नरेश मेहता : आधुनिक हिंदी साहित्य का गुमनाम कवि--मंयक मिश्रा
 

क्रमशः के आगेके आगे


अब नरेश मेहता की 'किरन धेनुएँ' की काव्य-पंक्तियों पर गौर करें -:

"उदयाचल से किरन-धेनुएँ
हाँक ला रहा वह प्रभात का ग्वाला
पूँछ उठाए चली आ रही
क्षितिज जंगलों से टोली
दिखा रहे पथ इस भूमा का
सारस सुना-सुना बोली
गिरता जाता फेन मुखों से
नभ में बादल बन तिरता
किरन-धेनुओं का समूह यह
आया अंधकार चरता।"

इन दोनों कविता के बिम्ब का आकलन किया जाए तो दोनों गाँव की सुबह के दृश्य को प्रस्तावित करता है।पहली कविता में ऐंद्रिक रंगों का महत्व है तो दूसरी में नैसर्गिक प्रकृति का।
किन्तु बिम्ब के सहज महत्व को शमशेर ने रुक्ष कर दिया है। नीले नभ को शंख से तुलना कर बिम्ब असहज सा प्रतीत होता है।चमत्कार का प्रयोग अत्युक्ति की सीमा तक जा पहुँचा है।
आसमान ,शंख जैसा???
वहीं 'किरन-धेनुएँ' कविता में ग्राम के प्राकृतिक दृश्यों में बराबर समानता एवं नैसर्गिकता विद्यमान है।बिम्ब एवं उपमाओं में कार्य-कारण का भी सहज समन्वय हो रहा है।

इससे इतर अलग कलेवर की प्रगतिशीलता और तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्य को उकेरती उनकी इस 'अंततः' कविता पर दृष्टिपात किया जाए -:

"वे तब भीड़ में भी हुआ करते थे -
शेरवानी और पायजामे में
फिर वे होते गए
मंच की सीढ़ियों पर तेज़-तेज़ चढ़ती
साड़ी में से उझकी हुई
राजसी एड़ियाँ
और फिर -
गोलियों से रक्षित शीशे वाले मंच पर पहुँचकर
मीलों दूर बैठाई गयी जनता के लिए
बुलेट प्रूफ़ जैकेट में
अंततः राष्ट्र को समर्पित
एक राजकीय नमस्कार हो गए"
आज की परिस्थिति को यथावत बयां करती है यह कविता।जनता के छद्म प्रतिनिधि(राजनेता) शेरवानी और पायजामे में जनता के बीच शामिल होते हैं।किंतु जनता को उस के कीमती पोशाक पर नज़र नहीं जाती।उस पोशाक को गौण कर लोग उसके मुखोद्धृत वचनों को सुनने में व्यस्त हैं।आज हमारा नेता कुछ इसी तरह जनता के बीच पैठ बना चुका है।लाखों का सूट पहनकर जनता के पैसों से राजसी वैभव का आनंद उठा रहा है और लोगों के बीच बेरोजगारी के प्रसाद बाँटता फिर रहा है।
आज के संदर्भ में यह कविता अत्यंत प्रासंगिक हो उठी है।इस कविता का महत्व आज के सन्दर्भ में अमिताशेष है।

अब आते हैं कुछ ऐसी कविताओं पर जिनका हिंदी जगत में अन्यतम नाम है। इस श्रेणी में केदारनाथ सिंह की 'हाथ' कविता अग्रगण्य है। एक वाक्य में कहा जाए तो 'हाथ' को प्रतीक बनाकर लिखने वाले कविताओं में केदारनाथ सिंह अप्रतिम ठहरते हैं।

पेश है केदारनाथ सिंह की 'हाथ' कविता -:
"उसका हाथ
अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा
दुनिया को
हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए"

