प्रगति गुप्ता की अन्य कविताएं

 
मेरे अंदर का मैं


रोक लेता है अक्सर ही
मेरे अंदर का मैं
उन सभी अनकही बातों को कहना
जो कसक बन
बेशक़ सालती रही हो ताउम्र मुझे भी...

रोक लेता है अक्सर ही
मेरे अंदर का मैं
मुझे टूटकर प्यार करने से
अपने अतिप्रिय को
फिर चाहे बेशक़ अधूरा-सा टूटकर
बिखरा-बिखरा फिरे मेरा मैं भी..

रोक ही लेता है अक्सर ही
मेरे अंदर का मैं
उन सभी सहयात्रियों को शुक्रिया कहना
जो संबल थे साथ चलने में मेरे
पर मेरा मैं उनको
स्वमं से नीचा देखने पर तुला था ...

रोक लेता है अक्सर ही
मेरे अंदर का मैं
स्नेह प्यार बहुत अपनों पर लुटाना
जबकि उनके ही प्यार को
समेट कर जीये-सा
महसूस किया था उसी मैं ने भी..

रोक लेता है अक्सर ही
मेरे अंदर का मैं
मुझे फूट फूटकर रोने से
बेहद प्यार करता था जिसे
और मैयत पर जिसकी
अपने सारे आँसुओं को
उड़ेलना चाहता था,
उसे बोल न पाया कभी
बेहद प्यार करता हूँ तुमसे ...

रोक लेता है अक्सर ही
मेरे अंदर का मैं मुझे
उस परम को भी धन्यवाद कहना
जिससे मिला था जीवन में
प्यार ,स्नेह और संबल
जिसको अपना ही हक़ समझ
अक्सर ही नज़रअंदाज़ कर देता है
मेरे अंदर का मैं,
सोच कर यही, मुझ से है सब
और सब मेरे से ही है...
जाने किस-किस को और स्वयं को
नादान बन तोड़ता है
अक्सर ही मेरे अंदर का मैं भी.....
प्रगति


अब न बंधूगी

जितना बांधोंगे मुझे
उतना ही छूटूंगी मै........
उङना मेरी भी नियति है
बंधकर भी अब नहीं बंधूगी मै.....
बांध सको तो नयनो को मेरे
प्रेम की अनुभूति दो......
स्वयं को ह्रदय से समर्पित कर
अब ये पहल तुम करो........
समर्पण मुझ से चाहने से पहले...
पूर्ण समर्पित स्वयं को करो......
खोल चुकी हूँ पंख अब मैं अपने भी....
समर्पण के लिये पहले
स्वयं को समर्पित तुम करो ..
उथली जंजीरों से
अब ना खुद को बांधूगी
अब मैं उङना ना छोङूगी.......
अब मैं उङना ना छोङूगी...........
प्रगति गुप्ता

 


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