डॉ विनय की कुछ कविताएं
 

तीन कवितायेँ

1
कोई न कोई देह ज़रूर होती हैं
जिनसे बावस्ता होती हैं वे चीज़ें
जो विदेह जान पड़ती हैं  

जैसे आकाश
पृथ्वी और उसके परिवार वालों का
आँगन है मैदान है परिधान है
जैसे हिमालय और आल्प्स किरणों की पगड़ियों के शीश हैं
जैसे ताजमहल चाँदनी के जादू का आईना है
जैसे पीपल के पत्ते हवा के हल्के झोंकों के कम्पास हैं
जैसे हमारे जगे दिमाग़
ईश्वर के होने और न होने के ठिकाने है
और जैसे नींद
स्वप्न के कैटवॉक, मोहिनीअट्टम या ताण्डव का
आबनूसी रैम्प है

और यक्षी, तुम ही कौन-सी देह लेकर पैदा हुई थी
मगर शिल्पियों और कवियों ने
अपनी कामनाओं की मिट्टी से ऐसा रचा
कि एक को पुकारो
तो क्या ख़ुदा और क्या सनम दोनों हाज़िर!

2
मेरे विश्वास की आदि-वेदिका पर
तुम्हारा ही आसन था कभी
मगर मेरे असंतोष और लालच ने
चमकीली छवियों के कई लोक बसा दिए

और क्या है विचित्रे
कि जैसे तुम्हें सोचते-सोचते
अलकापुरी और कुबेर सोच गया
वैसे ही बहुत कुछ
वेद उपनिषद पुराण
दर्शन न्याय मीमांसा शासन के तंत्र
दमन के सिद्धांत मुक्ति के मार्ग

और कोई भी मुक्ति कब अंतिम
कि सब की सब किसी न किसी तंत्र लुप्त

ऋत को साधने की कोशिश में
हाय! अनृत ही रचता रहा !

समय के आकाश को तकता रहता हूँ
जहाँ छवि-मंडित विश्वासों की अनगिन वेदिकाएँ
उड़नतश्तरियों की तरह नाच रही हैं

उछलकर किसी एक को थामता हूँ
और आँखें मूँदकर बाक़ियों को कहता हूँ
-अंध विश्वास
सब सुनते हैं और बुरा मान जाते हैं
किंतु ओ मेरी आत्मा के पैरों के नीचे की घास
बस एक तुम्हीं हो जो अपनी नरमी नहीं छोड़ती!


3
स्वप्न तो नहीं था
समाधि कभी लगी नहीं
ध्यान ही रहा होगा गहरा ध्यान
जो मेले के शोर और भीड़ में
भंगिमाओं की निधियाँ
और कविता की पंक्तियाँ चुनने-बटोरने लायक बनाता है

ध्यान ही रहा होगा
कि मैं वहाँ था जहाँ कभी गया नहीं

वह बोलते हुए पत्थरों का देश था
पहाड़ों की चोटियाँ गा रही थीं
और नदी हर आने-जानेवाले को
पूछ-पूछकर पानी पिला रही थी
हवा सबको सहला रही थी
और बादल सबकी आँखों और पाँखों की धूल
इतनी कोमलता से पोंछ रहे थे
कि किसी को भान तक नहीं

गुफाएँ माँ की गोद की तरह
सबके लिए उत्सुक और आतुर थीं
लताओं और झाड़ियों के बने मंडप
प्रिया के आमंत्रण की तरह सज्जित और सुवासित
और तितलियाँ और भौंरे एक दूसरे को
उद्यानों का पता बता रहे थे

मुझे भौंचक्का जान एक पंछी मेरे कंधे पर आ बैठा
पूछा - किसे ढूँढते हो पांथ
मार्ग तो नहीं भटक गए
मेरी दृष्टि अचरज के आलोक में डूब गयी
आगे मूर्च्छा थी या समाधि
कि तभी रबाब की साँसों में उलझीं
तबले की धड़कनें गूँज उठीं

यह विचित्रा थी

मैंने पूछा- यह तुम्हारा लोक है
इतना सरल इतना सुहृद इतना निष्पाप
यह कौन-सा युग है विचित्रे

वह मुस्कुराकर बोली -
जब कवि नहीं होते थे

मुझे बुरा लगा- यानी ?
वह बोली - यानी जब भाषा नहीं थी

- लेकिन यहाँ तो सब बोल रहे हैं
- नहीं, तुम सुन रहे हो
जैसे अपने भीतर चुपचाप सम्भव होती
कविताएँ सुनते हो
और काग़ज़ पर छापकर कवि बने फिरते हो

- लेकिन तुम कहाँ हो विचित्रे
दिखती क्यों नहीं

- मैं भी वहीं जहाँ से तुम्हारी कविताएँ आती हैं
- वहाँ तो बहुत कुछ है
- जैसे
- धर्म, ईश्वर, संसार और उसके व्यापार
कविताओं के लिए कितनी जगह
और तुम तो अब मिली हो

- मैं तो सदा से तुम्हारे भीतर
तुम्हारी कामना और भय की पहली संतान
धर्म और ईश्वर मुझसे बहुत छोटे हैं कवि
मैं इनके आख्यान और मंदिर की पहली प्रस्तावना
और मेरा यक्ष पहला प्रहरी
शेष तो शब्दविलास
जो कामनाओं की आँच में पककर पत्थर हो गए
क्या धर्म और क्या ईश्वर
सब शब्द और भाषा के खेल हैं कवि

- लेकिन धर्म ही तो समाज और सत्ता का भी नियामक
- धर्म और सत्ता आदिपुरुषों की क्रीड़ाएँ हैं कवि
जिसके हाथ में दंड वह सत्तावान
और जिसकी बुद्धि प्रचंड वह धर्माधिकारी

- और वही धर्माधिकारी तुम्हें और तुम्हारे यक्ष को अनिष्टकारी बताते हैं

- ठीक ही तो करते हैं कवि
मुझे पुकारने वाली
भोली आत्माओं की भाषापूर्व की पीढ़ियाँ
तो कब की माटी
जैसे मंदिरों की नींव में मेरी कथा
कुछ मनगुनियों और कवियों के सिवा
कौन आता है इस सीलन भरे अंधेरे में
नगाड़े नींव में नहीं बजते
और न ही एकांत में गाल
देखो, कितनी भीड़ हैउधर और कितना शोर
धर्म की जाने कितनी दुंदुभियाँ
ईश्वर के जाने कितने नाम कितनी मुद्रायें
कितनी भाषाओं में कितने मंत्र
कितनी प्रार्थनाएँ कितने जयकारे
और हंगामें में कौन किसकी निंदा सुनता है बुद्धू
आओ भाषा के सारे वस्त्रालंकार उतार दो
उतर जाओ चुपचाप इस सीलन भरे अंधेरे में
कितनी शांति है जैसे स्वप्नहीन नींद!

 


मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए | मुख्य पृष्ठ