आत्मा रंजन


स्मार्ट लोग
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मशहूर रेस्तरां की बड़ी सी मेज़ के गिर्द
जमा हुआ है स्मार्ट युवक-युवतियों का टोला
शीतल पेय की चुस्कियों
सिगरेट के छल्लों के बीच
खिलखिलाते बतिया रहे हैं मस्ती में

भरपूर ऊर्जा से भरी
स्मार्ट लोगों की दुनिया है यह
स्मार्ट हैं उनकी पोशाकें और जूते
मशहूर ब्रांड की पतलूनें, टाईयाँ, सूत, चश्में
करीने से प्रेस की हुई झक सफ़ेद कमीजें
जिनेहं निखारने के लिए
टी.वी. पर मशहूर हस्तियाँ बेच रहीं हैं पाउडर
पाउडर ही क्यों और भी बहुत कुछ
बहुत कुछ से भरी पड़ी हैं उनकी अलमारियां
ओर आदमकद शीशे की दराजों में
आकर्षक पैक और छोटी-बड़ी शीशियों में
मौजूद है हर मर्ज़ की दवा
समत हैं उनके चेहरे
आँखें, दांत, बाल, नाखून
धूल और पसीने के लिए है उनके पास
अदा से नाक सिकोड़ती घिन्न
वे हँसते हैं खांसते हैं सलीके से
फूहड़ नहीं स्मार्ट है उनकी हंसी
और खांसी-खंखार भी
उनके लकदक ड्राइंग रूम की
स्मार्ट व्यवस्था में आक्रान्त
कहीं दबता सा जा रहा घर
किताबें नहीं हैं कहीं भी, न लाइब्रेरी
अलबत्ता चंद पत्रकाएँ हैं स्मार्ट मुखपृष्ठों वाली

एक से बढ़कर एक
स्मार्ट हैं उनके सेलफोन
स्मार्ट पर्स में सलीके से रखें हैं
स्मार्ट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, गिफ्ट कार्ड
एक दूसरों को नीचा दिखाने के
उनके पास हैं स्मार्ट तरीके
छोटी-छोटी साजिशों में उलझे
बड़ी सी साजिशों से बेखबर हैं स्मार्ट लोग
उनके लिए अमर्त्य सेन हैं
जनरल नॉलेज बहार का एक प्रश्न
वे अनवरत घंटों बतिया सकते हैं
मशहूर कंपनी की बाइक
और कार के नए मॉडलों पर
स्मार्ट हैं उनके सपने

स्मार्ट लोग
स्मार्ट कंपनियों में करते हगें स्मार्ट जॉब
और कमाते हैं स्मार्ट मनी !



इस बाज़ार समय में
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चमक का कमल है सारा
चमक की व्याख्या का
रूप और रंग और गंध का जादू
जैसे दिनों में बीत चुके समय को धत्ता बताता
फ्रिज में महक रहा पिज़्ज़ा
या त्वचा को चमका रही क्रीम

चमक विज्ञापन और व्याख्या पर
लगाईं जा रही
साड़ी की साड़ी ऊर्जा और मेधा
रूप रंग रस गंध संवारने-सहेजने में
झौंकी जा रही युगों-युगों की
वैज्ञानिक खोज और उपलब्धियां

कमाल ही कमाल
इस बाज़ार समय में
सब लाजवाब
चकाचक, झकाझक !


नई सदी में टहलते हुए
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भागते समय से ताल बिठाता
बदलती सदी को कुशलता से फलांगता
वह है अनाम घुडदौड़ का
एक समर्थ घोडा

तीव्र से तीव्रतर होती गति के बीच
टहलने निकलने का उसका ख़याल
अपने आप में सुखद है
साँसों के लिए
और जीवन के लिए भी

नई सदी के पहले पड़ाव पर
टहलने निकला है वह
स्वतः ही दौड़ते से जा रहे
उसके कदम
उसकी अंगुली थामे है
एक बच्चा
बच्ची होने की संभावनाओं की
गर्भ हत्याओं के बाद
लिया है है जिसने जन्म
बोलता जा रहा बच्चा लगातार
बडबडाता सा खींचता हुआ उसकी कमीज़
नहीं, विक्षिप्त नहीं है बच्चा
दरअसल सुनने वाले कानों में
चिपका हुआ है मोबाईल
और वे मग्न हैं अपनी दुनिया में
आँखें भी है आगे ही आहे
बच्चे से कहीं ऊंची

खीजता हुआ रुआंसा बच्चा
चुप है गुमसुम
ढीली पड़ती जा रही
अंगुली पर उसकी पकड़
वह सोच रहा एक और विकल्प –
पापा के साथ टहलने से तो अच्छा था
घर पर विडिओ गेम खेलता

उसका इस तरह सोचना
इस सदी का खतरनाक हादसा है
बहुत ज़रूरी है कुछ ऐसा करें
कि बना रहे यह
अंगुलियों का स्नेहिल स्पर्श
और जड़ होती सदी पर
यह नन्हीं स्निग्ध पकड़
कि इतनी ही नर्म ऊष्म
बची रहे यह पृथ्वी !



