ताबिश नवाज़ 'शजर'
 
वक़्त गड़रिया है


कुछ यादें जिन्हें मैं जी नहीं पाता
वो सपने बनकर
मेरी नींद में आते

मैं दो समय के बीच खड़ा
चाहत और भय से जड़ा
भूलने लगता हूँ अपने दोस्त-परिजन

भाग जाता हूँ छोड़ अपना शहर
जहाँ पहुँचा कर मैं बरसो सफ़र
जो फिर छूट गया हवा में

समय की सतह से
सटकर, सख़्त हो गया
जैसे दीवार पे जमीं फफूँदी

पेड़ों पे काई
समय किसी शहर में
निरंतरता में विराम

तुम्हारी बातों में हिचकियाँ
आकाश में चिड़ियों का झुंड
कोरे काग़ज़ पे स्याही के धब्बे

वक़्त गड़रिया है, हम भेड़
वो हाँकता हमें
यादों की छड़ी लिए

हम चरते जाते
चरते जाते
अपनी ज़िन्दगी
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मकड़ी का जंगला


बेसब्री सी एक सड़क
जिसके किनारे खड़ा
बस-स्टॉप का खम्बा
जिसपे अक्सर,
उकताकर,
मैं लद जाता हूँ।

आज बारिश हुयी
तब देखा उसे -
उस मकड़ी के जंगले को,
जिनपे टंगीं थीं
बारिश की बूँदें
इतनी गोल
मानो सर्फेस-टेंशन ने उन्हें
तन्हाई में बनाया होगा
बाकी सारे फोर्सेज़ ने
बैठ उन्हे बनते देखा होगा।

और जब सड़क पे गाड़ियाँ ग़ुज़रतीं,
अपने हेड-लाइट्स को जलाये हुए,
बूँदों में रौशनी भरने लगती,
बूँद-बूँद।
उरूज पे सब सूरज बन जाते,
टिम-टिमाते जंगले पे,
सूक्ष्म रौशनी की लड़ियाँ
लटकतीं, डोलतीं हवा से।

और जब गाड़ियाँ दूर जाने लगतीं,
रौशनी कतरा-कतरा सूखती जाती,
जंगले के धागे
मानो उन्हें पीने लगे हैं
और झूमते जाते हैं
हवा की धुन पे।
बारिश की बूँदें,
बादल का अक्स लिए,
चमकतीं चाँद की तरह।

सड़क की बेसब्री
घटती, बढ़ती रहती।
बारिश की बूँदें,
कभी सूरज, कभी चाँद
का चोला पहने,
थरथराती रहतीं,
एक मासूम मकड़ी के जंगले पर।


 


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