बात कविता की करनी है, शायद इसलिए कि कल ही मैंने "लैला " नामक सीरीज का पहला अंक देखा , जिसमें पानी के लिए लड़ाई हो रही है,,, या फिर इसलिए कि मुम्बई में बाढ़ की खबर सुनी, या फिर उस चैन्नई, जो कुछ साल पहले पूरी तरह डूब गई थी, उसके पानी के नाम पर त्राहि माम की खबर आ रही है। लैला फिल्म दिखाती है, पानी के लिए कत्ले आम मचेगा, आसमान से कीचड़ गिरेगा, रहीम याद दिलाते रहे हैं, बिन पानी सब सून......

कवि कहते हैं, रहिमन पानी राखिये,,,,, पानी ही क्यों सब कुछ तो रखना है ना, दरख्त, पौधे, जलाशय, समन्दर हवा,, सब कुछ ना?

सोचती हूँ , कविता क्या करेगी?

जवाब मिलता है, कविता वही करेगी , जो उसे करना चाहिए, यानि कि जिन्दगी में प्रकृति का पुनर्स्थापन,,,,, वही प्रकृति, जिसकों छायावाद कह कर नकार दिया गया था,.... जिसे रोमान्टिज्म का कीड़ा मान लिया गया था। लेकिन इस बार कविता को प्रकृति को मात्र निहारना नहीं है, बल्कि उसको आत्मसात् करना है, जिन्दगी से जोड़ना है,

चीन में मुझे एक चित्रकार मिले, जो चीनी कला की बारीकियां बताते हुए बोले, हम प्रकृति से सीखते हैं, लेकिन नकल करके के नहीं,,, बल्कि हमारी परम्परा में हम प्रकृति के पास जाते है, बिना कलम या ब्रश लेकर, बस उसके बीच रह कर उसे निहारते हैं, उसे अनुभव करते हैं, रोम रोम में समाते हैं, फिर घर में आकर सो जाते हैं, कुछ दिनों के बाद जब केनवास पर कूंची चलती है, तो वह प्रकृति स्वयं होती है, उसकी नकल नहीं।

हम कला के नाम पर नकल करते हैं, कविता के नाम पर दुखों को तलाशते हैं, जैसे ही कोई दुख हाथ लगता है, हम बाज की तरह झपट पड़ते हैं,

पूरे सोशल मीडिया को कविता से भर देते हैं, क्या हम उसकों आत्मसात् करते हैं? नहीं, क्यों आत्मसात् करते ही वह अन्य दुखों से जुड़ जायेगा, और वह हम चाहते नहीं हैं, हम बस अपने को रेखांकित करने में विश्वास करते , वही हमारी कविता से जुड़ा रहता है।

जब हम कविता के अणु मे ब्रहाम्ण्ड भरने की कला सीख जायेंगे, वही कविता की विजय होगी.

इस अंक की कलाकार अनुप्रिया हैं, जिनकी रेखाकृति में कविता की महीन कल छिपी है

शुभकामनाएं सहित

रति सक्सेना




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