मानवता एवं प्रेम की अक्षुण्णता को नए सिरे से परिभाषित करती यह कविता प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में अवस्थित है।दुनिया को संवेदना,मानवीयता,प्रेम,भावनात्मकता ही जोड़े रख सकती है,इसका आधार एक हाथ का कोमल स्पर्श है।जिससे कवि को यह भान होता है कि एक स्पर्श से जीवन कितना आनंदमय और सुखमय हो सकता है।
कल्पना और प्रेम का अनूठा संगम है यह कविता जहाँ इंसानियत उत्तुंग शिखर पर अवस्थित है।

किन्तु आज की सच्चाई से रूबरू कराती नरेश मेहता की 'सिर्फ़ हाथ' कविता की बारीकियों पर नज़र डाली जाए -:

"इधर वह
कई दिनों से मनुष्य नहीं था
तभी तो-
जब भी मिला
जहाँ भी मिला
असुविधा के साथ ही कुछ-कुछ मिला
कुछ-कुछ नहीं मिला
जब भी दिखा,जहां भी दिखा
गर्म जेब को छुपाते,आँखें चुराते
कुछ-कुछ दिखा कुछ-कुछ नहीं दिखा
आख़िरकार एक दिन पूछ ही बैठा,
-क्यों भाई,कितने दिनों से मनुष्य नहीं बन सके हो
प्रश्न सुन थोड़ा हतप्रभ अवश्य हुआ
पर तत्काल अपना सफारी ठीक करते हुए
जीवन की मेरी मध्यकालीन समझ पर
तरस खाते हुए ठहाका लगा, बोला
-क्या इन भेड़ियों के झुण्ड के लिए
मैं ही मेमना हूँ?
ज़नाब! घर से बाहर मैं मनुष्य नहीं
सिर्फ़ हाथ हूँ, हाथ !

इन पंक्तियों से दो महत्वपूर्ण किन्तु यथार्थपरक सत्य प्राप्त होते हैं।पहला यह कि प्रेम,भाईचारा,दया,करुणा,परस्पर सहयोग आदि जो भी मनुष्य होने की कसौटियाँ हैं,अब ये जीर्ण हो चुकी हैं। इनकी प्रासंगिकता सिर्फ़ और सिर्फ़ मध्यकाल तक ही निमित्त थी।आज मनुष्य होने का पैमाना शोषण,लूट,मक्कारी,भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता,धार्मिक उन्माद हैं।किंतु इसमें भी एक शर्त है।ये सारे निकष दूसरों के लिए निर्धारित हैं।अपने एवं अपने परिवारों के लिए वही प्राचीन कसौटियाँ अब भी क़ायम हैं।
संवेदनहीनता और मृतभावना की पराकाष्ठा है,आज का समय।

नरेश मेहता के 'हाथ' उन सारे शोषक,मक्कार और फ़रेबी के हाथ हैं जो लोगों का शोषण करते हैं।मक्कारी और फ़रेब से लोगों की भावना से खेलते हैं।साम्प्रदायिकता और धार्मिक उन्माद से लोगों में जाति और धर्म का ध्रुवीकरण करते हैं।इस षड्यंत्र में देश के राजनेता से लेकर,छद्मधारी तथाकथित धर्मावलंबियों और बड़े-बड़े कॉरपोरेट्स का 'हाथ' है।
 
इनकी कविताओं की बगिया से टहलते हुए उत्तर-आधुनिकता से निःसृत उन विमर्शों से भी सामना होता है जो वर्तमान समय में पैठ जमा चुके हैं और अपनी सार्थकता भी सिद्ध कर रहे हैं।निम्नांकित 'भोगार्चन' कविता पर नज़र डाला जाए -:

"कृष्ण का दर्शन
था, देवदर्शन
गोपिकाओं का दर्शन
है, दूरदर्शन
इस भागवत -कथा का करो
अंतर्राष्ट्रीय स्वादवाली चॉकलेट
से भोगार्चन"।

