पर थे
सिगरेट का धुँआ, खराब वेल जार में माइक्रोफोन की चीख
हम नेपकिन पर लिखे गीत थे. कितनी जल्दी गायब हो गए
या खुदा, कि मेरा अपना कोई कमरा ही नहीं था
जैसा कि अब है कामगारों से , तौलियों और उस्तरों से घिरा
हम हरदम आबाद रेडियों पर चौखाने वाला कवर थे
हिमपात के दिन वाले सूरज वाली सुबह कान्क्रीट पर है
पैर का हर हिस्सा बदबू मार रहा है, अह पीड़ा दे रहा है
हमें जान लेना चाहिये कि हम बस दो शराबी कुबड़े हैं

शुक्रिया प्रेम

तुम्हारी तस्वीर हमेशा ही मेरे सीने की सिली हुई जगह पर है
हम घर से दूर तक बजता रिकार्ड प्ले थे
हम जो बक्सानुमा कमरा थे, कोयले की अंगीठी थे, विस्थापन का मौन थे
हमें गरीबी के सामने ससम्मान खड़े होना चाहिए था

शुक्रिया प्रेम

मैं इतना थक गया हूँ कि जैसे ठण्ड अनन्त पहाड़ों में चक्कर लगाती है
अकेलापन रिश्तेदार है एक इमारत से चीखती आवाज का
मैं खत्म हो चला हूँ, जैसे कि वक्त द्वारा बनाई गई  तस्वीर में .नमी  जैसे
हम जड़ है, हम जम चुके हैं, गोंद की तरह शोक हमारे दिलों से चिपक गया है

दुर्भाग्यवश मेरे प्रेम
हमने उस सीमेन्ट पर भरोसा किया जो नाखुशी को पकड़ती है



अनुवाद रति सक्सेना
Translated by Rati Saxena


(ओनार सकरिया की अन्य कविताएं)

 


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