सुप्रतिष्ठित मराठी कवि रवीन्द्र दामोदर लाखे की कविताओं का अनुवाद
• अनुवाद- प्रेरणा उबाळे

१. “जीवन”

प्राण सूख गए हैं
दर्द सूना हो गया है
दिन बीतते समय
रंग लेकर
हवा बहुत भारी हो गई है
पगडंडियां एक-दूसरे से टकराकर चूर
और गहरी आग की गंध
जो मेरी नहीं है
मेरा तो सिर्फ
शेष बचा धुँआ है

जिसकी अयाल झड चुकी है
ऐसा कोई घोड़ा
अपना ही खुर ढूँढते हुए,
फटे आकाश का दृश्य
चौखट को उखाड़ते हुए,
निष्प्राण की सीमा पर
उदित होनेवाला सूर्य है
क्षितिज का एक सत्य;
कम से कम बिजली की
लगाम तो चाहिए,
सांप की तरह
साँस को हवा में छोड़ते हुए !
और
भीतर उथल-पुथल मचा देनेवाला तूफान !

समझ गया हूँ,
जीवन परास्त नहीं होगा
प्रश्नों की तरह खड़ा रहेगा
समय को पीछे छोड़.... शान से !
मै उसके पैरों के पास
पत्तों की तरह
उत्तरों से अनजान....
आ जाएगा वह
वसंत ऋतु अकेले ही ......

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२. “भाषा और चीख”

जलनेवाले शब्दों के प्रकाश में
बूँद-बूँद गिरती
तुम्हारी दुखी रात
भाषा ही रचती है लकड़ियाँ –
इस अर्थ की सीमा पर स्थित
मरघट में अकेली

तुम भी उसपर रचाई गई अकेली

कल किस हल से जोताई करूँ
इस जमीन की राख में ?

जलकर ख़ाक
हर शब्द के चरित्र
तुम और मैं नहीं भूलेंगे
या उन शब्दों की राख के अर्थ
शरीर पर लगाकर नहीं जिऊंगा l

शेष जो रह जाती है
वह भाषा कौन सी होती है ?

जो मुझे चाहिए
संभवत: तुम्हें भी !

बार-बार बताता हूँ....

कल बरसात होनी होगी,
नई अनजान घटनाओं से !

पता नहीं,
पुराना शब्द मिटाया हुआ
दिख जाएगा ......
अर्थ की ताज़ी धूप से!

या फिर
केवल शीतल क्षणों के आलिंगन
मरणप्राय अर्थहीनता को समझानेवाले

इसलिए
भाषा की शुद्धता पर
ध्यान मत दो
क्योंकि
शास्त्रों में मंजूर नहीं सभी चीखें !
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• अनुवादक परिचय-
डॉ. प्रेरणा उबाले – सहायक प्राध्यापक, हिंदी विभागाध्यक्षा
मॉडर्न कला, विज्ञान और वाणिज्य महाविद्यालय (Autonomous)
शिवाजीनगर, पुणे- 411005
संपर्क नंबर - 7028525378
मेल आई डी.– prerana.ubale@yahoo.com


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