नरेन्द्र पुण्डरीक की कविता


वह हमारे भीतर बैठी हमारे लिए स्वेटर बन रही हैं

गांव के बाकी लड़कों की तरह
मेरे पास भी एक खाली मन था
जिसमें अटाय सटाय सब कुछ
डालते रहने पर भी बना रहता था
खाली खुक्क भांय भांय करता
घूमता रहता था गरमी की दुपहरियों में

इस खाली खुक्क मन में ऐसा कुछ
डालने का जुगाड़ नहीं था किसी के पास
कि मन भरा-भरा लगे
यदि किसी के पास था तो भनक नहीं थी

सन् साठ के आस पास किताबें नहीं थी इतनी
भावों के मुताबिक शब्दों से परिचय नहीं था
जितना ज्ञान और शब्द थे उससे
इतना ही कुछ हो सकता था जो रहा था

ले देकर कितने दिन बोलते उनके डायलॉग
गर्मी के लम्बे दिन थे और
नदी थी और कुछ पेड़ थे सघन छाया वाले
कुछ लड़कियां थी जिनके सपने
आना अभी शुरू नहीं हुए थे
छोटी और कम ठंडी हवादार रातें थी
जो हमारी नींद के लिए अक्सर कम पड़ती थी

यह वह समय था जब फूल खिले फूल जैसी
औरतों के अच्छे लगनें की शुरुआत हो गई थी
उनके सरोकारों के लिए दौड़ लगाना
अच्छा लगने लगा था
शायद यह लड़कियों से प्रेम करने का या
होने का पूर्वाभ्यास था
औरतों के कपड़ों से आती भीनी गंध से
अजीब सा कुछ महसूस होने लगा था

तब इतनी चीजें कहां थी
एकाध कभी किसी के घर आती थी
वह भी घरउवल की तरह हो लेती थी
शहर से कभी कभार एक आइसक्रीम वाला जरूर आ
जाता था
जिसके पीछे हम लड़कों की लम्बी कतार होती थी
इस कतार में शायद ही किसी के पास
खरीदने के लिए पैसे होते थे
सो आंखों के देखने के लिए सपने कहां से लाते

लपलपाती दुपहरियों में हमारे साथ
नीम और पीपल की घनी छायाएं होती
ज्वार के डटेर के पुंगू होते
जिनसे कभी मुंह फुंकू बाजा बजाते
कभी पुंगू रगड़ कर पैदा कर देते आग
इन हाथों में सूखे पुंगूओं से आग
पैदा करने की ताकत आ गई थी
लेकिन यह समझ नहीं आयी थी कि
आग कहाँ लगानी है सो
आग पैदा करने का दम दिखाकर रह जाते

यह हमारे आग और पानी के दिनों की शुरूवात थी
सो हम उसके लिए है कहीं खड़े दिखाई दे जाते
इससे अधिक कुछ करने का हुनर नहीं था मालूम
जब तक कुछ देखने से जानते कुछ सुनागुन से
समझते
गाड़ी स्टेशन से आगे बढ़ जाती
हाथ हिला कर उन्हें विदा भी नहीं कर पाते
सो एक एक करके सब चली गई

इस संबंध में शहर के पूर्वज कवि
जो देखने सुनने में अच्छे खासे
गौरांग महाप्रभु दिखते और लगते थे
अक्सर कहते थे कि भला हो हमारे उन पुरखों का
जिन्होंने शादी के लिए अरेंज मैरिज चला रखी थी
वरना मैं अन व्याहा ही रह जाता मुझको कौन पूछता
मुझसे कौन प्रेम करता और
और प्रेम कैसे किया जाता है मुझे मालूम था नहीं
जीवन का तो उन्होंने नहीं खोला
लेकिन अपनी कविता में वंशी बजाई थी
वंशी राधा की थी या रुकमणी की
यह मुझे नहीं मालूम लेकिन
प्रेम में वे अच्छा डोले थे
जिसे कविता में अब भी याद किया जाता है
यह प्रेम की करामात थी कि
एक दूसरे कवि ने जहां कभी
उसकी आंखें फंस कर रह गई थी
वहाँ नाव बांधने तक से मना कर दिया था
डोलने और मना करने की
वर्जनाओं के बीच फंस हमारा प्रेम
कुछ न कुछ कर गुजरने की फिराक की बजाय
वहीं का वहीं ठाव ठक्क करता रहा

