आग बरस्क कविता

मैं कविता के बारे में बात कर रही हूँ
और उधर
अमेजन के जंगलों में आग लगी है

कविता को किनारे पर
रख कर यदि हम
आग के बारे में सोचे तो
इसे हमारे पूर्वजों ने
बड़ी मेहनत से पाया था

आग को देवता बना, अपनी
शीत गुफा को तपाया था
अपने भोजन को सुपाच्य बनाया

आग बनी उसका संदेश वाहक,
देवताओं से बतियाने के लिए
उसके पूर्वजों को ऊपरी लोक में
जगह दिलवाने के लिए

आग प्रिया थी, तभी रसोई में समा गई
भगिनी थी, इसलिए दरवाजे के सामने
बरौठी पर सुलग गई

आग देव थी, आस्था में समा गई

लेकिन आज यह क्रोधित है
भूखी है, या व्याकुल है
पता नहीं क्यों राख कर रही है,
दरख्तों को, जो उसे अपनी देह में
स्थान देते हैं
चुग रही है पक्षियों के घौंसले
उनके अण्डे बच्चे
वन पशुओं को, कीड़ों और जीवों को

वे जन, जो पालते हैं जंगल,
अपने दिल की बाते कहते हैं
तप रहे हैं, लेकिन भाग नहीं रहे है

वर्तमान का मसीहा,
उन्हें सभ्य बनाना चाहती है
सभ्यता क्या है, वे पूछते हैं
क्या जंगलों से दूर जाकर
अपने अपने जंगल बनाना जिनमें
एक दरख्त दूसरे से बात भी ना कर सके?

मुझे सन्देह है कि मेरी कविता
कहीं सभ्य बनाने का षडयन्त्र तो नहीं कर रही
क्या यह गले के नीचे, फैंफड़ों के
भीतर के केन्द्र से निकल रही है?

मेरी कविता
आग के सामने निस्सहाय है
आग उगलने में असमर्थ
समाज को ताप दिलाने में अशक्त

तो क्या आज कविता
आग के बरक्स खड़ी हो सकेगी?
या


रति सक्सेना



इस अंक के कलाकार अजेय केलांग है , और उनके ये चित्र कविता ही हैं

     पत्र-संपादक के नाम                                                  
 


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