यहाँ 'गोपिकाएँ' प्रतीक हैं उन महिलाओं और स्त्रियों का जो बाज़ारवाद,नस्लवाद,और विज्ञापनवाद की जाल में फँसती जा रही हैं।विज्ञापन का दुष्प्रभाव इस क़दर बढ़ चुका है कि तमाम सावधानियों के बावजूद लोग उपभोक्ता बनते जा रहे हैं।फलस्वरूप बाज़ार अपना आकार नित-क्षण विकराल करता जा रहा है। 'गोपिकाओं का दर्शन' से आशय है उन स्त्रियों से जो अपने तन के मायाजाल से बाहर नहीं आ पा रही हैं।उन सभी स्त्री-विमर्शों के ज्वलन्त प्रश्नों को ताक पर रख रही हैं जो यह संदेश प्रेषित करता रहा है कि 'स्त्रियाँ भोगजनित माँसल प्राणी नहीं हैं'।
विज्ञापनवाद का एक उदाहरण द्रष्टव्य हो -:
फेयर एंड लवली (fair and lovely) के एक विज्ञापन में दो लड़कियाँ नृत्य कर रही होती हैं।नृत्य पूर्ण होने के पश्चात एक व्यक्ति आता है और उन दो लड़कियों में से एक लड़की को चुनता है और दूसरी लड़की को उस पहली लड़की के पार्श्व में नृत्य करने को कहता है।क्यों ? इसलिए क्योंकि सौंदर्य की दृष्टि से दूसरी लड़की का चेहरा पहली लड़की के चेहरे से थोड़ा सा फीका था। ग़ौर करने वाली बात यह है कि नृत्यकला के प्रतिस्पर्धा में चेहरे का महत्व,नृत्य से अधिक कैसे हो सकता है?उसकी प्रतिभा तो उसके नृत्य में है, न कि चेहरे में।विज्ञापन हमें न सिर्फ़ विकृत दृष्टि प्रदान करता है बल्कि मनोवैज्ञानिक तौर पर हतोत्साहित भी करता है।
परंतु यह भी उतना ही सच है कि कई स्त्रियाँ इनसे निकलना भी चाहती हैं पर परिस्थिति इतनी बदतर हो चुकी है और बाज़ारवाद का वर्चस्व इस क़दर बढ़ चुका है कि यह सम्भव नहीं हो पा रहा है।इसी बाज़ारवाद को प्रश्रय दे रहा है 'पूंजीवाद'।बड़ा ही भीषण चक्रव्यूह है जिसे तोड़ने के लिए नरेश मेहता निम्नलिखित 'काली कविता' को सामने रखते हैं-:

"दुनिया की तमाम भाषाओं में
लिखी जा रही है
सिर्फ़ एक कविता
जिसका शीर्षक है
काली कविता ! !
तुमसे ही नहीं
हमेशा से
दुनिया की तमाम सरकारें
व्यक्ति से नहीं
उझकी कविता से डरती आयी हैं
क्योंकि कविता हो जाने का मतलब होता है
ईश्वर हो जाना" ।

यह कविता दक्षिण अफ़्रीका के लोगों के संघर्षों की गाथा है किंतु वर्तमान दौर में यह कविता पूरे विश्व की समस्याओं का रूपक गढ़ती सी प्रतीत होती है।
"कविता हो जाना ईश्वर हो जाना है" अर्थात लोकतंत्र में लोक का एकीकरण,उनके विचारों का एकीकरण जिससे एकात्मक स्वरूप प्रगाढ़ होकर सत्ता की क्रूरता और महीन चालों को निरस्त कर सके।

भारत में उपनिवेशवाद का प्रादुर्भाव ब्रिटिशों के शासनकाल में हुआ था।स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात उपनिवेशवाद का ख़ात्मा तो हो गया किन्तु इसकी जड़ें अब भी सही सलामत हैं।अब यह उपनिवेशवाद विचारों के मार्ग से प्रसूत होकर भाषाई अस्मिता तक फैल चुका है।इस उपनिवेशवादी भाषा पर नरेश मेहता करारा प्रहार करते हुए 'अरण्यानी से वापसी' में कहते हैं -:

"भाषा को दोगला बना देने वाले ये भाषण
भाषा को गाली बना देने वाले ये नारे
अपने स्वत्व और देह से नोच फेंको
जो कि गुदनों की तरह
तुम्हारे शरीर पर गोद दिए गए हैं"।

नरेश मेहता मनुष्यता को सर्वोपरि मानने वाले लेखक हैं।उनके लिए प्रकृति,कविता,संवेदना और मनुष्यता एक साझा मिलन है।इनसे अछूता रहकर साहित्य रचना नहीं हो सकती है।इनका 'तादात्म्य' ही साहित्य है -:

"जब भी मैं
फूल,नदी या आकाश पर कविता लिखता हूँ
तो वह मानवीय प्रकरण ही होता है
क्योंकि जब भी मनुष्य की आंखों में आँसू होते हैं
मैंने फूल,नदी,आकाश को रोते देखा है -
इसलिए मेरे लिए न प्रकृति,केवल प्रकृति है
और न मनुष्य केवल मनुष्य"।

आज देश की वर्तमान परिस्थितियों में प्रमुख चुनौती के रूप में उभरा है 'मॉब लीनचिंग'(mob lynching) - भीड़तंत्र का किसी भी एक व्यक्ति के साथ सामूहिक बलात्कार।यहाँ बलात्कार का अर्थ अभिधेय नहीं है बल्कि बलपूर्वक कोई भी कृत्य बलात्कार की परिधि में ही शुमार होगा।किन्तु, मॉब लीनचिंग अनायास नहीं होता। इसके पीछे की मनोवैज्ञानिकता को नरेश मेहता अपनी कविता 'वह व्यक्ति' के माध्यम से व्यक्त करते हैं -:

"मैंने देखा -
मिट्टी के तेल की गंध वाली
तथा राशनकार्ड वाली धुंधली लिखावट में
मुश्किल से कहा जा सकने वाला जीवन लिखा था।
कुछ भी तो उस व्यक्तित्व में
ऐसा नहीं था
जिसे भीड़ से पृथक करके देखा जा सकता था।
उसके दयनीय रूप से झुके कंधों पर
उसके घर-परिवार का ही नहीं
बल्कि पूरे मोहल्ले के बोझ लग रहा था।
मैंने आत्मीय आश्वस्ति के साथ कहा-
क्यों नहीं उतार फेंकते अपने पर से
व्यवस्था की यह दासता?
कब तक भीड़ में संख्या बने रहोगे?
अपने को संज्ञा दो
व्यक्ति बनो।
उसके व्यक्तित्व का सारा ख़ून
उसकी आँखों में उतर आया,
पर वह अबोला ही रहा
और अपनी गली को ओर बढ़ गया।
मुझे उसकी इस विवश विद्रोही कापुरुषता पर ग्लानि हो रही थी
कि तभी
एक तेज़ झनझनाता पत्थर आया
और मुझे लहुलूहान कर गया।
मैंने देखा
उसकी आँखों में,व्यक्तित्व में
तेज़ाब की गंधवाली
रामपुरिया फलकवाली हिक़ारत की भाषा थी।
शायद भीड़ इस प्रकार व्यक्ति बनती है।"
व्यवस्था और सत्ता का ताना-बाना है यह मॉब लीनचिंग।लोगों की बुनियादी ज़रूरतों को दरकिनार कर जाति,धर्म और समाज के ध्रुवीकरण के तहत उनकी सोच को कुत्सित किया जा रहा है।अशिक्षा,बेरोज़गारी,ग़रीबी जैसे सार्वभौम आधारीय अपरिहार्य समस्याओं को हिंदुत्व,राष्ट्रवादिता और नगरों के नव-नामकरण के आवरण में परिवर्तित कर दिया जाता है।
निश्चय ही यह रणनीति समाज और ख़ासकर युवा-वर्ग को बुरे रूप से प्रभावित करता है।

