नरेन्द्र पुण्डरीक


1-

कपास के फूल की चिंता में
किताबों में पढ़ा था और
पुरानें पुरखों की बतकही में सुना था कि
हर एक के जीवन में
गुलाब के फूल का मौसम आता है

मुझे याद नहीं है
अपने जीवन में गुलाब का मौसम
शायद गुलाब के फूल के मौसम के दिनों में
हमें कपास के फूल की चिंता
इस कदर सवार रहती थी कि
हम इंतजार करते थे हमेशा
परिवार या किसी रिश्तेदार की शादी का
जब कहीं से जुगत लगा कर
पिता बनवाते थे कपड़े
सो हमारा गुलाब के फूल का मौसम
कपास के फूल की चिन्ता में गुजर गया

कभी कभी दो दो साल
कपास के फूल की चिन्ता में गुजर जाते थे
फिर ऐसी सकीनीं में
कहाँ से पाते जीवन में गुलाब के फूल
फिर मन तो आखिर मन है
उसकी क्या कहें
कभी वो हुलस जरूर होगा
ऐसे वक्त में जरूर
दर्रा दे गई होगी पीछे से अपनी निक्कर
जिसे छुपाते हुए चुपके से
पीछे से सरक लिए होंगे हम

समय भी क्या चीज है
जब कपास की कुछ चिन्ता कम हुई
तो पता लगा हमारे लेखे
गुलाब का मौसम ही चला गया
हमारे हिस्से में जो जुट जुटाकर मिली
वही हमारे लिए गुलाब थी
वही चमेली।

2. मरी नहीं होगी इच्छायें

इस जीवन में तो उम्मीद नहीं है मुझे
अगले जन्म जैसा कुछ
होता है में नहीं है विश्वास

आशा नहीं है कि
नहा पाऊंगा नदी में उसी तरह
जैसे नहाता था साथी
लड़के लड़कियों के बीच

लड़के हो गए होंगे
मेरी तरह अधबूढ़े
लेकिन मरी नहीं होगी
मेरी ही तरह उनकी इच्छायें

लड़कियां तो बूढ़ा गई होंगी इतनी कि
इच्छा भी नहीं जन्म ले रही होगी
एकाध ही होंगी
जिन्हें मिला होगा अच्छा घर वर
उनके मन मुकुर में
कहीं जरूर बचा हूंगा मैं
लेकिन सोचता हूं कि
क्या पलट कर देखने का
साहस भी बचा होगा उनमें।

3. दुनिया से लेते समय

हमने प्रार्थना की
कि हम निरोग रहे
हमने प्रार्थना की
कि हमारा वंश गोत्र
बढ़ता रहे धरती में
और हम सुखी रहे

हमने कभी धरती के लिए
प्रार्थना नहीं की कि
धरती बनी रहे हरी भरी
न प्रार्थना की कि
नदियों में बना रहे जल

पक्षियों के लिए भी हमने
प्रार्थना नहीं की कि
वे बने रहे हमेशा धरती में
गुंजाते रहे अपनी बोली बानी का गीत संगीत

हमेशा हमें अपनी आयु बढ़ने
और धरती में
बने रहने की चिंता रही
सो हमने चीजें जुटाने की चिंता में
हमने जीवन की चिंता नहीं की कि
चीजों से कितना
दबता जा रहा है उसका गला

इसी तरह हमनें अपनी
जिंदगी संवारने की चिंता में
हमने कभी सोचा नहीं की कि
हमारे विचार कितने मर चुके हैं
अपने सपनों की ही चिंता करते हुए
हमने शब्दों में विश्वास के बने रहने की
चिन्ता नहीं की कि
उसमें भी वह बना रहे
ताकि आवाज लगाने पर
वे आखरी हो

समय से अपने लिए
कभी लेते हुए समय
हमने पीछे मुड़ कर नहीं देखा की कि
दूसरे भी खड़े हैं हमारे पीछे

ना भंते का यह कहना सुना की
कि अकेले का सुख
जितना हल्का होता है
अकेले का दुख होता है
उतना ही भारी।

4 वे नाखून थे

जब वे हमारे साथ पढ़ते थे
तब वे हमें अपने नाखून के
बराबर छोटे लगते थे
जैसे ही बढ़ते थे उनके नाखून
हमारे बाप-दादाओं को
असुविधा होने लगती थी
इस पर वे उन्हें उनके हाथ पैर से नहीं
सीधे-सीधे सर से काट लेते थे
यह देखकर हमें अजीब सा लगता था
क्योंकि वे हमें अपने जैसे ही दिखते थे
पर ऐसा करते हुए
हमारे बाप-दादाओं को राहत महसूस होती थी
कुछ दिन तक हमारे बाप-दादा
बेखटके आराम से रह लेते थे

पर वे नाखून थे
उन्हें तो बढ़ना ही था
और वे बढ़े

जब वे खेल के मैदान में
हमारे साथ खेलते थे
हमारे बाप-दादा भय की तरह
उनके आस पास डोलते रहते थे
और वे हार जाते थे
हमारे अकुशल और कमजोर हाथों से बार-बार पीटते थे
क्योंकि उनका पिटना हमारे
बाप-दादाओं को अच्छा लगता था

खेल के मैदान में हारते हुए जब वे
पढ़ाई के मैदान में आगे होते दिखाई देते
तो हमारे बाप-दादा हम पर
खींझते हुए कहते 'हैं हम सब की
नाक कटा लओ
यह चमरे ससुरे आगे बढ़ गओ'

यह वह दिन थे जब वे
स्कूल में भूखे रहने पर भी
पेट को हवा से फुलाए रखकर
हमारे साथ दिन भर पढ़ते थे
तब इन्हें अपनी भूख मारने की
कई कलाएं आती थी
अक्सर पानी से पेट फुलाकर
पहुंचते थे घर
कभी हवा से
कभी पानी से
पेट फुलाकर बढ़ते हुए
इन्हें देखकर अक्सर लगता था

कितने बेवकूफ और बेसहूर थे
हमारे बाप-दादा जो दीप की लौ को
अंधेरे की चादर से ढकने में ही
गवा दी अपनी सारी अकल

यह सब और इस समय को देखकर
मुझे विष्णु नगर की कविता की
यह लाइनें याद आ रही है
'दया राम बा
नंगे रहो और करो मजा'
यानी अब हमारे लिए और
उनके लिए कुछ नहीं बचा
यह नंगों का समय है
नंगे मजाक कर रहे हैं।
 


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