मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 (ISSN 0976-5158)   


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बात कविता की करनी है, शायद इसलिए कि कल ही मैंने "लैला " नामक सीरीज का पहला अंक देखा , जिसमें पानी के लिए लड़ाई हो रही है,,, या फिर इसलिए कि मुम्बई में बाढ़ की खबर सुनी, या फिर उस चैन्नई, जो कुछ साल पहले पूरी तरह डूब गई थी, उसके पानी के नाम पर त्राहि माम की खबर आ रही है। लैला फिल्म दिखाती है, पानी के लिए कत्ले आम मचेगा, आसमान से कीचड़ गिरेगा, रहीम याद दिलाते रहे हैं, बिन पानी सब सून......

कवि कहते हैं, रहिमन पानी राखिये,,,,, पानी ही क्यों सब कुछ तो रखना है ना, दरख्त, पौधे, जलाशय, समन्दर हवा,, सब कुछ ना?

सोचती हूँ , कविता क्या करेगी?
जवाब मिलता है, कविता वही करेगी , जो उसे करना चाहिए, यानि कि जिन्दगी में प्रकृति का पुनर्स्थापन,,,,, वही प्रकृति, जिसकों छायावाद कह कर नकार दिया गया था,.... जिसे रोमान्टिज्म का कीड़ा मान लिया गया था। लेकिन इस बार कविता को प्रकृति को मात्र निहारना नहीं है, बल्कि उसको आत्मसात् करना है, जिन्दगी से जोड़ना है,

चीन में मुझे एक चित्रकार मिले, जो चीनी कला की बारीकियां बताते हुए बोले, हम प्रकृति से सीखते हैं, लेकिन नकल करके के नहीं,,, बल्कि हमारी परम्परा में हम प्रकृति के पास जाते है, बिना कलम या ब्रश लेकर,
रति सक्सेना
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पृथ्वी पर लेटना
पृथ्वी को भेंटना भी है

ठीक वैसे जैसे
थकी हुई हो देह
पीड़ा से पस्त हो रीढ़ की हड्डी
सुअस्ताने की राहत में
गैंती-बेलचे के आसपास ही कहीं
उन्हीं की तरह
निढाल लेट जाना
धरती पर पीठ के बल

आत्मा रंजन
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इतिहास नहीं होता है पक्षधर
किसी भी व्यक्ति का
इतिहास को होती हैं भूख
घटनाओं की
नहीं बुझती है तृष्णा किसी भी मरीचिका से, इतिहास की
नेहा भांडारकर
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एक छोटा - सा
झरोखा उम्मीदों का
दिल में हमेशा खुला रखिए..
आती-जाती रोशनी में
किरणों और हवाओं को
संदों तले दबे पांव भीतर आने की
सभी रुकावटों से परे रखिए ..
लाख परेशानियां तुम्हे आहत करें,
पर जीवन ,
प्रगति गुप्ता 
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कोई न कोई देह ज़रूर होती हैं
जिनसे बावस्ता होती हैं वे चीज़ें
जो विदेह जान पड़ती हैं

जैसे आकाश
पृथ्वी और उसके परिवार वालों का
आँगन है मैदान है परिधान है
जैसे हिमालय और आल्प्स किरणों की पगड़ियों के शीश हैं
डॉ विनय

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अब नरेश मेहता की 'किरन धेनुएँ' की काव्य-पंक्तियों पर गौर करें -:

"उदयाचल से किरन-धेनुएँ
हाँक ला रहा वह प्रभात का ग्वाला
पूँछ उठाए चली आ रही
क्षितिज जंगलों से टोली
दिखा रहे पथ इस भूमा का
सारस सुना-सुना बोली
गिरता जाता फेन मुखों से
नभ में बादल बन तिरता
किरन-धेनुओं का समूह यह
आया अंधकार चरता।"

इन दोनों कविता के बिम्ब का आकलन किया जाए तो
दोनों गाँव की सुबह के दृश्य को प्रस्तावित करता है।
पहली कविता में ऐंद्रिक रंगों का महत्व है तो दूसरी में
नैसर्गिक प्रकृति का।
किन्तु बिम्ब के सहज महत्व को शमशेर ने रुक्ष कर दिया है।
नीले नभ को शंख से तुलना कर बिम्ब असहज सा
प्रतीत होता है।चमत्कार का प्रयोग अत्युक्ति की सीमा तक जा पहुँचा है।
आसमान ,शंख जैसा???