प्रकृति और भाषा का विलक्षण समन्वय इनके कविता के द्वारा अनावृत्त होता है। 'सम्राज्ञी का आगमन' कविता में इन पंक्तियों पर ग़ौर फ़रमाया जाए -:

"कैसा है यह प्रकृति का भाषाई उत्साह, कि
पूरा प्रातःकाल पाठशाला बन गया है"।

प्रकृति और भाषाई तत्वों के समावेश की यह कविता अपने बिम्बों और अभिव्यंजना में कितनी नवीन और सहज बन उठी है।सहज किन्तु नवीन बिम्बों की परिकल्पन-शक्ति से कविता के नए द्वार खोलना नरेश मेहता की एक असाधारण क्षमता है।

किसी भी रचनाकार की मनःस्थिति जानने हेतु उसकी रचनाओं में व्यवहृत शब्दों के समीप जाना चाहिए।शब्द-विन्यास किसी भी लेखक के चरित्र एवं विचारों को जानने का वैज्ञानिक और कारगर माध्यम है।इसलिए कहा गया है कि "शब्द किसी भी व्यक्ति की मानसिकता और विचारों की कुंजी है।"

इनकी प्रारम्भिक कविताओं से गुजरते हुए कुछेक शब्द जो सतत प्रयोग हुए हैं, वे शब्द 'भूमा', 'कुंकुम', 'अमराई' , 'केसर', 'किरणाश्व' , 'आलोक' हैं। इनकी शुरुआती कविताएँ ग्रामीण जीवन एवं उसकी प्रकृति से सम्बद्ध है।निश्चय ही बिना किसी उद्विग्नता,चिंता और विषाद के सहज रूप में इन शब्दों का लगातर प्रयोग हुआ है।

'मुक्तिबोध : एक अवधूत कविता' में वे ख़ुद कहते हैं -:

"मनुष्य जब निष्पाप रूप में मनुष्य होता है,तब वह अनिवार्य रूप से ग्रामीण होता है"।

धीरे-धीरे ये शब्द स्वतः ही अलोपित हो जाते हैं और उनकी जगह नया शब्द उस रिक्तता को भरता प्रतीत होता है।यह नया शब्द है - "एकांत'' ।
' दूसरा सप्तक' नाम से जो कवि का पहला काव्यसंग्रह है,के पश्चात अंतिम काव्यसंग्रह 'पिछले दिनों नंगे पैरों' तक एकांत शब्द लगभग हर दो-तीन कविताओं के बाद लगातार व्यवहृत होता चला आया है।इस शब्द के विपुल प्रयोग के मनोविज्ञान को जानने हेतु उनके जीवन पर दृष्टिपात अत्यंत महत्वपूर्ण है।
शैशवास्था में ही इनकी माँ का असमय देहांत हो गया था।नरेश मेहता के पिता की यह तीसरी पत्नी थी।पहली पत्नी निःसंतान ही दिवंगत हो गयी।दूसरी पत्नी से एक पुत्री हुई और तीसरे से पुत्र रत्न अर्थात स्वयं नरेश मेहता।तीनों पत्नियों के अकस्मात देहावसान के कारण इनके पिता भी संकुचित रहने लगे थे।मातृत्व और पितृत्व सुख से रहित इनका बचपन बीता।तरुणावस्था में प्रेम हुआ पर प्रेयसी किसी ग़लतफ़हमी का शिकार होकर आत्महत्या कर ली।इस घटना के बाद वह पूरी तरह टूट गए।हिन्दू संस्कार से इनका विवाह हुआ पर विवाहोपरांत कुछ वत्सर पश्चात एक और विषादपूर्ण घटना घटी।कार दुर्घटना में पुत्र की मृत्यु हो गयी।

