दीपक
हवा और फ़कीर

ऐ हवा बहती
तू कहाँ है रहती
क्या तेरा भी
घर नहीं मेरी तरह

सुकुमार कभी
कभी बौखलाहट
होती तुझमें भी
सब वही मेरी तरह

मैं हूँ अकेला ही
फुटपाथों पर सोता
साथी मेरे हैं नहीं
बस वही तेरी तरह

भटकता हूँ यूँ
जैसे तलाश है कोई
हर वक़्त ख़ाली
सहता हूँ तेरी तरह

दर बदर घूमा
हर घर में ईर्ष्या दिखी
नहीं रहा सन्तोष
कहीं भी मेरी तरह

एक उम्र गुज़री
मन्दिर मस्जिदों में भी
है कोई निश्छल
नहीं वहाँ तेरी तरह

तू जीवन और मैं
दुआएं देता रहा हूँ
न कोई स्वार्थ तेरा भी
रहा है मेरी तरह

अच्छा है ये कि
तुझे छू नहीं सकता
ये इंसा अब नहीं
वो इंसा मेरी तरह

कोई पीर है
तो कोई मठाधीश
इन्हें कहाँ पता
भूख मेरी तरह

होते नहीं शर्मिन्दा
ये क़त्ल करते कराते
रब के ठेकेदार हैं
न कि मेरी तरह

मानता हूँ पर
न राम है न अल्लाह
अब मन है कहता
चल उड़ जाएं ऐ हवा कहीं
तू मेरी तरह , मैं तेरी तरह।

घर परिवार

जहाँ......
एक कोना उम्मीद का
एक सुकूँ की नींद का
एक हँसी का ठहाका कोना
एक दुःख में साथ निभाता कोना
माँ के मातृत्व का बरामदा
पिता के स्नेह का दरवाज़ा
सभाग्य होता है बहनों का दुलार
आंगन में दादी नानी की गोदी
जहाँ सबका बसता है संसार,
चाची की तुनक-
चाचा का सुनना
नवनिहालों में
दादा जी के संस्कार बुनना
एक दूसरे पर सबका असर होता है..
वो मकां नहीं होता वो घर होता है,
होती थोड़ी है तक़रार
होता सबका है सत्कार
आदर भाव के भरत मिलाप से
थोड़ा कुछ जलते, दूर रिश्तेदार
जहाँ अपनों की दुआओं में असर होता है
वो मकां नहीं होता वो घर होता है।


प्रेयसी -विरह

अगाध प्रेम भरकर मन में
धवल सा लिए हृदय तन में

मैं आशिक़ हूँ तेरी आँखों का
तेरी अनसुलझी हर बातों का

मैं जवां धूप सी तपन लिए
हूँ प्यासा, एक अगन लिए

भूरे बादल सी, घुमड़ छा जाओ
मेरी प्रेयसी, तुम बस आ जाओ

जीवन एक कच्ची डोर है
जो खिंचा तुम्हारी ओर है

मैं कण-कण बिखरुं बस तुझमें
तू क्षण-क्षण निखरे बस मुझमें

मेरे साहस की ज्वाला तुम
मेरा मंदिर-मधुशाला तुम

बस साथ निभाना आता है
खो कर पा जाना आता है

कितना भी रोके ये ज़माना
इनकी बातों में तुम न आना

रज़ामन्दी का फ़र्ज़ निभा जाओ
मेरी प्रेयसी, तुम बस आ जाओ
 

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