नन्दिता कृष्णा

 
" रिक्शेवाला "


वो खींचता है
अपने अंदर फैली
कई अथाह भावों को
और गंभीर रूदन से
कराह देता है

आह ये जीवन
कैसे हालात
कंठ को ही बस छू पाते है
ये अंतर्मन की सारी ध्वनियां

वो खींचता है
अपने समस्त परिवार के
भीतर रोती आत्माओं को
और नए बनते संबंधों को
जो उसके हृदय पीर को
और बढ़ा देती है

कितनी ही संवेदनाएं लिए रहती है
भाव विभोर
करुण रस में डूबी
मगर रुकती नहीं है
निरंतर चलती रहती है

आँखों में नमी लिए
रात ना जाने कब सो जाती है
और फिर से एक नई सुबह
एक नये भाव के साथ
खुद को तैयार कर लेता होगा

वो खींचता है
अपने बच्चों के भविष्य की गांठे
उसकी मजबूती बनाए रखने को
और खींचता है
अपनी पेट की भूख
कि अन्य कोई भूखा ना रह जाए

पैरों के कराहने पर सायद
कानो को मूंद देता होगा
और कई चोटों को
यूं ही अपने हाथों से सहला लेता होगा

वो खींचता होगा
अपने माथे की चिंताओं को
क्यूं की बेटियां बड़ी होने पर
व्याहि भी तो जाती हैं

और खींचता होगा
अपना ढ़लता देह
क्यूं की मूल्य तो कफ़न
और लकड़ियों का भी लगता है ना

और यूं ही पूरे जीवन का वृतांत
खींच कर किसी दिन
वो मुस्कुराता तो जरूर होगा...

सुनो ना,

मैं कम्युनिस्ट बन जाऊं
और तुम संघी बन जाना
अलग अलग विचारधाराओं पर
विवादों संग चाय पिलाना।

मैं तुम्हें मार्कसिज़्म समझाऊ
तुम मुझे मनुवाद बतलाना
और जब बहस
बहुत ज्यादा बढ़ जाये तो
तुम मुझसे हार जाना

अच्छा चलो
बात करते है
मैट्रियारकल और पेट्रीयारकल
समाज की
मैं तुम्हें मेट्रियारकी से दूर रखूंगी
तुम मैन्स डॉमिनेट समाज को
उनके वर्चस्व के अहम् से दूर हटाना

मैं जहां कमला भसीन,
नंदिता दस और मैरी वाल्स्टने क्राफ्ट बनूंगी
वहां तुम भले रूसो बन जाना

मैं खुद को कभी नहीं बदलूंगी
ना तुम खुद में कोई बदलाव लाना

और बहस के आखरी में
मैं जब भी कहूँगी लाल सलाम
वहां तुम भी जय भीम दोहराना

और यूं जब मैं अपने ज़िद में रहूंगी
तब तुम मेरी ज़िद बन जाना

सुनो ना,

मैं कम्युनिस्ट बन जाऊं
और तुम संघी बन जाना
अलग अलग विचारधाराओं पर
विवादों संग चाय पिलाना।

 

मैं आवारा हूं

अगर मैं मर्दों के समाज में
उनके बनाये गये
नियमों के अनुसार नहीं चलती
तो मैं आवारा हूं

अगर मैं किसी एक सेक्ससुएलिटी के क्राइटेरिया में
बंध कर नहीं रहती
तो मैं आवारा हूं

मैं औरत हूं
ये नहीं कर सकती
वो नहीं कर सकती
जब इन शब्दों के बंधनों को तोड़
आगे बढ़ती हूं
तो मैं आवारा हूं

केवल स्त्री और केवल मर्द होने से
मैं ऊपर उठ कर देखती हूं
तो मैं आवारा हूं

हां मैं आवारा हूं
अगर मैं पढ़ जाऊ
हां मैं आवारा हूं
जो चंद नैरो माइंडेड मर्दो से आगे बढ़ जाऊ
हां मैं आवारा हूं
जो तुमसे लड़ जाऊ
हां मैं आवारा हूं
अगर मैं तुम जैसी ना बन कर
तुमसे बेहतर कुछ कर जाऊ
हां मैं आवारा ही तो हूं
जो पिंजड़ा तोड़ के उड़ जाऊ।

मैं औरत भी हूं
और मैं आवारा भी हूं।

 

मेरे हाथों की चूड़ियां मत बनना
साहस बनना या मेरे हाथों का तलवार बनना।

ऐ जान तुम नए समय का
एक नया शृंगार बनना।

ना तुम मेरे
पैरों का पायल बनना
और ना ही बेड़ियाँ बनना
हो सके तो तुम
मेरे कदमों की रफ्तार बनना।

ऐ जान तुम नए समय का
एक नया शृंगार बनना।

आँखों में काजल मत बनना
एक खुला ख्वाब बनना
और होठों पर
लाली की जगह
मेरे विचारों की आवाज़ बनना।

ऐ जान तुम नए समय का
एक नया शृंगार बनना।

सिंदूर की जगह
मेरी जीत का तिलक बनना
और अंगुलियों में
अंगूठी की जगह
कलम की धार बनना।

ऐ जान तुम नए समय का
एक नया शृंगार बनना।

मुझे अपनी बाहों में
भरना जरूर
मगर समेटना मत
हो सके तो
तुम मेरा सारा संसार बनना।

ऐ जान तुम नए समय का
एक नया शृंगार बनना।

 


 


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