निःसंदेह इनकी कविता में 'एकांत' शब्द का बहुल प्रयोग उनके जीवन में रिक्तता को दर्शाता है,जहाँ बचपन से लेकर प्रौढ़ता तक 'एकांत' का वर्चस्व रहा है।किन्तु यह एकांत उनकी रचनाधर्मिता को कहीं से भी शिथिल नहीं कर पाया।इसी एकांत से इन्हें कविता सर्जन की प्रेरणा मिलती चली गयी और हिंदी साहित्य में मूर्धन्य कवि के रूप में उभरे।

रचनाकार के व्यक्तित्व पर अगर आरोप न लगे तो वह रचनाकार हो ही नहीं सकता।नरेश मेहता पर भी आरोप लगे जो बेबुनियाद और सतही थे।इनकी कविता में "वैष्णव" , "उपनिषद" , ''ऋचाएं" आदि शब्दों की व्यवस्था से आलोचकों को दिक्कत थी।फलस्वरूप इन्हें मार्क्सवाद विरोधी,शोषित विरोधी की संज्ञा से विभूषित किया जाना लगा।

इन आरोपों के प्रत्युत्तर में इनका कथन देखें,कितना सटीक,सहज और निश्चल है -:

(1) "धर्म ने सदा मुझे न केवल आमंत्रित ही वरन मोहित भी किया है,पर मैं धार्मिक न बन सका।धर्म और काव्य तो मुझे अपने स्वत्व के पर्यायवाची लगते हैं, परंतु धार्मिकता और राजनीति अपने व्यक्तित्व के प्रति आक्रामक लगते हैं।"

(2) प्रभाकर श्रोत्रिय के एक साक्षात्कार सह बातचीत के क्रम में उनका उत्तर -:
"आपने कहा कि मार्क्सवाद से आपका 'डिसइल्यूजन' हुआ..."
तो वे तत्काल बोले- "ज्यादा अच्छा होता यह कहता कि मार्क्सवाद से नहीं,बल्कि उसके संगठनात्मक स्वरूप कम्युनिस्ट पार्टी से मोहभंग हुआ"।

अपनी तमाम सार्थकताओं और संभावनाओं से लब्ध इस प्रबुद्ध कवि को हिंदी साहित्य में तमाम उपलब्धियों के बाद भी वह शिखर न मिल सका जिसका वह हक़दार था।विविध रंगों से परिपूर्ण काव्यरचना के बाद भी न किसी बड़े आलोचकों की इन पर नज़र पड़ी, न ही किसी बड़े साहित्यकार की।पुरस्कार किसी भी साहित्यकार के लिए उतना मायने नहीं रखता जितना कि उसकी रचनाओं का सम्यक मूल्यांकन न होना।अकादमिक गोष्ठी हो या विश्वविद्यालय का पाठ्यक्रम,इनकी कविताओं की गैर-मौज़ूदगी इनकी प्रातिभ-शक्ति का अपमान है।

आज समय की मांग है कि इस अप्रतिम और अभूतपूर्व कवि को हिंदी साहित्य में यथोचित स्थान मिले और आलोचक तटस्थ होकर,पूर्वग्रह से मुक्त इनके समग्र साहित्यिक अवदान की सही समीक्षा कर उसकी प्रासंगिकता और प्रभाव को सिद्ध करें।
हालाँकि इन सबका मोह इस सहज व्यक्तित्व के हृदय में कभी था ही नहीं।
सरल और सहज शब्दों में उनका यह कथन ही उनके काव्य की गरिमा है -:

"लिख कर धर्म पूरा हुआ।मुझे सुख यही है कि मेरे कवि से 'विशेष' की आशा किसी को भी न रही।इसलिए स्वागत, तिरस्कार का प्रश्न नहीं उठता। एक पंक्ति भी कविता लगे तो मेरा धर्म सार्थक हो जाएगा।"

मयंक (Mayank)
8521858613
9883429728


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