निर्मल गुप्त  की कविता

 

 उसे पता है .....


आख़िरकार उसे मिल गया
ईंटों के चट्टे के बगल में
एक ठंडी छाया का रहमदिल टुकड़ा
अब वह इत्मीनान से बैठ
कपड़े में बंधी रोटियां निकलेगी
खोलेगी भूख का जादुई बक्सा..

वह अरसे से भूखी है
मगन होकर हर कौर को चबायेगी
साथ ही साथ डालती जायेगी
रोटी के सख्त किनारे
कौओं की ओर .
उसे अच्छी तरह मालूम है
कि खाली पेट किस कदर दुखता है.

रोटी खाने के बाद
वह जायेगी हैंडपम्प के पास
ठंडे पानी की तलाश में
अंजुरी भर भर पानी पिएगी
और लौटेगी वहां से दोनों हथेलियों में
बड़े जतन से पानी लिए

वह डाल देगी उसे
ईंटों के चट्टे के पास लगे
तेज धूप से मुरझाये
पौधे की जड़ में .
और फिर पोंछेगी पत्तियों को
अपने गीले हाथों से हौले हौले.

पेट भर जाने के बाद भी
उसे याद है सभी की भूख प्यास
भरपेट अघाये हुए लोगों की तरह उसे
किसी को भूल जाना नहीं आता .
.....................


कुछ नहीं पता



मसखरा हंसता है धीरे धीरे

बड़ी एहतियात के साथ

उसे पता है ठहाका लगाने पर

बहुत देर तक दुखेगा

कमर से चिपका पेट

और जर्जर पसलियां।



बब्बर शेर दिखाता है करतब

पूरी मुस्तैदी के साथ

रिंग मास्टर के हंटर की

फटकार का इंतज़ार किये बिना

दोनों को अच्छे से मालूम है

अपने-अपने किरदार।



तोते के खेल दिखाती लड़की की

शफ्फाक जांघें कंपकपाती ठंड से

वह कम्बल में दुबक कर

चुस्की ले-ले पीना चाहती है

गर्म भाप से अंटी चाय

और दिनभर की थकन ।



पतली रस्सी पर थिरकते

नर और मादा की शिराओं में

चरमोत्कर्ष पर है उत्तेजना

वे एक दूसरे की ओर देखते

गा रहे हैं मगन होकर

प्यार का कोई आदिम गीत।



सरकस के पंडाल से

रिस रहे हैं तमाशबीन

सधे हुए घोड़े ऊँघ रहे हैं

अपनी बारी का इंतज़ार करते

किसी को नहीं पता

कल सुबह कैसी होगी।




आक की हरी पत्ती



वह अपने दुखते हुए घुटने पर

हल्दी मिले गर्म तेल का फाहा रखती है

फिर आहिस्ता से आक* के हरे नरम पत्ते को

इस तरह से उस पर टिकाती है

जैसे स्वप्निल यात्रा पर निकलने से पहले

प्रार्थना के लिए उपयुक्त शब्दावली ढूंढती हो.



वह सघन अँधेरे में छिपी

रोशनी की परतों के बीच

यादों की सीढियों पर तेज कदमों से चढ़ती है

छत की मुडेर पर दोनों बाँहों को फैला

अपने पंखों की ताकत परखती

खुले आसमान में उड़ जाना चाहती है.



वह घनीभूत दर्द में से चुनती है

यहाँ वहां बिखरे नींद के सफेद फूल

सुकून के तकिये पर सिर रख

इस तरह शरमा जाती है

जैसे कोई प्यार के प्रगाढ़ पलों में

किसी के सीने में खुद को छुपा ले.



तेल से भीगे फाहे से दर्द हर रात

धीरे धीरे बेआवाज़ रिसता है

देह निस्तब्ध अरण्य में भटकती है

समय की नदी में वह चप्पू चलाती

रोज बटोर लाती है आक की ताज़ा पत्तियां.




यात्रा में .....



रेलगाड़ी धडधडाती हुई लगातार दौड़ रही है

वह एक ही जगह सदियों से खड़ा है

उसे सांझ ढले घर पहुँचने की कोई जल्दी नहीं

न उसे यह बात ठीक से पता कि

रेलगाड़ी वाकई कहीं जा भी रही है

गति यात्रा का पुख्ता सुबूत नहीं होती.



रेलगाड़ी धडधडाती हुई लगातार दौड़ रही है

बगल वाली पटरी पर एक और रेलगाड़ी

उसके बगल वाली पर भी शायद एक

जितनी पटरियां उतनी रेलगाडियां

होड़ से बाहर खड़ा तमाशबीन

बड़ी एहतियात के साथ मुस्कुराता है.



रेलगाड़ी धडधडाती हुई लगातार दौड़ रही है

रेलवे फाटक पर तैनात गेटमैन

ईंट जोड़ कर बनाये चूल्हे पर

जल्दी जल्दी सेंक रहा है रोटियां

पटरी किनारे के फाटक पर

भूख और रेलगाड़ी कभी भी आ धमकती है .



रेलगाड़ी धडधडाती हुई लगातार दौड़ रही है

प्लेटफार्म पर अजब हलचल है

पर नहीं है सफर खत्म होने का कोई चिन्ह

पूछताछ खिड़कियों पर बिना कुछ जाने बूझे

लोग कर रहे हैं अपने से गुपचुप बातें

बातें और यात्राएँ कभी नहीं थमती है.



रेलगाड़ी धडधडाती हुई लगातार दौड़ रही है

खिड़की के पार गांव घर याद धुआं

सब भाग रहे हैं विपरीत दिशा में

वह देख रहा है कनखियों से

जलती बुझती रोशनियों का खेल

हर यात्रा का अपना तिलस्म होता है.

 


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