अचानक एक रात जिसे कभी नहीं देखा था
उसे दिखा कर कहा गया हमसे
यह तुम्हारा प्रेम है
किताबों में इस प्रेम के बारे में कहीं नहीं पढ़ा था
जिन्हें घाट पनघट में देखता चला आ रहा था
यह वह भी नहीं थी
यह उनमें भी नहीं थी
जिनकी आंखों की बुलाहट में
हमें नदी नाले आग पानी कुछ भी नहीं दिखाई देते थे
यह वह भी नहीं थी
जिनके लिए हमारी लंबी रातें छोटी हो कर
आंखों में ही रीत जाती थी
यह उनमें भी नहीं थी
जिनसे कभी इतनी बातें की थी
जितनी होने में अब न जाने कितने जन्म गुजरेंगे
यह निश्चय है कि अब हम जो करेंगे
और यह जो है इसे कभी दिखाई नहीं देगा कि वे
हमारे भीतर बैठी हमारे लिए स्वेटर बुन रही है।


( नरेन्द्र पुण्डरीक की अन्य कविताएं)


सुनीता कटोच  की कविता

 

अदालतें

कुछ अदालतें ऐसी भी होती है
जहाँ आप पकड़े जाते हो चोरी के जुर्म में
और सज़ा सुनाई जाती है खून के जुर्म में
असल मजा तो तब होता है
जब आपका वकील
आपके ही खिलाफ
सारे गवाह  सारे सबूत
पेश करता  है
और  सजा के तौर पर

रिश्तों के बाज़ार में
आप नंगे घुमाए जाते हो
हर तरफ फुसफुसाहट होती है
दबी आवाज़ों का शोर

टूटते रिश्तों का चीत्कार
आपकी सृष्टि हिला कर रख देते हैं
और आप धरती फटने का इंतज़ार करते हो

क्योंकि आपने सीता की कहानी सुन रखी है
पर सीता हर युग में नहीं होती
घरती नहीं फटती
और आप पर
असहनशील/ अपवित्र  होने  का दोष भी लग जाता है

                                                                                (जनवरी 2019)

( सुनीता कटोच  की अन्य कविताएं)
 


शुभम की कविता

क़िरदार
_______

क़िरदार बखूबी निभाया तुमने,
हम उसको जीवन समझ बैठे
एक आरजू अब भी है
बस देखता रहूँ, देखता रहूँ
कभी न ख़त्म होने वाला अहसास
निभाओगे ना, फिऱ से वहीं क़िरदार

उदास तो तब भी नहीं थे ,
जब गिरा इस नाटक का पर्दा
क्योंकि सड़क अब भी
घर को ही जाती थी
पर अफ़सोस वो मकां अब मेरा नहीं
गलियों में बिखरा होता है
अनसुलझे, अधूरे, अनन्त क़िरदार
पर साँसे उसी पर्दे के साथ ही
धीरे- धीरे गिरने लगी तेरे तलास में
निभाओगें ना, फिऱ से वही क़िरदार

चाहता था बस थोड़ी देर और
बचे इस जीवन में साथ
आपस में खेलें जातें
मैं भी क़िरदार, तू भी क़िरदार
निभाओगें ना, फिऱ से वही क़िरदार

( शुभम  की अन्य कविताएं)


नन्दिता कृष्णा  की कविता


वो_पश्मीनी_पश्मीनी_सी_लड़की

वो पश्मीना कुर्ती में
लिपट कर
कई ख्वाब बुन देती है

लाल ख्वाब
गुलाब के फूलों के
नारंगी ख्वाब
गुलमोहर की खुश्बू के
पीले ख्वाब
अमलतास सा खूबसूरत
और नीला ख्वाब
झील की गहराइयों के
हर रंग के ख्वाब बिखरे हैं
उसके कुर्ती के दुपट्टे में
जिसमें उलझी
रंगाई सी लगती है
वो पश्मीनी पश्मीनी सी लड़की...

