उल्लूर एस परमेश्वरय्यर

मलयालम साहित्य के आधुनिक काल में प्रवेश के उत्तरदायी जिन कवियों का उल्लेख होता है , उनमें उल्लूर एस परमेश्वर काव्य लालिमा के कारण विख्यात हैं। (1877-1949) आपकी गणना सुप्रसिद्ध कवित्रय के रूप में होती है। उल्लूर के काव्य में परम्परा ‌और आधुनिकता का सम्मेलन है। विषयों के वैविध्य ने कवि को एक अलग पहचान दी। आपकी कविताओं के आधार विषय रहे हैं‍ ... राष्ट्रीय प्रेम, मानवीय भावनाएँ, सामाजिक उत्थान और पौराणिक आख्यानों की पुनर्रचना। आपकी कविताओं के करीब 15  संकलन हैं । आपने " उमा केरल " नामक एक महाकाव्य भी आपने रचा है। इनके अतिरिक्त भावगीत एव मुक्तकों का एक अच्छा खासा संग्रह भी आपके नाम है़। वैपुल्य और उत्कृष्टता , दोनों का समावेश असंभव माना जाता है, किन्तु उल्लूर के सन्दर्भ में यह शतप्रतिशत संभव माना गया है।

उल्लूर की कविताओं में से हम प्रेम संगीत के कुछ अंशों को प्रस्तुत करेंगे। जिनका अनुवाद केरल के हिन्दी प्रेमी , संस्कृत विद्वान कवि अनुवादक कवियूर शिवराम अय्यर ने किया है। शिवराम जी स्वयं कवि हैं अतः आपके अनुवाद मूल के काफी निकट हैं।
सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अय्यर जी ने अनुवाद में भी मूल कविता के छन्द की पकड़ को नहीं छोड़ा है।

प्रेम संगीत


धर्म एक ही , जो कि जगत का
प्राणभूत है प्रेम, निराला,
वही न पूर्णेन्दु, सभी हम को
पय पीयूष पिलाने वाला?



है परमेश्वर चैतन्य वही
जो भक्ति दया अनुराग आदि,
कई ढंग के रूप ग्रहण कर
सरंव जगत को प्रकाश देता।


उसी पंथ का परिपंथी जो
नास्तिकता है , विद्वेष वही,
हा! उस तम में लोक पड़े तो
फल होता मृत्यु अकालिक ही।



है वह दुर्देवता बदलता
दारकर्म को प्रेत कर्म में,
मधुमय फुलवारी को ऊसर,
स्वर्ग लोक को नरक भयंकर।
‌‌***

शब्द समूह , समन्वय से ही
सार्थक सुन्दर वाक्य बनेगा,
स्वर तालों को संगीत से ही
कोई गाना श्रुतिसुख देगा।

अगणित गण परमाणु परस्पर
मिलजुल सकल पदार्थ बने हैं,
उनके चित्र समन्वय से ही
सर्व चराचर सार्थ बने हैं।

कही पराश्रय बिन रहने को
अवकाश नहीं है प्राणों को,
पुरषोत्तम भी जगत् सृष्टि में
साथिन करते प्रकृति सखा को।

***

प्रपंच , दर्पण , जो कि हमारे
रूपों के प्रतिरूप बनाता ,
प्रपंच, गह्वर , जो कि हमारे
नादों का प्रतिनाद उठाता।

विश्व हमारे संभाषण का
पुनरुक्ति विशारद तोता है,
विश्व हमारे भाव भाव का
निपुण विडंबक नट होता है।

जग अंशुक के बदले अंशुक,
क्षत के बदले क्षत ही देता,
जैसा बीज बोया जाता है
वैसा ही फल पाया जाता है।

कर में जिसके दीप रखा है
उसके लि॓ए जग उजियारा,
मन में जिसके कल्याण जगा है
उस के लिए सुधामय संसार सारा।

प्रेक्षक के बिन सचमुच कोई
वस्तु न जग में सुन्दर होती,
ईश सृष्टि में यह इतरेतर
संगति कहाँ न पायी जाती?

.....

नत होवें उन्नत होवें
कुछ बोवे तो कुछ हम खावें
दिया करें तो कुछ पावें
नाक नरक हम स्वयं बनाएँ

........
हम मानव और सब प्राणी
सहोदर भाइयों से रहते
ताना बाना खद बना कर
संसार पटल को खुद बुनते।

.....

नमो नमस्ते जीवन दायक,
परं ब्रह्म, हे नटवर निर्मल
तेरे मानव नर्तन गण में
छोटा सा नट मैं भी शामिल।

क्या क्या वेष बनेगा मुझको?
निर्णय करना अभीष्ट तेरा,
विधेय होकर विश्वप्रिया सा
नर्तन करना करतब मेरा।

........

अखिल चराचर प्रेमांजन के
रंजित सुन्दर नयन के बिना
परा भक्ति से प्राप्य परात्मन्
दर्शन तेरा दुर्लभ मिलना।

परसुख हो सुख होता मेरा
परदुख हो दुख अपना ही है
वास्तब में "तू" , "परम पुरुष", मैं
केवल एक अखण्ड नहीं है?

मेरी काया, मेरी श्वासा
तेरे चरणों पर न्यौछावर
दिन रात उन्हीं दोनो को तू
परार्थ कर दे प्रभों नमो!

translated by Rati Saxena


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