नहाते बच्चे
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सिर्फ माँ ही
नहला सकती है बच्चों को
इस तरह

या फिर धूल
या धूप !


आधुनिक घर
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आधुनिक घरों के पास नहीं हैं छज्जे
कि लावारिस कोई फुटपाथी बच्चा
बचा सके अपना भीगता सर
नहीं बची हैं इतनी भर जगह
कि कोई गौरैया जोड़ सके तिनके
सहेज परों की आंच
बसा सके अपना घर-संसार !

बोलो जुल्फिया रे

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एक दार्शनिक ने कहा-
किसी को लम्बी उम्र की दुआ देनी हो
तो कहना चाहिए
तेरी उम्र लोकगीत जितनी हो !
लेकिन अपवाद ही हुए तुम
तुम्हारी कहानी से अपरिचित था शायद दार्शनिक
मेरे भीतर क्यों गूँज रही है
रह-रह कर तुम्हारी कसकती लम्बी तान
लहलहाते मक्कई खेत के छोर पर खडा हूँ मैं
सामने पसरी है खेतों की लम्बी कतार

कहाँ है वह गाँव भर से जुटे बुआरों का -
‘जितने सरग में तारे उतने मेरे मामा के बुआरे’
जैसी कहावतों को मूर्त करते हुए
कहाँ है वह बाजों-गाजों के साथ चलती गुड़ाई का शोर
यहीं गूंजते थे तुम्हारे बोल-
‘बोलो जुल्फिया रे..$..$..’

युवक-युवतियों क टोलों के बीच
यहीं जमते थे तुम्हारी लय में ढले सवाल-जवाब
यहीं तो खुलते थे उनके भर आए दिलडू के द्वार
तुम में ही उमड़ती थीं सुच्चे प्यार की परतें
बूढाती स्मृतियों में कहीं ठहर गया है दृश्य
किसी का काम न छूटने पाए
बारी-बारी सबके खेतों में उतरता सारा गाँव
हल्ले-गुल्ले से ही कांप उठते खरपतवार
और दो-तीन पालियों में ही निपट जाता
बड़े से बड़ा खेत
कई कामचोर तो ऐसे ही तर जाते
जुल्फी की दाद देते-देते

खिलनियों की नोक से निकलता
धरती की परतों में छिपा कांपता संगीत
मिटटी की कठोरता में उर्वरता और
जड़ता में जीवन फूंकते
कठोर जिस्म के भीतर से उमड़ते
झरने का नाम है जुल्फिया
चू रहे पसीने का खरापन लिए
कहीं रूह से टपकता प्रेमराग
ऐसे अनन्य लोकगीत तुम
कैसे बन गए एक लोकगीत की त्रासदी
बोलो जुल्फिया रे

फ़िल्मी गानों पर मर मिटते
भविष्य तलाशने में जूझ रहे युवक-युवतियां
देह लपकने को आतुर संगीत संयोजक
कहीं नहीं सुनाई देती
जुल्फी की हूकती-गूंजती टेर

खेतों में अपने-अपने जूझ रहे सब खामोश
पडोसी को नीचा दिखाते
खींच तान में लीन
जीवन की आपाधापी में जाने कहाँ खो गया
संगीत के उत्सव का संगीत
कैसे और किसने किया
श्रम के गौरव को अपदस्थ
क्यों और कैसे हुए पराजित तुम खामोश
अपराजेय सामूहिक श्रम की
ओ सरल सुरीली तान
कुछ तो बोलो जुल्फिया रे !

(हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्रों में प्रचलित कृषि कार्यों को मिल-जुल कर करने की ‘बुआरा प्रथा’ में सामूहिक गुड़ाई लोक वाद्यों की सुरताल के साथ संपन्न होती थी ! जुल्फिया एक लोक गायन शैली है इसे सामूहिक गुड़ाई के अवसर पर गाया जाता था ! बुआरा प्रथा के साथ ही यह गायन भी अब लुप्तप्राय: है!)




आत्मा रंजन
स्वास्तिका भवन, ग्राउंड फ्लोर , न्यू टुटू, शिमला (हि.प्र.)171011
मेल:- atmaranjan18@gmail.com
मो.:- 9418450763

 


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