वो गरम धूप से
गुस्से वाली
प्यार में कोहरे कोहरे सी
वो भीनी भीनी
झीनी झीनी
वो बारिश में घबराई लड़की

वो हाथों से छूकर
सदियों की गिरहे
खोल देती है
उसकी बातों की छाह
के लिए रुक जाता है
अनायास ही पतझड़
का गिरना
जिसके होने से
सब कुछ है
और ना होने से
सब शून्य

वो अनर्गल अपनी शरारतों पर
मुस्काई मुस्काई लड़की
वो अर्धचंद्र के रौशनी में
शरमाई शरमाई लड़की

सुना है
उसके शहर से लुभावनी
महक सी आती है
और ये भी सुना है कि
सायद वो अपने बालों में
शिवली के फूल लगाती है
वो पूरी सी
आधे मन की
उलझाई सहमाई लड़की

पश्मीना कुर्ती में
लिपट कर
कई ख्वाब बुन देती है
लाल ख्वाब
गुलाब के फूलों के
नारंगी ख्वाब
गुलमोहर की खुश्बू के
पीले ख्वाब
अमलतास सा खूबसूरत
और नीला ख्वाब
झील की गहराइयों के
हर रंग के ख्वाब बिखरे हैं
उसके कुर्ती के दुपट्टे में
जिसमें उलझी
रंगाई सी लगती है
वो पश्मीनी पश्मीनी सी लड़की...

(
नन्दिता कृष्णा  की अन्य कविताएं)
 


दीपक की कविता

कोई आने को है

भींगी सड़क, भीनी महक

उठती चहक दिल मे धड़क
कोई आने को है
कैसी बहक, ये छाई सनक
अजब समाई है दिल मे कसक
कोई आने को है
है वादा कोई, किसी ने किया
इंतेज़ार में जिसके मैं अबतक जिया
कोई आने को है
कोई आने को है, है जो मेरी प्रिया
जिसे देख जलता है मन में दिया
वही आने को है
वो जिससे आएगी हरियाली वन में
जिसके लिए हैं,खड़े लाखों जतन में
वही आने को है
तरुओं की आस वो
मेघों का अट्टाहास वो
है अनुपम जो है एकल
आना उसका मृदङ्ग सा "कल-कल"
छनक से होता मुग्ध हृदयतल
वही आने को है
बसन्त की सखी है
नाम बरखा रखी है
वही आने को है
हाँ वही आने को है।

(दीपक की अन्य कविताएं }


दिनेश चारण की कविता


दिनेश चरण

1
कुछ नही बदला
इस जनतंत्र में
महज ठाकुर बदले है।
जिस जमीन को
मेरे पुरखों ने रखा
घर की औरतों के गहने
गिरवी रखकर
आज
गाँव का पटवारी कह गया
तीस दिन में
तहसील में आकर
जमीन सरकार को सौंपनी है
सरकार मुआवजा देगी।
सरकार ने दे दी है
मेरे पुरखों की जमीन,
मेरे पुरखों की इज्ज़त
एक विदेशी कम्पनी को।
मैं क्या जवाब दूँगा
मेरी आने वाली पीढियों को ?
वे पूछेंगे की कैसे दे दी जमीन
जिस पर हमारा हक था
सरकार का नही।
तब आज सोचता हूँ कि
राजतंत्र और जनतंत्र में क्या फर्क है ?

(दिनेश चारण की अन्य कविताएं)


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