वहीं 'किरन-धेनुएँ' कविता में ग्राम के
प्राकृतिक दृश्यों में बराबर समानता
एवं नैसर्गिकता विद्यमान है।
बिम्ब एवं उपमाओं में कार्य-कारण
का भी सहज समन्वय हो रहा है।

इससे इतर अलग कलेवर की प्रगतिशीलता
और तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्य को
उकेरती उनकी इस 'अंततः'
कविता पर दृष्टिपात किया जाए -:

"वे तब भीड़ में भी हुआ करते थे -

मयंक (Mayank)

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जीवन”

प्राण सूख गए हैं
दर्द सूना हो गया है
दिन बीतते समय
रंग लेकर
हवा बहुत भारी हो गई है
पगडंडियां एक-दूसरे से टकराकर चूर
और गहरी आग की गंध
जो मेरी नहीं है
मेरा तो सिर्फ
शेष बचा धुँआ है

जिसकी अयाल झड चुकी है
ऐसा कोई घोड़ा
अपना ही खुर ढूँढते हुए,
फटे आकाश का दृश्य
चौखट को उखाड़ते हुए,
निष्प्राण की सीमा पर
उदित होनेवाला सूर्य है
क्षितिज का एक सत्य;
कम से कम बिजली की
लगाम तो चाहिए,
सांप की तरह
साँस को हवा में छोड़ते हुए !
और
भीतर उथल-पुथल मचा देनेवाला तूफान

समझ गया हूँ,
जीवन परास्त नहीं होगा
प्रश्नों की तरह खड़ा रहेगा
समय को पीछे छोड़.... शान से !
मै उसके पैरों के पास
पत्तों की तरह
उत्तरों से अनजान....
आ जाएगा वह
वसंत ऋतु अकेले ही ......
जलनेवाले शब्दों के प्रकाश में
बूँद-बूँद गिरती
तुम्हारी दुखी रात
भाषा ही रचती है लकड़ियाँ –
इस अर्थ की सीमा पर स्थित
मरघट में अकेली

तुम भी उसपर रचाई गई अकेली
कल किस हल से जोताई करूँ
इस जमीन की राख में ?
जलकर ख़ाक
हर शब्द के चरित्र
तुम और मैं नहीं भूलेंगे
या उन शब्दों की राख के अर्थ
शरीर पर लगाकर नहीं जिऊंगा l

वीन्द्र दामोदर लाखे
अनुवाद- प्रेरणा उबाळे

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*सरकारी झील*
खिलौनों की दुकान का रास्ता सड़क पर गिरे पेड़ से अवरुद्ध था।
एक पुलिसकर्मी उस सड़क का यातायात निर्देशन कर रहा था।

मैंने उससे पूछा, "क्या हुआ?"
उसने कहा, "रात में बिजली गिरी।"
मैं वापस मुडा और दुसरा रास्ता ढूंढते हुए दुसरी सड़क पकडी।
अन्य सड़कों को भी रास्ते पर गिरे हुए पेड़ों की वजहसे रोक दिया गया था,
और मैं खिलौनों की दुकान पर वापस जाने का रास्ता नहीं खोज सका।
मैं गाड़ी चलाता रहा और जल्द ही मैं शहर के बाहरी इलाके में था।
मैं एक राजमार्ग पर चला गया और जल्द ही खिलौने की दुकान को भूल गया जहां मुझे पहुंचना था।

मैंने ऐसा किया मानो मुझे सम्मोहित कर दिया गया हो।मोडपर दिये गये
पथ निर्देशन संकेत भी मैं नहीं देख पाया।
जागृतावस्था से पहले कुछ घंटों तक मैने परिचालन किया होगा,
फिर मैंने अगला निकास लिया अब मुझे पता नहीं था कि मैं कहाँ हूं।
एक ओर पंक्तिबद्ध पेडोंकी शृंखला
और दुसरी ओर फार्म हाऊसेस...
बीच की गल्ली से सिधा निकलतेही
रास्ते के अंत में एक झील दिखाई दी।
कार पार्क करके मैं
बाहर निकला और चलने लगा।
किनारे पर अनेक बंदरगाह थे।
मैं एक पर चलने लगा।
मूल अंग्रेजी कविता...जेम्स टेट
हिंदी अनुवाद...नेहा भंडारकर
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VOL -XIV/ ISSUE-IV

जुलाई - अगस्त 2019

प्रमुख संपादकः
रति सक्सेना


 

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